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न्यूज़ टुडे (इंदौर नामा/ स्ट्रेट ड्राइव)
इंदौर की रंगपंचमी जैसा जश्न दुनिया में कहीं नहीं होता
न्यूज़ टुडे (इंदौर नामा/ स्ट्रेट ड्राइव)
इंदौर की रंगपंचमी जैसा जश्न दुनिया में कहीं नहीं होता
इंदौर की रंगपंचमी यानी रंगों का सालाना महाकुम्भ। लाजवाब। बेमिसाल। इंदौर की रंगपंचमी जैसा जश्न दुनिया में कहीं नहीं होता। इसकी तुलना अगर दुनिया के किसी फेस्टिवल से की जा सकती है तो वह है ब्राज़ील के रियो फेस्टिवल से। रियो से ज़्यादा मस्ती, उत्साह, उल्लास का माहौल रहता है यहाँ। रियो में नंगापन, फूहड़ता, अमर्यादा और समलैंगिकता का बोलबाला रहता है तो इंदौर में रंगपंचमी पर भारतीय संस्कृति, अपनापन और मर्यादा रहती है। यह बात दीगर है कि इंदौर की रंगपंचमी को हम विज्ञापित नहीं करते। दुनियाभर के पर्यटक रियो में इकट्ठे होते हैं, लेकिन इंदौर की रंगपंचमी का कोई विज्ञापन कहीं भी कभी नहीं किया गया। यहाँ तक कि घोटुल और भगोरिया तक की मार्केटिंग की जाती है लेकिन रंगपंचमी का नहीं। रियो फेस्टिवल में लाख लोग शामिल होते हैं, इंदौर की रंगपंचमी में भी लगभग इतने लोग हिस्सा लेते हैं, जिनमें से 5 लाख के करीब तो गेरों में शामिल होते हैं।
रंगपंचमी की गेरों में हजारों महिलाएं शामिल होती हैं, लेकिन मर्यादा कहीं भी भंग नहीं होती। परिवार उत्सव के मूड में होता है। लोग रंग लगाते-उड़ाते चलते हैं। रंग हाथों से, पिचकारियों से, गुब्बारे में ही नहीं, बल्कि मिसाइलों से छोड़ा जाता है। मथुरा और बरसाने की होली से ज्यादा होली का माहौल इंदौर में उस दिन रहता है। इंदौर में रंगपंचमी है कि इंदौर के लोगों को कोई भी रंजो गम नहीं। रंग ही उनके लिए पूजा-आराधना हैं और रंग ही जीवन जीने की कला। लगता है कि रंगपंचमी पर रंगीन हो गया है। होली पर देश भर में विवादों की खबरें आती हैं, लेकिन इंदौर में लोग गले मिलते हैं, बधाइयाँ देते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। रंगों को खुशबूदार बनाने के लिए टेसू के फूलों का इस्तेमाल भी होता है। मुफ्त में भांग और ठंडाई का वितरण भी प्रचलन में है।
इंदौर में गेर की परंपरा होलकर शासनकाल में शुरू हुई थी, जो आज भी और ज्यादा उत्साह से जारी है। बीच में कुछ साल गेरें निकालना बंद रहा लेकिन 1947 में टोरी कॉर्नर से बाबूलाल गिरि और छोटेलाल गिरि के प्रयासों से ये फिर शुरू हुई। नाम दिया गया टोरी कॉर्नर रंगपंचमी समिति। तब से ही टोरी कॉर्नर इसका प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इन गेरों में बैंड बाजे, घोड़े-बग्घियां, हाथी-ऊंट भी होते हैं। चार पांच मंजिलों तक रंगों और गुलाल की बौछारें और पानी की फुहारें उड़ती हैं। मल्हारगंज, टोरी कॉर्नर, खजूरी बाजार, गोरकुण्ड, राजबाड़ा इलाकों में कई मकान मालिक अपने घरों को रंगों से बचने के लिए पूरे मकान को ही घूंघट पहना देते हैं। सभी धर्मों के लोग इसका आनंद लेते हैं।
इन गेरों और फ़ाग यात्राओं को निकलनेवाले अलग अलग समूह हैं। इनमें समाज के जाने माने लोग भी शामिल होते हैं। राधाकृष्ण फ़ाग यात्रा, संगम कॉर्नर गेर, राधाकृष्ण रास रंग, रसिया कॉर्नर गेर आदि प्रमुख गेरों में शामिल हैं। कुछ बरसों से टीवी न्यूज़ चैनल इन गैरों का लाइव प्रसारण भी करते हैं, लेकिन होली कोई लाइव देखने का पर्व नहीं, खुद शामिल होकर खेलने का पर्व है, रंज भूलकर सबको अपनाने का पर्व है। यह इंदौर की मिट्टी का पर्व है। अदभुत और अलौकिक !
--प्रकाश हिन्दुस्तानी