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मीडिया पर सेलेब्रिटी का आतंक इतना ज्यादा हो गया है कि वह आम आदमी से दूर भाग रहा है!उसे एक तरह का फ़ोबिया हो गया है। आम आदमी की ख़बरें ग़ायब; राजनीति, कूटनीति, अर्थ जगत, जेंडर से जुड़े विषय, विषमताओं समाचार लुप्त; संस्कृति,शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान से जुड़े तमाम मुद्दों और विचारों का स्पेस अब केवल और केवल सेलेब्रिटी से भरा जा रहा है, वह भी उन सेलेब्रिटीज़ के बहाने, जिन्हें शायद ही कोई पूछता हो! हमारे दिमाग़ को कूड़ाघर समझ रखा है?

हमें क्या मतलब कि श्लोका मेहता अम्बानी की पहली करवा चौथ कैसी रही? हमें क्या लेना-देना कि नुसरत जहां की चूड़ियों पर एनजे क्यों लिखा है? सारा अली खान अपने ब्वायफ्रेंड से ब्रेकअप के बाद श्रीलंका में कैसे एन्जॉय कर रही है या टसुए बह रही है - यह कोई पब्लिक अफ़ेयर है? सोनम कपूर अपने बाप के यहां दीपावली मनाये या पति के यहां, किसी दूसरे को क्या मतलब? आप बताओ तो कि दीपावली पर दुकानदारों का धंधा कैसा रहा? मज़दूरों को बोनस क्यों नही मिला? बैंकों का धन खाकर भागनेवाले पकड़ाए या नहीं?

भारतीय मीडिया सेलेब्रिटी फ़ोबिया नामक बीमारी से ग्रस्त है। सेलेब्रिटी के अलावा उसे कुछ नहीं सूझता। कहा जाता है कि मीडिया समूह का मालिक कोई भी हो, लेकिन उसका असली मालिक तो उसके पाठक या दर्शक ही होते हैं। लेकिन आजकल इसका उल्टा चल रहा है। भारतीय मीडिया ने सेलेब्रिटी को ही अपना सब कुछ मान लिया है।आजकल अख़बारों में एक नया सिंड्रोम उभरा है, वह है टीजी यानी #टार्गेट_ऑडियंस_सिंड्रोम। अब मीडिया में पाठक या दर्शक के बजाय विज्ञापनदाता ही सबकुछ है। यह माना जाता है कि प्रभावशाली वर्ग ही विज्ञापनों का लक्ष्य होता है और आजकल प्रभावशाली वर्ग वह होता है, जिसके पास पैसा, ताक़त या ओहदा है।

कोई भी फ़ोबिया होने का मुख्य कारण होता है #दिमाग_की_कंडीशनिंग। आजकल हमारे मीडिया घराने संपादक नहीं, बल्कि मैनेजर चला रहे हैं। उन्हें लगता है कि सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है, वह केवल कुछ लोगों की बदौलत और केवल कुछ लोगों के लिए और कुछ ही लोगों के द्वारा ! जो कभी लोकतंत्र का सिद्धांत हुआ करता था, वही मीडिया का भी सिद्धांत होता था यानी जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा। अब यह सिद्धांत बदलकर हो गया है, कुछ लोगों का, कुछ लोगों के लिए और कुछ लोगों के द्वारा। आम जनता इसमें से लुप्त हो गई है। आम जनता का काम अब यही है कि वह उस विशिष्ट वर्ग के लिए काम करे और उसी की मंशा के अनुसार क्रिया, प्रतिक्रिया दे। सोशल मीडिया के आगमन के बावजूद मास मीडिया में यह सेलेब्रिटी फ़ोबिया बढ़ता ही जा रहा है।

