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फिल्म समीक्षा : प्यार का पंचनामा-2
प्यार का पंचनामा-2 को ए सर्टिफिकेट दिया गया है। फिल्म में एडल्ट जैसी तो कोई बात नहीं है, लेकिन फूहड़ता का चरम है। महानगरीय उच्च आय वर्ग के युवा तबके को यह फिल्म पसंद आ रही है। फिल्म में कहीं भी तार्किकता नहीं है। केवल महिलाओं का मजाक उड़ाया गया है। फिल्म बताती है कि प्यार-व्यार नाम की कोई चीज नहीं होती, लड़कियां केवल पैसेवाले युवकों को पसंद करती है, जो उन्हें शॉपिंग करा सके, देश-विदेश घूमा सके, शराब पिला सके और उन्हें महंगे-महंगे तोहफे खरीदकर दे सकें। अंत में फिल्म बताती है कि प्यार के चक्कर में जो तीन युवक फंसे थे, वे बुरी तरह उल्लू बनाए गए। उन सबको अपनी मम्मियों की याद आती है।

वकीलों को जज़्बा जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह फ़िल्म उन्हें कॉमेडी फ़िल्म का मज़ा देगी. जज़्बा ऐश्वर्या रॉय बच्चन की फ़िल्म है। ऐश्वर्या के लिए ही बनाई गई है। वे इसके निर्माताओं में से भी हैं इसलिए इसमें किसी और के लिए गुंजाइश रखी ही नहीं गई है। शबाना आज़मी और इरफ़ान के लिए भी गुंजाइश नहीं रखी गई थी, लेकिन इरफ़ान ने अपने लिए संभावनाएं बना ही ली है. जॉन अब्राहम को पहले इसमें लिया गया था, पर जॉन ऐन मौके पर हट गए या हटा दिये गये।
एक बाद साफ कर दूं कि फिल्म तलवार ‘आरुषि और हेमराज हत्याकांड’ पर आधारित फिल्म नहीं है। यह फिल्म ‘आरुषि और हेमराज हत्याकांड की जांच’ पर आधारित है। हमारी पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों की पोल खोलने के साथ ही यह फिल्म न्याय व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। इसी फिल्म का एक डायलॉग है- ‘‘न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी, एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार है। यह तलवार है पुलिस और जांच एजेंसियां। अब इस तलवार पर जंग लग चुका है।’’
फिल्म समीक्षा : एवरेस्ट

एवरेस्ट फिल्म को गत 2 सितंबर को वेनिस फिल्म महोत्सव में रिलीज किया गया था। 18 सितंबर को यह फिल्म दुनियाभर में रिलीज हुई। यह फिल्म एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पर्वतारोहियों के दो समूहों के सर्वाइवल अभियान पर टिकी है। 25 सितंबर को यह फिल्म पूरी दुनिया के करीब तीन हजार सिनेमाघरों में रिलीज होगी। भारत में यह फिल्म प्रदर्शित हो चुकी है और इसे अच्छा प्रतिसाद मिला है।
फिल्म समीक्षा : कैलेंडर गर्ल्स

अगर आपने मधुर भंडारकर की पेज थ्री, फैशन, कार्पोरेट आदि फिल्मों में से कोई भी फिल्म देखी है, तो यह फिल्म देखने की जरूरत नहीं। मधुर भंडारकर ने पुरानी फिल्मों की खिचड़ी को गर्म कर परोस दिया है। यह फिल्म उन लोगों के लिए ठीक है, जो सिनेमा हाल में फिल्म देखने के लिए नहीं जाते है। हां, इस फिल्म को देखने जाने के पहले थियेटर में फोन करके पता जरूर कर लेना कि फिल्म का शो हो भी रहा है या नहीं। वर्ना आपके आने-जाने का समय यूं ही बर्बाद होगा। इंदौर में कई सिनेमाघरों में पहले और दूसरे शो ही दर्शकों के ना आने से रद्द कर दिए गए। बॉक्स ऑफिस पर मय्यत का नजारा मधुर भंडारकर ने दिखा दिया।
फिल्म समीक्षा : कट्टी-बट्टी

पहले इस फिल्म का नाम ‘साली कुतिया’ रखा गया था। जिस पर कंगना को भारी आपत्ति थी। इमरान खान के मामा आमिर खान के हस्तक्षेप के बाद इस फिल्म का नाम कट्टी-बट्टी रखा गया। कंगना इस पर भी खुश नहीं थीं। उन्हें लगता है कि यह नाम चाइल्डिश है। छोटे बच्चे कट्टी-बट्टी करते रहते हैं। फिल्म देखने पर लगता है कि न पहले वाला अच्छा था और न यह नाम।