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न्यूयॉर्क टाइम्स के कार्यकारी संपादक डीन बाक्वट ने इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन वर्ल्ड कांग्रेस में यह बात कही है कि अमेरिका में अखबारों की उम्र 5 साल बची है। दूसरे देशों में यह अवधि 10 से 15 साल तक हो सकती है, लेकिन यह तय है कि अखबार बंद होते जा रहे है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में प्रिंट मीडिया के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। उनका इकॉनामिक मॉडल फ्लाॅप हो चुका है और वे किसी तरह जिंदा बचे हुए हैं। 5 साल बाद भी वे अखबार बचे रहेंगे, जिनके पीछे बड़े-बड़े कार्पोरेट घराने हैं। वरना स्वतंत्र मीडिया की उम्र ज्यादा बची नहीं है।

अमेरिका में स्थानीय अखबार छपते जरूर हैं, लेकिन वे बिकने के बजाय बंटते हैं। पेट्रोल पम्प, शॉपिंग मॉल और हवाई अड्डों पर उनके बंडल रखे रहते हैं, जो व्यक्ति चाहे, वह अखबार उठाकर पढ़ सकता हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में रद्दी के निपटारे पर भी खर्च करना पड़ता है। भारत जैसा नहीं कि रद्दी भी बिकती है, वहां अखबार फ्री में मिलता है, लेकिन उसे निपटाना महंगा है। भारत में अखबार सस्ता है और उसकी रद्दी बेचने पर मामूली कीमत मिल जाती है। रद्दी बेचने पर जो पैसे मिलते है, उससे 6 गुना महंगा तो अखबार का कागज ही होता है।

अमेरिका में छोटे शहरों से निकलने वाले मध्यम और कम आय वाले समाचार पत्रों की दशा बहुत खराब है। प्यू रिसर्च सेंटर ने इस बारे में 34 हजार लोगों से बातचीत की। उनमें 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि स्थानीय अखबार ठीक-ठाक खबरें देते हैं, लेकिन वे कैसी अर्थव्यवस्था में जीवित है, इस बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते। सर्वे में कुछ गिने-चुने लोगों ने ही यह बात कही कि वे स्थानीय खबरों के लिए अखबार लेते हैं। स्थानीय खबरें उन्हें दूसरे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी मिल जाती हैं, जिसमें केबल न्यूज और मोबाइल ऐप प्रमुख हैं। अनेक अखबारों ने कीमत के बजाय चंदा लेना शुरू कर दिया है। कई ने अपने ई-पेपर पेड कर दिए हैं। उनके ई-पेपर खोलना हो तो आपको भुगतान करना होगा। अकेले गूगल ने 30 करोड़ डॉलर (करीब 2100 करोड़ रूपए) स्थानीय प्रकाशन संस्थानों की मदद के लिए खर्च किए हैं।

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अमेरिका के सभी प्रमुख अखबार सब्सक्रिप्शन के आधार पर अपने ई-पेपर निकाल रहे हैं। वहां ई-पेपर में विज्ञापनों की दरें अलग हैं। न्यूयाॅर्क टाइम्स के ही विज्ञापनों में आजकल वृद्धि के संकेत मिल रहे हैं। अमेरिका में बड़े अखबार समूह छोटे अखबारों को खरीद रहे हैं और उन्हें अपने अखबार में शामिल कर रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में पत्रकारों की छंटनी की जा रही है। यही हाल डिजिटल न्यूज संगठनों का भी है। बज फीड ने हाल ही में अपने 15 प्रतिशत स्टॉफ को हटा दिया है। मीडिया कंपनियों को सर्वाइव करने के लिए मार्केटिंग पर भी काफी खर्च करना पड़ रहा है। बढ़ते वेतन भत्ते और कागज की कीमतों ने अखबार निकालना मुश्किल कर दिया है। द टाइम्स जैसे समूह के विज्ञापनों में लगभग 12 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि उनका प्रसार ढाई प्रतिशत से अधिक कम हुआ है।

अखबारी कागज की कमी के कारण कीमतें आसमान की ओर जा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार 2036 के बाद नया अखबारी कागज बनना बंद हो जाएगा। उसके बाद केवल रिसायकल्ड न्यूज प्रिंट ही बाजार में रहेगा। नॉर्थ कैलोनिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विलीप मायर के अनुसार अक्टूबर 2043 में अखबार छपना पूरी तरह बंद हो जाएंगे। समाचार पत्र उपलब्ध तो रहेंगे, लेकिन कागज पर नहीं, वे मोबाइल, लैपटॉप आदि में ही नजर आएंगे। अमेरिका में अखबारों का यह हाल है कि 10 लाख की आबादी वाले न्यू आर्लियंस शहर में अब कोई भी अखबार प्रकाशित नहीं होता, जो अखबार छपते हैं, वे साप्ताहिक या मासिक हैं। कई दैनिक अखबारों ने सप्ताह में दो दिन ही प्रकाशन जारी रखा है। 10 सालों में अमेरिकी समाचार पत्र उद्योग में 30 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। ब्रिटेन में भी बड़ी संख्या में अखबार बंद हो रहे हैं। पाठकों के बदलते हुए रुझान को देखते हुए ब्रिटेन के सबसे मशहूर अखबार द टाइम्स ने अब ब्रॉडशीट के बजाय टेब्लायड रूप में छपना शुरू कर दिया हैं। ऑस्ट्रेलिया के समाचार पत्रों ने अपने कर्मचारियों की संख्या में 20 प्रतिशत तक की कमी कर दी है।

भारत में स्थितियां थोड़ी अलग है। यहां परिवारों की आय बढ़ रही है। साक्षारता का प्रतिशत भी बढ़ रहा है और संचार के साधनों में भी सुधार हो रहा है। इन सब कारणों से भारत में समाचार पत्रों की दशा उतनी बुरी नहीं है, लेकिन जिस तरफ दुनिया जा रही है, उस तरफ भारत भी जाएगा ही। कई बड़े अखबारों में अपने इंटरनेट एडिशन पर ध्यान देना शुरू किया है। वे वहां बड़ी पूंजी लगा रहे हैं और सब्सक्रिप्शन के रूप में आय अर्जित कर रहे हैं।

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