दीपावली के दिनों में यूं भी अख़बारों में विज्ञापन अधिक और समाचार-विचार कम होते हैं। अधिक विज्ञापनों के लिए स्थान की भरपाई अख़बार पन्ने बढ़ाकर कर देते हैं, लेकिन अख़बार में छपने वाली सामग्री पाठकों के लिए न होकर विज्ञापनदाताओं के लिए ही होने लगी है। दीपावली पर मनाई जाने वाली परंपराएं अब सेलेब्रिटी न्यूज में सिमट गई है। दीपावली पर कायस्थ समाज में होने वाली कलम-दवात की पूजा, बंगाली समाज में होने वाला काली पूजन, महावीर स्वामी को जैन समाज द्वारा चढ़ाया जाने वाला निर्वाण लाडू, सिख समाज का बंदी छोड़ दिवस, अग्रवाल समाज का बही-खाता पूजन का रिवाज़, पर्वतीय समाज की ऐपण की परंपरा, गाय-बछड़े की पूजा का पर्व आदि अब कम ही दिखाई देता है। दीपावली के पहले तीन-चार बार पुष्य-नक्षत्र आ जाता है। पुष्य-नक्षत्र पर खरीददारी के फ़ायदे बताते लेख, तस्वीरें और समाचार भरे होते हैं। ग्रामीण इलाकों में होने वाली संजा पूजन की परंपरा की खबरें अब कम ही होती हैं। अब अख़बारों के विषय होने लगे हैं कि दीपावली पर कहां सेल चल रही है, कौन-से नए प्रोडक्ट बाज़ार में आ गए हैं या आनेवाले हैं, दीपावली की रौनक बाज़ार में कितनी है आदि। भले ही देश मंदी के काल से गुज़र रहा हो। अख़बारों में उसकी खबरें कम ही आती हैं।

अधिकांश अख़बारों और टीवी चैनलों के अलावा मीडिया संस्थानों की वेबसाइट पर भी दीपावली पर केवल सेलेब्रिटी की दीपावली की ख़बरें ही प्रमुखता से छाई रही। दीपावली के ठीक पहले प्रसिद्ध उद्योगपति मुकेश अम्बानी की दीपावली की पार्टी में कौन-कौन पहुंचा, कौन से उद्योगपति और क्रिकेटर वहां देखे गए, मुकेश अम्बानी के बेटे आकाश अम्बानी ने किस रंग का कुर्ता पहना था और श्लोका मेहता का लहंगा कितना महंगा था, ईशा अम्बानी ट्रेडिशनल लुक में कैसी दिख रही थी, श्रीलंका के पूर्व दिग्गज क्रिकेटर महिला जयवर्धने इस पार्टी में शामिल होने के लिए कितने कष्ट उठा कर आए थे आदि खबरें ही दीपावली के समाचार के रूप में देखने में आई।

मीडिया का पेट मुकेश अम्बानी की पार्टी से नहीं भरा, तो अमिताभ बच्चन की पार्टी की खबरें मीडिया में सुर्खियां बन गई। दीपावली की शाम अमिताभ बच्चन ने अपने जुहू के बंगले में कैसी पार्टी दी, बंगले को कितना सजाया गया था, बॉलीवुड के कौन-कौन से कलाकार उसमें आए थे, शाहरुख खान किसके साथ आए और अक्षय कुमार किसके साथ? अजय देवगन, जीतेन्द्र, हेमा मालिनी, विराट कोहली, अनुष्का शर्मा आदि कैसे आए थे? किसका क्या स्टाइल था? इसके पहले अमिताभ बच्चन ने दीपावली पर कब पार्टी दी थी? कौन-कौन से कलाकार अपने जीवन साथी के साथ आए थे, कौन-कौन अपनी गर्लफ्रेंड या ब्वॉयफ्रेंड के साथ। करीना कपूर पार्टी में आईं, तो क्यों और नहीं आई तो क्यों? अमिताभ बच्चन ने पार्टी में क्या-क्या किस्से सुनाए और क्या नहीं।

