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Emergengy 4स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे प्रमुख घटना है आपातकाल। 25 और 26 जून 1975 की रात को वह लागू किया गया था। करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त घोषित किया गया। आपातकाल के दौरान चुनाव स्थगित हो गए थे और सभी नागरिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। प्रेस की आजादी पर सेंसरशिप लग गई। सोशल मीडिया तो उस वक्त था नहीं, न ही इंटरनेट के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सकता था। आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने मनमाने काम किए थे।

कुछ दिनों पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में तानाशाही की वापसी की आशंका जताई थी। कई लोगों का मानना है कि देश में अब वास्तव में आपातकाल जैसी स्थितियां पैदा हो रही है। आपातकाल में जिस तरह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास कमोवेश सारी सत्ता ही केन्द्रित थी। वैसी ही सत्ता का केन्द्र वर्तमान में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह है। लोकसभा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत है और कई प्रमुख राज्यों में भी भाजपा की अपने बूते पर या किसी समझौते के साथ सरकार बनी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद इंदिरा गांधी के इशारे पर काम करते थे और जब आपातकाल लागू करने के फैसले पर हस्ताक्षर करने थे, तब वे बाथरूम में बाथ टब में थे। आपातकाल लगाने के दस्तावेज पर उन्होंने बाथ टब में बैठे-बैठे ही हस्ताक्षर कर दिए थे। आपातकाल लागू करने के बाद 26 जून 1975 की सुबह आकाशवाणी से इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम एक संदेश प्रसारित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैंने आम आदमी और महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए है। उन कदमों से नाराज होकर विपक्ष मेरे खिलाफ साजिश रच रहा है। आपातकाल की घोषणा के तत्काल बाद सभी विरोधी पार्टियों के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। उन दिनों जयप्रकाश नारायण का आंदोलन बिहार में जोरों पर था। आंदोलन को कुचलने के लिए उसके नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। मेंटेनेंस ऑफ इंटरनेल सिक्युरिटी एक्ट (मीसा) कानून के तहत जिन लोगों को जेल में डाला गया, उनकी जमानत की कोई व्यवस्था नहीं थी। इंदिरा गांधी ने कहा था कि जयप्रकाश नारायण ने पुलिस और सेना के जवानों को उकसाया और यह कहा कि वे शासकों के आदेश न माने। हालांकि जयप्रकाश नारायण ने ‘असंवैधानिक’ आदेशों की बात कही थी, लेकिन उसी को तोड़-मरोड़कर जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी की गई।

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अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, लालकृष्ण आडवाणी, जाॅर्ज फर्नांडिस आदि प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। चंद्रशेखर उन दिनों कांग्रेस में थे और इंदिरा गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य थे। उन्होंने भी आपातकाल के फैसले का विरोध किया था। सरकार ने चंद्रशेखर को भी गिरफ्तार कर लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गैरकानूनी संगठन घोषित किया गया और संघ के कार्यालयों पर छापे मारे जाने लगे। साथ ही संघ से जुड़े हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत घोषित आपातकाल की जड़ में 1971 में हुए लोकसभा के चुनाव थे। इस चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली से खड़ी हुई थी और उनके सामने थे समाजवादी पार्टी के राजनारायण। चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत हुई और परिणाम आने के बाद राजनारायण ने कोर्ट की शरण ली। राजनारायण ने कहा कि इंदिरा गांधी ने गलत तरीके अपनाकर लोकसभा का चुनाव जीता है। राजनारायण की दलील थी कि इंदिरा गांधी ने सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग किया है। चुनाव आयोग ने जितने खर्च में चुनाव लड़ने का नियम बनाया है, इंदिरा गांधी ने उससे ज्यादा धन खर्च किया। मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए इंदिरा गांधी ने नियमों को तोड़ा-मरोड़ा। 4 साल तक इस मामले की सुनवाई चलती रही। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण के पक्ष में फैसला दिया और इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। इसके साथ ही न्यायमूर्ति ने राजनारायण को राजबरेली से विजयी घोषित कर दिया और इंदिरा गांधी के 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।

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उसी दिन यानि 12 जून को ही गुजरात में कांग्रेस के चिमनभाई पटेल की सरकार के विरुद्ध विधानसभा चुनाव में लोगों ने नाराजगी जताते हुए विपक्षी जनता मोर्चे को भारी बहुमत से जीता दिया था। इंदिरा गांधी को यह बात भी नागवार गुजरी। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और इस्तीफा देने से मना कर दिया। मीसा कानून के तहत देशभर में लाखों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों की मनमानी चलती रही। मीसा कानून इतना खतरनाक था कि उसके तहत किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने की जरूरत ही नहीं थी, न ही गिरफ्तार व्यक्ति जमानत का अधिकारी था।

