द कश्मीर फाइल्स फिल्म कश्मीर के पुराने जख्मों पर बंधी पट्टी हटाने जैसा है। 1990 के दशक में कश्मीर में पाक समर्थक आतंकियों द्वारा कश्मीरी पंडितों पर किए गए जुल्मों की दिल दहला देने वाली तस्वीर। राधेश्याम देशभर में 18000 से ज्यादा स्क्रीन्स पर प्रदर्शित हैं और द कश्मीर फाइन्स करीब 500 स्क्रीन्स पर, लेकिन फिर भी पहले दिन जिस तरह द कश्मीर फाइन्स का स्वागत किया गया, वह उल्लेखनीय हैं। फिल्म के दौरान कई बार दर्शक आंसू पोंछते नजर आए और कई बार भारत माता की जय के नारे भी सुनने को मिले। पहले दिन दर्शकों का जबरदस्त रिस्पांस इस फिल्म को मिला।

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अगर आपने राधेश्याम फिल्म का ट्रेलर देखा हो, तो उसे ही 25-30 बार देख लीजिए, इंटरवल तक फिल्म वैसी ही है। उसके बाद एक मिक्सी में थोड़ी टाइटेनिक, थोड़ी बाहुबली और थोड़ी सी साहो मिलाकर घोंट लीजिए, हो गई राधेश्याम तैयार। फिल्म में वीएफएक्स का बेहतरीन उपयोग किया गया है और लोकेशन्स काफी सुंदर है। जिंदगी में पहली फिल्म देखी, जिसमें हीरो कोई हस्तरेखाविद की भूमिका में है और हस्तरेखाविद भी ऐसा कि जो भूत, भविष्य, वर्तमान सभी पढ़ लेता हैं। उसकी कोई भविष्यवाणी गलत साबित नहीं हो पाई। प्रधानमंत्री इमरजेंसी लगाएगी यह घोषणा भी हस्तरेखाविद प्रधानमंत्री की हथेली देखकर कर देता है। अब फिल्म देखने के बाद यह बात कही जा सकती है कि अगर आपके भाग्य में राधेश्याम देखना होगा, तो वह आप देखेंगे ही। चाहे फिल्म कितनी भी झेलनीय क्यों न लगे।

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मराठी में 'सैराट' जैसी जबरदस्त फिल्म बनाने वाले नागराज पोपटराव मंजुले निर्देशित फिल्म 'झुंड' देखने लायक है।अमिताभ बच्चन इसमें मुख्य भूमिका में है, लेकिन झोपड़पट्टी के बच्चों ने जिस तरह की एक्टिंग अमिताभ बच्चन के सामने की है, वह लाजवाब है!  हालांकि फिल्म की कामयाबी की क्रेडिट अमिताभ बच्चन और डायरेक्टर नागराज मंजुले ले जाएंगे!

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मुझे इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि आखिर आईपीएस एसोसिएशन ने 'पुष्पा : द राइज़' फिल्म के खिलाफ कोई मोर्चा क्यों नहीं संभाला? फिल्म में जिस तरह से एक आईपीएस अधिकारी (एसपी) का चरित्र दिखाया गया है वह बेहद शर्मनाक है। पुष्पा में ईमानदार डीएसपी का नाम गोविन्दप्पा है, जो दक्षिण भारतीय है, लेकिन भ्रष्ट एसपी का नाम भंवर सिंह शेखावत है और वह बोलता हरयाणवी है। पूरी फिल्म के तमाम कैरेक्टर दक्षिण भारत के हैं, एसपी को छोड़कर जो कि राजस्थान से आया हुआ लगता है। उसका नाम है भंवर सिंह शेखावत। एसपी के दफ्तर में फिल्म का हीरो (जो कि लाल चंदन का तस्कर है) एक करोड़ रुपए का बैग लेकर जाता है। एसपी अपनी टेबल के तमाम चीज़ें हटाकर नोटों की गड्डियां गिनने लगता है और जिस तरह की बातें वह हीरो से करता है, उससे साफ है कि उसे इतने पैसे में संतुष्ट नहीं है। शायद ही किसी ने इस तरह के एसपी को कहीं नियुक्ति पाते हुए देखा होगा!

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संजय लीला भंसाली ने मुंबई के कमाठीपुरा के पिंजरों को जिस तरह से आलीशान हवेलियों की तरह प्रस्तुत किया है और एक गुमनाम सी कोठे वाली को महिलाओं के कल्याण के लिए काम करने वाली अद्भुत महिला के रूप में बताने की कोशिश की है, वह अविश्वसनीय और हास्यास्पद लगती है। इस फिल्म में अगर कोई हीरो है, तो वह संजय लीला भंसाली का निर्देशन ही है। आलिया भट्ट ने शानदार अभिनय किया है और पल-पल चेहरे के भावों को बदलकर उसने बता दिया है कि वह अभिनय में किसी से कम नहीं है और अपने अकेले के बूते पर पूरी फिल्म को खींच ले जाने का मादा रखती हैं।

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chehre

चार बुड्ढे हैं, जिनका ताल्लुक कोर्ट से रहा है, शिमला की बर्फीली वादियों के सुनसान इलाके में विलासितापूर्ण तरीके से रहते हैं। ये बुड्ढे न्याय करने के लिए अपने घर में कोर्ट लगाने का खेल खेलते हैं। कोर्ट लगती है। एक खेल के बहाने बर्फीली वादी में फंसे हुए किसी मेहमान पर वे मुकदमा चलाते हैं। कहानी के अनुसार कोई व्यक्ति अगर अपराध करता है तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए। वह अपराधी कानून से भले ही बच निकला हो, पर उन लोगों की नकली कोर्ट में असली सजा मिलनी ही चाहिए।

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