मुकेश अम्बानी और अमिताभ बच्चन तो ठीक है। दीपावली की ख़बरों में यह भी ख़बर है कि कांटा लगा गर्ल शैफाली ज़रीवाला के घर दीपावली का जश्न कैसा रहा? ले-देकर एक फिल्म में काम किया था शैफाली ने। 17 साल पहले 2002 में उनका एल्बम 'कांटा लगा' खूब बजा था। पर अब तक वे 'काँटा लगा' गर्ल ही हैं। अब वे कहां है, क्या कर रही हैं, इसमें हमारे या दर्शक या पाठक की क्या रूचि? लेकिन मीडिया जिसे चाहे उसे ही सितारा बना दें। नुसरत जहां ने दीपावली की शाम क्या पहना था और दुल्हन की तरह क्यों सजी हुई थी, उन्होंने किस रंग की साड़ी पहन रखी थी और चांद का टुकड़ा लग रही थी या शनि का? इस सब बक़वास में किसकी रूचि है? जनप्रतिनिधि के नाते वे क्या कर रही हैं, क्या कर सकती हैं, इस पर तो कोई चर्चा नहीं कर रहा। इसके अलावा सोनम कपूर की दीपावली पार्टी में भी मीडिया की बड़ी रूचि रही। मीडिया में ऐसे छापा गया कि उन्होंने अनिल कपूर के घर पर सोनम कपूर की भव्य पार्टी में शिरकत की। प्रेस फोटोग्राफरों को उन्होंने सरप्राइज दिया और दीपावली के पावन अवसर पर उनसे कोई हुज्जत नहीं की। उनसे दीपावली की शुभकामनाएं ली, उनको लड्डू खिलाए, फोटो और वीडियो खींचने दिए। फिर साथ ही नीचे ख़बर दी है कि सोनम कपूर ने दीपावली के मौके पर बड़ा धमाका किया और एक फैशन ब्रांड एक्स-वाय-ज़ेड का माल भारत में बेचने के लिए ऐलान कर दिया। यह ब्रांड बहुत ही महंगा है और निम्न वर्ग तो क्या मध्यवर्ग भी इसके बारे में सोच नहीं सकता। हाल ही में रिलीज़ एक फिल्म की नई -नवेली हीरोइन की खबर छपी कि उन्होंने दीपावली के मौके पर किसी प्रशंसक द्वारा भेंट की गई चॉकलेट लेने से भी इंकार कर दिया। जब उन्हें रसगुल्ले का बॉक्स दिया गया तो उन्होंने उस बॉक्स को खोलकर गप से रसगुल्ले खा लिए ! वाह, यह हुई न महान ख़बर ! अगर यह खबर देश को पता नहीं चलती तो कितना अनर्थ हो जाता?

कुछ दिनों पहले ही करवा चौथ की खबरें भी मीडिया में जोर-शोर से छपने लगी थीं। पहले करवा चौथ कब आता था और कब चला जाता था, किसी को पता ही नहीं चलता था। बहुत से शादीशुदा जोड़े भी करवा चौथ से लगभग अंजान थे। वह तो भला हो यशराज फिल्म्स का कि उसने करवा चौथ को एक अंतर्राष्ट्रीय त्योहार बना दिया। मीडिया में विज्ञापन विभाग के मैनेजरों की फरमाइश रहती है कि करवा चौथ पर कुछ एक्सक्लूज़िव छापा जाए, ताकि विज्ञापनदाताओं को आकर्षित किया जा सके। फिर विशेष के नाम पर बनाई जाती है अलग-अलग तरह की खबरें। इन विज्ञापन मैनेजरों को लगता है कि आम पाठक या दर्शक की सबसे ज़्यादा रूचि मुकेश अम्बानी और अमिताभ बच्चन में ही होगी। इसलिए शुरू होता है आकाश अम्बानी की नई नवेली पत्नी की पहली करवा चौथ की कहानी। वह क्या पहनेगी, कैसे करवा चौथ मनाएगी, क्या खाएगी आदि-आदि? नुसरत जहां को भी समाचार माध्यम एक लोकप्रिय आइटम समझते हैं। इसलिए उनकी खबरें भी ढूंढ-ढूंढकर लाई जाती हैं कि करवा चौथ पर नुसरत जहां की चूड़ियों पर एनजे क्यों लिखा हुआ था और उसके मायने क्या है? अब एक दर्शक या पाठक के रूप में आप यह नहीं पूछ सकते कि नुसरत जहां के करवा चौथ से हमें क्या लेना-देना?