1971 के आम चुनाव में कांग्रेस के जबरदस्त विजय प्राप्त हुई थी। लोकसभा में तब 518 सीटें थी, जिनमें से दो तिहाई से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा था। 352 सीटों के बहुमत से जीतने वाली कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी के अलावा और कोई बड़ा नेता नहीं था, क्योंकि कांग्रेस में इतने बंटवारे और टूट-फूट हो चुकी थी कि कोई बड़ा नेता बचा ही नहीं था। 1969 में इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीकरण कर दिया था, जिससे उन्हें काफी लोकप्रियता मिली थी, तब आम आदमी बैंकों में घुसने की हिम्मत नहीं कर पाता था, इंदिरा गांधी ने कहा कि बैंकों में जमा धन आम आदमी का है और अब बैंकों में आम आदमी भी खाता खुलवा सकेगा। इंदिरा गांधी ने भारत में विलय होते समय राजे-रजवाड़ों को जो भत्ते देने की घोषणा की गई थी, उसे समाप्त कर देने का फैसला भी किया था। इन भत्तों को प्रिवी पर्स कहा जाता था। सभी राजा-महाराजाओं को भारत में विलय होने के उपलक्ष्य में हर साल करोड़ों रुपए खर्च के लिए दिए जाते थे। इंदिरा गांधी ने कहा कि यह प्रिवी पर्स आम आदमी पर बोझ है। जब राजा-महाराजा ही नहीं रहे, तो उन्हें भत्ता किस बात का। आम लोगों में इंदिरा गांधी के इस फैसले से बेहद खुशी थी। चुनाव में इसका असर देखने को मिला और इंदिरा गांधी की छवि गरीबों के मसीहा की रूप में गढ़ी जाने लगी। चुनाव में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा भी दिया था, वह भी लोगों का पसंद आया।

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इंदिरा गांधी का राजकाज एकाधिकारवादी तरीके से चल रहा था। उनके छोटे पुत्र संजय गांधी 5 सूत्रीय फॉर्मूला लेकर आ गए थे, जिसके तहत देशभर में पेड़ लगाने, दहेज खत्म करने, स्वच्छता, अनुशासन और नसबंदी के अभियान चलाये जा रहे थे। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में कम से कम 4 मंत्री ऐसे थे, जो प्रधानमंत्री के बजाय संजय गांधी के निर्देशों पर काम करते थे। इसके बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गांधी से पराजित होने वाले समाजवादी पार्टी के नेता राजनारायण की तरफ से शांति भूषण पैरवी कर रहे थे। शांति भूषण ने कोर्ट में तर्क दिए कि इंदिरा गांधी के सचिव यशपाल कपूर ने सरकारी सेवा में रहते हुए इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनाव प्रचार का कार्य किया था। न्यायालय ने माना कि यह सरकारी मशीनरी और संसाधनों के मामले का दुरूपयोग है, लेकिन चुनाव में धन के दुरुपयोग की बात साबित नहीं हो पाई। भ्रष्टाचार के आरोपों से इंदिरा गांधी मुक्त थी। इंदिरा गांधी ने न्यायालय में कहा कि उन्हें नई व्यवस्था कायम करने के लिए कम से कम 3 सप्ताह का समय दिया जाए। न्यायालय ने यह 3 सप्ताह का समय उन्हें दिया और उन्होंने 3 सप्ताह में नई व्यवस्था के नाम पर अपने आप को बनाए रखने की व्यवस्था शुरू कर दी।

