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गत पांच अप्रैल को भाजपा के स्थापना दिवस के ठीक पहले ही भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा था - ''भाजपा ने शुरू से ही राजनीतिक विरोधियों को दुश्मन नहीं माना। जो हमसे राजनीतिक तौर पर सहमत नहीं हैं, इन्हें देश विरोधी नहीं कहा।'' इसका आशय मीडिया के एक हिस्से ने इस तरह लगाया कि आडवाणी को देश में आपातकाल जैसे हालात लग रहे हैं। इस ब्लॉग पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने तत्काल ट्वीट किया था -"आडवाणी जी ने भाजपा की मूल भावना को व्‍यक्‍त किया है। विशेष रूप से, 'देश पहले, उसके बाद पार्टी और अंत में मैं ' के मंत्र को महत्वपूर्ण तरीके से रखा गया है। भाजपा कार्यकर्ता होने पर मुझे गर्व है और गर्व है कि आडवाणी जी जैसे महान लोगों ने इसे मजबूत किया है.''

मोदी जो भी ट्वीट करें, देश में एक वर्ग ने तानाशाही की वापसी की आशंका जताई थी। आपातकाल भारतीय संविधान में एक ऐसा प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब देश को किसी आंतरिक, बाहरी या आर्थिक रूप से किसी तरह के खतरे की आशंका होती है। संविधान निर्माताओं ने देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा पर खतरा होने की दशा को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे प्रावधान बनाए, जिसके तहत केन्द्र सरकार बिना किसी रोक-टोक के गंभीर फैसले ले सके। जैसे अगर कोई पड़ोसी देश हम पर हमला करता है, तो हमारी सरकार को जवाबी हमले के लिए संसद में किसी भी तरह का बिल पास न कराना पड़े।

चूंकि भारत में संसदीय लोकतंत्र है, इसलिए हमारी सरकार को किसी भी देश से युद्ध करने के लिए पहले संसद में बिल पास कराना होता है। ऐसी आपात स्थितियों के लिए संविधान में ऐसे प्रावधान हैं, जिसके तहत केंद्र सरकार के पास ज्यादा शक्तियां आ जाती हैं और केंद्र सरकार अपने हिसाब से फैसले लेने में समर्थ हो जाती है। केंद्र सरकार को शक्तियां देश को आपातकालीन स्थिति से बाहर निकालने के लिए मिलती हैं।

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1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी के पास दो तिहाई बहुमत था। तब लोकसभा में तब 518 सीटें थी, जिनमें से दो तिहाई से ज्यादा 352 सीटों पर कांग्रेस का कब्ज़ा था। प्रचंड बहुमत से जीतने वाली कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी के अलावा और कोई बड़ा नेता नहीं था, क्योंकि कांग्रेस में इतनी टूट-फूट हो चुकी थी कि कोई बड़ा नेता बचा ही नहीं था।

हाल में 542 सीटों पर हुए चुनाव में मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को 351 सीटें मिली थीं। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास कमोबेश सारी सत्ता ही केन्द्रित थी। वैसी ही सत्ता के केन्द्र वर्तमान में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह हैं। 29 राज्यों में से आधे पर भाजपा की अकेले या साझी सरकार है। उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड जैसे बड़े राज्यों में तो एनडीए की सरकार है ही, असम, अरुणाचल, त्रिपुरा, गोवा, हिमाचल, उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी उसने सरकार के लिए जगह बनाई है। 1971 में कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ थे, जो कहते थे, 'इंदिरा इज़ इण्डिया एंड इण्डिया इज़ इंदिरा'। अब हमारे सांसद अपने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान संसद में 'मोदी मोदी' के नारे लगाते गर्वोन्मत्त हो जाते हैं।

अब नारे लगते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है। मोदी आज वह लाइफबॉय हैं तो भाजपा की तंदुरुस्ती की गारंटी हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री पहले भी पार्टी आलाकमान ही तय करते थे, अब भी करते हैं लेकिन अब पार्टी आलाकमान उनको भी मुख्यमंत्री की सीट पर बिठाने लगे हैं, जिनके नाम की कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की हो। पहले भी भाजपा नेतृत्व की सरकारें बनी हैं, तब विधायकों, पार्टी के विभिन्न गुटों की सलाह और समझौते के लिए जगह होती थी। और अब?

अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह तय करते हैं कि महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणवीस सीएम बनेंगे, यूपी में योगी आदित्यनाथ, अरुणाचल में पेमा कांडू और गोवा में प्रमोद सावंत। त्रिपुरा में बिप्लव कुमार देब और मणिपुर में एन. बीरेन सिंह। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी में अब दिग्गजों के लिए जगह नहीं है क्योंकि वे बूढ़े हो चुके हैं। जिन्होंने पार्टी को खून पसीने से सींचा, गाँव-गाँव नगर-नगर जाकर मज़बूत किया, चना-मुरमुरा खाया और संघ के कार्यालय में चटाई पर रातें बिताई, वे गैर ज़रूरी हो गए। उनके लिए मंत्रिमंडल, संसद, पार्टी पदाधिकारी का पद मुश्किल।

आज विदेश मंत्री की कुर्सी पर नौकरशाह पूर्व आईएफएस एस. जयशंकर, ऊर्जा मंत्रालय में पूर्वआईएएस आरके सिंह, नगरीय मामलों और हाउसिंग में पूर्व आईएएस हरदीप सिंह पुरी, कॉमर्स मंत्रालय में पूर्व आईएएस सोम प्रकाश, संसदीय मामलों के विभाग में पूर्व आईएएस अर्जुन सिंह मेघवाल के लिए जगह है, पार्टी के अनुभवी नेताओं के लिए नहीं। अभी भी पूर्व नौकरशाह लाइन में हैं - बागपत के सत्यपाल सिंह, हिसार के ब्रजेन्द्र सिंह और भुवनेश्वर से लोकसभा में आईं अपराजिता सारंगी को कब मंत्री पद मिल जाए, कहा नहीं जा सकता। दशकों तक पार्टी में काम करनेवाले टिकटार्थियों को पार्टी टिकट नहीं देती, टिकट देती है हरदीप सिंह पुरी, मलयाद्री श्रीराम, एम् रामराव, प्रीति हरित, नमोनारायण मीणा, विजयशंकर पांडेय, एमजीवीके भानु, प्रकाश मिश्रा, अरूपमोहन पटनायक और के जे अल्फांज़ो जैसे नौकरशाहों को, जो हार जाते हैं।

माना कि सरकार में उन लोगों की ज़रूरत होती है, जो डिलीवर कर सकें। पर भोपाल की प्रज्ञा सिंह ऐसा क्या डिलीवर करेंगी जो आलोक संजर नहीं कर सकते थे? जो व्यक्ति पार्टी के प्रति निष्ठावान रहा हो, पद पर पूरी तरह सक्रिय रहा हो और वक़्त आने पर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए और फिर उसकी जासूसी के लिए पूरा आनुषंगिक संगठन लग जाए, यह क्या दर्शाता है। इतना ही नहीं, पार्टी जिस व्यक्ति को लोकसभा तो क्या, विधानसभा के टिकट के लायक भी नहीं मानती थी, वही पार्टी उसे एक बड़े राज्य का राज्यपाल बनाती है और फिर गुजरात चुनाव में उनके अप्रत्यक्ष योगदान को देखते हुए देश के सर्वोच्च पद का उम्मीदवार बनाती और जिताती है।

ऐसा कहा जाता है कि 1975 में तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद इंदिरा गांधी के इशारे पर काम करते थे और जब आपातकाल लागू करने के फैसले पर हस्ताक्षर करने थे, तब वे बाथरूम में बाथ टब में थे। आपातकाल लगाने के दस्तावेज पर उन्होंने बाथ टब में बैठे-बैठे ही हस्ताक्षर कर दिए थे। आपातकाल लागू करने के बाद 26 जून 1975 की सुबह आकाशवाणी से इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम एक संदेश प्रसारित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैंने आम आदमी और महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं। उन कदमों से नाराज़ होकर विपक्ष मेरे ख़िलाफ़ साजिश रच रहा है।

