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प्रसिद्ध खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा चाहते हैं कि दागी क्रिकेटर के जीवन पर बनी अजहर फ्लॉप हो, ताकि दागियों पर फिल्म बनाने की हिम्मत कोई न कर सके। अजहर एक दागी क्रिकेटर रहा है। लालची और दिलफेंक। अवसरवादी नेता भी। यह फिल्म मैच फिक्सिंग के दागी को चमकाने के लिए बालाजी फिल्मस का चमको पावडर है। यह न क्रिकेट प्रेमियों को पसंद आएगी और न ही फिल्म प्रेमियों को। क्रिकेट प्रेमी अजहर की वैसी इज्जत नहीं करते, जैसी सचिन और धोनी की करते हैं।

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प्रेत-आत्माएं बहुत हरामी होती हैं। वे अक्सर राजकुमारी की काया में जा छुपती हैं। राजकुमारियां मूर्ख होती हैं, जो राज परिवार छोड़कर गडरियों के चक्कर में पड़ जाती हैं। कुछ गडरिये बहुत चालू होते हैं। जेल में जाने पर वे काला जादू सीख जाते हैं। काले जादू की स्पीड 6जी इंटरनेट से भी ज्यादा होती है। मेवाड़ में बैठकर लंदन तक इसका काम चल जाता हैं। अगर आप पर किसी ने काला जादू किया है या भूत-प्रेत का टोटका चल रहा है, तो फिल्म देखने जा सकते है। हां, अगर किसी पागल कुत्ते ने काटा हो तो भी जा सकते हैं। यह फिल्म हमारे राष्ट्रीय संसाधनों का खालिस अपव्यय है।

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पहले बागी केवल चम्बल इलाके में होते थे, आजकल सिनेमा के पर्दे पर होते हैं। चम्बल के बागी होने से आसान सिनेमा के बागी होना है। बागी होना युवाओं को आकर्षित भी करता है। अगर बागी टाइगर श्राफ हो और वह अपनी प्रेमिका के लिए बगावत करें, तो सबकुछ जायज होता है। पहले दिन पहले शो में खचाखच भरा सिनेमा हॉल और बीच-बीच में युवाओं की ताली की आवाज बता रही है कि फिल्म मनोरंजक है। जब फिल्म खत्म हुई, तब दो दर्शक बात कर रहे थे कि टिकट के पैसे तो छम-छम गाने में ही वसूल हो गए। यू-ट्यूब पर छम-छम गाना काफी लोकप्रिय हो चुका है।

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शाहरुख खान को ‘बॉलीवुड का बादशाह’, ‘किंग खान’, ‘रोमांस किंग’ और ‘किंग ऑफ बॉलीवुड’ के नामों से पुकारा जाता है। फैन के बाद उन्हें ‘किंग ऑफ पकाऊराम’ के नाम से भी जाना जा सकता है। फैन उनकी पिछली फिल्म दिलवाले से भी ज्यादा पकाऊ है। फैन जैसी स्टुपिड फिल्म बनाने के बाद ऐसा लगता है कि शाहरुख खान को अपने अलावा और कुछ नजर नहीं आता। इस फिल्म में तो शाहरुख खान का डबल रोल है, इसलिए पर्दे पर केवल शाहरुख खान ही नजर आता है। अब इस बुढ़ऊ हीरो को ढाई घंटे कैसे झेले? उन्हें वो ही झेल सकता है, जो उनका अंधभक्त हो।

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इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनता है और डॉक्टर का बेटा डॉक्टर। ऐसे में काम वाली बाई की बेटी क्या बन सकती है? बनेगी तो वह भी काम वाली बाई ही। यह विचार था काम वाली बाई की बेटी का, लेकिन काम वाली बाई है, जो इसे मानने से इनकार करती है। वह चाहती है कि उसकी बेटी भी पढ़ लिख कर अच्छी जिंदगी जिए। अपनी बेटी की पढ़ाई में वह कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती, लेकिन बेटी है जो पढ़ाई से ज्यादा टीवी देखने में ध्यान देती है। पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता और गणित में तो निल बटा सन्नाटा। मां को इसकी चिंता होती है, तो वह मोहल्ले की डॉक्टरनी से बात करती है, जिसके यहां वह साफ-सफाई करने जाया करती है। डॉक्टरनी कहती है कि तुम पढ़ा दो उसे। काम वाली कहती है कि मैं कहां गणित जानती हूं। डॉक्टरनी का जवाब होता है कि तुम भी सीख लो और वह उसे स्कूल में भर्ती करने के लिए प्रेरित करती है। अब मां-बेटी दोनों एक ही कक्षा में पढ़ती हैं। शर्म के मारे बेटी अपनी सहपाठियों से यह बात छुपाती है कि उसकी मां भी उसी क्लास में है।

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बच्चों के साथ देखने लायक है जंगल बुक। थ्री डी और अपनी मातृभाषा में इसे देखने का मज़ा ही ख़ास है (भारत में यह फिल्म अंग्रेजी के अलावा हिन्दी, तमिल और तेलुगू में लगी है). रुडयार्ड किपलिंग की कहानी के अनुसार इस फिल्म का हीरो बालक मोगली मध्यप्रदेश के बालाघाट-सिवनी जिले के पेंच जंगल का रहनेवाला था। इसलिए इस फिल्म का मुख्य कलाकार भारतीय मूल का ( न्यू यॉर्क निवासी) बालक नील सेठी है. 2000 बच्चों में से नील को इस रोल के लिए चुना गया था।

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