उस वक्त कांग्रेस के जो हालात थे, उसमें इंदिरा गांधी के अलावा और किसी के प्रधानमंत्री होने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। कांग्रेस के अध्यक्ष डी.के. बरूआ थे, जिन्होंने नारा दिया था इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। बरूआ प्रधानमंत्री बनने को तैयार थे और उन्होंने सुझाव दिया कि इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाले। जिस वक्त ये चर्चा चल रही थी कहते है कि तभी संजय गांधी वहां आ गई और उन्होंने अपनी मां को एक तरफ ले जाकर सलाह दी कि वे प्रधानमंत्री के रूप में बनी रहे। पार्टी के किसी नेता पर भरोसा करना ठीक नहीं है। इंदिरा गांधी को संजय की बात ठीक लगी, संजय ने कहा कि अभी हमारे पास 3 सप्ताह का समय है। हम सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 11 दिन बाद यानी 23 जून को इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। उन्होंने अपील की कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाए और सुप्रीम कोर्ट का फैसला होने तक इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की मोहलत दें। सुप्रीम कोर्ट के ग्रीष्मकालिन अवकाश पीठ के न्यायमूर्ति थे वी.आर. कृष्णाअय्यर। उन्होंने कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्ण रोक नहीं लगाएंगे। इंदिरा गांधी अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में वोट नहीं दे सकेंगी और न ही सांसद के रूप में वे वेतन और भत्ते ले सकेंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही अंतिम फैसले तक इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की छू दी दी हो, लेकिन इंदिरा गांधी के विरोध में चल रहे आंदोलन और तेज हो गए। एक तरह से पूरा विपक्ष ही सड़कों पर आ गया था। विपक्ष के अनुसार इंदिरा गांधी स्वार्थी और महात्मा गांधी के आदर्शों से भटक चुकी नेता थी। सुप्रीम कोर्ट में जाने के दो दिन बाद ही देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। 25 और 26 जून की रात से आपातकाल लागू हुआ और 26 जून को छपने वाले सभी अखबार सेंसर हो चुके थे। 26 जून की सुबह ही इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया और बताया कि विपक्ष देश में अराजकता पैदा करना चाहता है। इसलिए आम आदमी और महिलाओं के हित में आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से की गई थी, जिसे उन्होंने मंजूर कर लिया है। इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे आर.के. धवन ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा था कि आपातकाल लगाने का फैसला पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की सलाह के बाद किया गया था। आपातकाल के दौरान कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुलाकर निर्देश दिया गया था कि आरएसएस से जुड़े सदस्यों और विरोधी नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाए। यह भी कहा जाता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी इस्तीफा देने को तैयार हो गई थी। आर.के. धवन के एक इंटरव्यू के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बारे में बताने के लिए जब वे इंदिरा गांधी के पास गए, तब वे डिनर टेबल पर रात्रि का भोजन कर रही थी। जब धवन ने उन्हें बताया कि इंदिरा गांधी हाईकोर्ट से चुनाव हार चुकी है, तब इंदिरा गांधी के चेहरे पर राहत का भाव था। उन्हें कोई दुख या शिकन महसूस नहीं हुई। उन्होंने कहा था कि भगवान का शुक्र है कि अब मैं अपने लिए थोड़ा वक्त निकाल पाऊंगी।

इंदिरा गांधी के करीबी सूत्रों का कहना था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी दुखी नहीं थीं। उनके प्रधान सचिव रहे, पी.एन. धर ने रिपोर्ट दी थी कि इंदिरा गांधी इस्तीफा देने को तैयार थी, लेकिन आर.के. धवन और संजय गांधी नहीं चाहते थे कि इंदिरा गांधी हटे। उस वक्त भारतीय जनसंघ तेजी से उभर रही थी, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता थे। नरेन्द्र मोदी उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ही सक्रिय थे। भारतीय जनसंघ (जो आगे जाकर भारतीय जनता पार्टी का आधार बनी) में भी नरेन्द्र मोदी की सक्रियता नहीं थी, लेकिन आरएसएस के नेताओं को गिरफ्तार करने की खबरों से वे वाकिफ थे। उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ और संविधान के पक्ष में प्रकाशित संपूर्ण साहित्य गुजरात से दूसरे राज्यों में जाने वाली ट्रेनों में रख दिया और खुद भी फरार हो गए। आपातकाल के दिनों में मीडिया पर सेंसरशिप थी, लेकिन फिर भी अंग्रेजी के अखबार इंडियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन और मैन स्ट्रीम जैसे प्रकाशन किसी न किसी तरीके से सरकार के खिलाफ अपनी बात लिखते ही थे। राजेन्द्र माथुर विदेशी रूपकों के सहारे अपनी बात लेखों में लिखते रहे। आपातकाल में सुप्रीम कोर्ट को संविधान के संशोधन की जांच करने से भी रोक दिया गया था। इसका आशय यह था कि इंदिरा गांधी संविधान में मनचाहे बदलाव कर सकती थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया की हालत इस तरह बयान की थी - ‘जब मीडिया को झुकने के लिए कहा गया, तब मीडिया रेंगने लग गया था।’

अब इस हालात में नरेन्द्र मोदी भी देश के सर्वशक्तिमान नेता है। उनके पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है। जल्द ही राज्यसभा में भी भाजपा के पास पूर्ण बहुमत होगा। लोकसभा और राज्यसभा के संयुक्त अधिवेशन में नरेन्द्र मोदी दो तिहाई बहुमत आराम से साबित कर सकेंगे। ऐसे में नरेन्द्र मोदी के फैसलों को चुनौती देना किसी के भी बस की बात न तो अब है और न ही आगे होने वाली है। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज आदि महत्वपूर्ण नेता अब संसद में नहीं है। नरेन्द्र मोदी जो चाहे, वह करने के लिए सक्षम हैं। ऐसे में इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि वे चाहे तो कभी अपने अधिकारों का दुरूपयोग कर सकते है। शायद इसीलिए लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि देश में आपातकाल जैसे हालात है। यह बात उन्होंने लोकसभा चुनाव के पहले लिखी थी। अब तो उनके पास और ज्यादा शक्तियां आ गई है।

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