1975 से 2019 तक के इन 44 साल में दुनिया बहुत कुछ बदल चुकी है। जो पुराने फार्मूले थे, वे अब लागू नहीं होते। अब आर्थिक लूट के लिए किसी ईस्ट इण्डिया कंपनी को भारत आने की ज़रूरत नहीं है। अब किसी को नेता बनने के लिए जनसेवा की ज़रूरत नहीं है। अब चुनाव में टिकट पाने के लिए नौकरशाही का अनुभव, किसी मठ का प्रमुख पद या आतंकी अथवा उनका हमदर्द होना काफी है। अगर आप फ़िल्मी स्टार हैं, दलबदलू हैं, गुंडे हैं (जिन्हें राजनीति में बाहुबली अथवा दबंग जैसा शब्द दिया गया है) तो वह भी आपके लिए काम कर सकता है। कांग्रेस को भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहा जाता था, वहां से जल का प्रवाह जारी है। हाँ, गंगा में नहानेवाले अब बदल गए हैं। अब धार्मिक यात्रा का मतलब सठियाये बुड्ढों की चारधाम यात्रा ही नहीं होता, पिकनिक मनाने हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जानेवाले भी तीरथ यात्री होते हैं। डॉ. धर्मवीर भारती कहा करते थे कि गंगा में रोज नहाने का मतलब एक घाट पर नहाना हो सकता है, एक ही जल में नहाना नहीं। जो गंगाजल कल था, आज वह नहीं होगा।

इंदिरा गांधी के आपातकाल में प्रेस पर सेंसरशिप थी, अब कोई माई का लाल भी सेंसरशिप उस तरीके से नहीं थोप सकता। लेकिन अब उसे सोशल मीडिया आर्मी रखनी होगी जिसका काम यह हो कि कोई एक सत्य उजागर करे तो जवाब में एक सौ असत्य इस तरह प्रचारित करे कि उस सत्य की तरफ कोई ध्यान ही न दे सके। रामनाथ गोयनका जैसे अखबार मालिक और राजेन्द्र माथुर, कुलदीप नैयर और निखिल चक्रवर्ती जैसे पत्रकार अब तो हैं नहीं, जो लोगों को जागरुक कर सके। 1975 के आपातकाल की घोषणा के तत्काल बाद सभी विरोधी पार्टियों के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

अब कहाँ हैं जयप्रकाश नारायण, अटलबिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस, मधु लिमये, युवा तुर्क चंद्रशेखर जैसे नेता, जिनमें इंदिरा गांधी की कांग्रेस में रहते हुए भी आपातकाल का विरोध करने का साहस था ? क्या अब है लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और सुब्रह्मण्यम स्वामी में वैसा दम-ख़म? अब कौन सा लालू यादव जेल में बंद होने पर अपनी बेटी का नाम मीसा भारती रख सके? इंदिरा गांधी ने कहा था कि जयप्रकाश नारायण ने पुलिस और सेना के जवानों को उकसाया और यह कहा कि वे शासकों के आदेश न माननें । हालांकि जयप्रकाश नारायण ने ‘असंवैधानिक’ आदेशों की बात कही थी, लेकिन उसी को तोड़-मरोड़कर जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी की गई। लेकिन अब कोई जेपी नहीं हैं, अब हैं जाति के सहारे, मुहावरों के सहारे, मंदिर के सहारे राजनीति चमकानेवाले।

अब दूसरी बार जो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं वे कोई पूर्व मुख्यमंत्री और चाय बेचनेवाले प्रधानमंत्री नहीं हैं। अब वे नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, जो पूरे पांच साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। जिन्हें मीडिया बाइंग, लोक लुभावन नारेबाज़ी , संगठन की चाभी जेब में रखने का अनुभव तो है ही, आनुषंगिक संगठनों को आँखों से इशारे करने का हुनर भी मालूम है। इंदिरा गांधी ने नियमों को तोड़ा- मरोड़ा था, अब नियमों की संरचना ही उनके इशारों पर है। फुटबॉल के मैच में अब अगर मोदी की टीम गोल खा जाये तो नियम यह होगा कि विजेता टीम वह होगी जो गोल खा चुकी हो और गोल करनेवाली टीम पराजित मानी जाएगी।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि आपातकाल अब अतीत का काला अध्याय ही तो बचा है। अब फिर कभी आपातकाल उस रूप में नहीं आ सकता। अब अगर भविष्य में आपातकाल आया तो वह काला अध्याय नहीं होगा, वह सुनहरा, या केशरिया, या सफ़ेद अध्याय के रूप में होगा। नए रूप को धरकर आनेवाले आपातकाल को हम समझ भी नहीं पाएंगे कि यह वैसा ही दौर है। यह राष्ट्रीय अवचेतना का दौर है। डेढ़ जीबी डेटा रोजाना ख़र्च करने के दायित्व की चेतना का दौर।

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