दीपावली, शादी, सगाई आदि के अलावा आज कल मीडिया में सेलेब्रिटीज के लव अफेयर्स छाए रहते हैं। मानो देश की सबसे बड़ी चिंता यही है कि रणवीर कपूर आलिया भट्ट से कब शादी करेंगे और कहां? उसमें दीपिका पादुकोण जाएगी या नहीं। या फिर यह कि कैटरीना कैफ आजकल विकी कौशल के साथ क्यों घूम रही हैं? बिपाशा बसु ने इंस्टाग्राम पर जो फोटो शेयर किया है, उसमें उनका बेबी बम्प नजर आ रहा है या नहीं? मीडिया का ही चमत्कार है कि अब सैफ और करीना का बेटा तैमूर एक सेलेब्रिटी हैं और शाहिद कपूर तथा मीरा राजपूत की बेटी मीशा भी किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं। शाहरुख ख़ान को तो अपनी बेटी की मदद न जाने कहाँ-कहाँ, न जाने किन किन अवसरों पर करनी पड़ती है, आप कल्पना भी नहीं कर सकते। हाल ही में उन्होंने यह रहस्य खोला कि उन्हें तो अपनी बेटी को उसके ब्वॉय फ्रेंड के लिए गिफ्ट खरीदने में भी मदद करनी पड़ती है। कितनी बड़ी खबर है और कितना बड़ा रहस्योद्घाटन! अगर देश को यह बात पता नहीं चलती तो शायद युद्ध छिड़ जाता! अब तो सलमान का बॉडीगार्ड शेरा भी एक महान सेलेब्रिटी है। 2020 या 2021 में आने वाली प्रभु देवा की अनाम फिल्म से प्रियंका चोपड़ा बाहर क्यों की गईं? निक जोनास को नाश्ते में क्या पसंद है? मीडिया में आजकल तमाम इस तरह की खबरें मनोरंजन के पृष्ठों पर छपती रहती हैं, जो कि शुद्ध विज्ञापन होते हैं। हाल ही में मुकेश अम्बानी ने बद्रीनाथ और केदारनाथ की तीर्थ यात्रा की थी। कौन व्यक्ति किस तीर्थ की यात्रा करता है, यह उसका नितांत निजी मामला है। अगर पुण्य और पाप में भी भरोसा हो तो इसका लाभ या नुकसान केवल तीर्थ-यात्री को होना है, खबर लिखनेवाले को नहीं। फिर पूरा देश उस खबर को क्यों झेले कि वहां उन्होंने कितना दान दिया, किस-किस के साथ कितनी देर दर्शन किये आदि?

एक पत्रकार मित्र ने बताया कि मुख्यालय से ऐसी खबरों की डिमांड होती है, जो टीजी को लेकर बनाई जाती है। अब तो कड़ाके की ठंड की खबरें भी इसी अंदाज में पेश की जाती हैं, मानो ठंड केवल अमीर लोगों को ही प्रभावित करती है। कौन-कौन से पब और पंचतारा होटलों ने ठंड में अपने ग्राहकों के लिए क्या व्यवस्था की, किन आर्किटेक्ट ने अपने प्रोजेक्ट्स में स्टाइलिश फायर प्लेस बनाए हैं, ठंड में कौन-कौन से स्थान हैं, जहां यूरोप की मस्ती देखी जा सकती है। इंदौर की रंगपंचमी से बड़ा त्योहार इन मीडिया वालों के लिए स्पेन का टोमोटिना उत्सव है। रंगपंचमी एक डाउन मार्केट त्योहार है, जिसमें हर कोई शामिल हो सकता है। स्पेन हर कोई नहीं जा सकता। एक और तर्क होता है कि जो व्यक्ति रंगपंचमी मना सकता है, वह उसके बारे में कुछ पढ़ेगा या देखेगा थोड़ी। इसीलिए निजी जीवन में नानी बन चुकी और संसद में जा चुकी हेमा मालिनी अभी भी ड्रीम गर्ल ही हैं, बिग बॉस जैसे कूड़ेघर के ढेर में बैठा हर शख्स समझता है कि वह भी सेलेब्रिटी है। मीडिया हर पन्द्रह मिनट में एक नई राखी सावंत को सामने कर देता है और समझाता है कि वह सचमुच कुछ महान क्रिएट कर रहा है!

कुल मिलाकर यह मीडिया का ऐसा संक्रमण का काल है, जो अपने वीभत्स रूप में होते हुए भी पूरे शबाब पर है। सेलेब्रिटी की खबरें देने की उसकी कंडीशनिंग ऐसी है कि उसे लगता है कि सेलेब्रिटी के बारे में कुछ भी छाप देना या दिखा देना ही पर्याप्त है। विज्ञापन मैनेजरों से सम्पादक बनी भीड़ को लगता है कि हर पेज पर सेलेब्रिटी की खबरें नहीं दी तो पाठक या दर्शक वर्ग विद्रोह कर देगा! सेलेब्रिटी की ख़बरें गढ़ने के काम में नए-नए ट्रेनीज़ को गला दिया जाता है, उन्हें बाईलाइन दी जाती है। वे समझते हैं कि यही है असली जर्नलिज़्म! इस तरह यह बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। समाचार और विवरणों का ऐसा जाल तैयार किया जा रहा है, उसमें आम आदमी, भारत की परंपराएं और भारत के लोग नदारद हैं। विचारों को पहले ही भारतीय मीडिया श्रद्धांजलि दे चुका है। अब मानसिक दीवालियेपन की यही इंतेहा देखना बाकी है।

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