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बॉलीवुड की फिल्मों का शौक तो शुरू से ही रहा है। फर्स्ट-डे, फर्स्ट-शो का मुरीद हूं। लगभग सभी बॉलीवुड फिल्में देखता भी हूं। फिल्म समीक्षकों की गहन गंभीर व्यावसायिक बातों से अलग हटकर एक आम आदमी के नजरिये से फिल्म देखता हूं और उसके बारे में राय बनाता हूं। इसमें विज्ञापन या जनसंपर्क का अंश तनिक मात्र भी नहीं है। फिल्मों के तकनीकी पक्ष के बारे में भी बहुत कुछ नहीं लिखूंगा। केवल अपनी राय दूंगा कि फिल्म कैसी है आप झेल सकते है या नहीं? फिल्मों को स्टार बांटने का काम भी नहीं करने वाला। इस सप्ताह दृश्यम से वापसी।

drishyam

 फिल्म समीक्षा

 मलयालम में दृश्यम नाम से ही बनी फैमिली थ्रिलर सुुपरहिट रही थी। 50 करोड़ रुपए से ज्यादा का बिजनेस इसने केवल मलयालम भाषा में कमाया था। बाद में यह फिल्म तमिल, कन्नड़ और तेलुगु में भी बनी। सभी भाषाओं में हिट रही। अजय देवगन ने इसे हिन्दी में बनाने के लिए फायनेंस किया और प्रमुख भूमिका निभाई। अजय देवगन को भरोसा है कि यह फिल्म 150 करोड़ रुपए तक का बिजनेस कर लेगी।

अजय देवगन अधेड़ हो चले हैं। अब उन्हें फॉर्मूला बॉलीवुड हीरो की भूमिका तो मिलने से रही। खुद पैसे लगाकर एक्शन फिल्में बनाते है और ठीक-ठाक कमा लेते हैं। बीच में फुर्सत मिलती है, तो कॉमेडी में घुस जाते हैं। अजय देवगन जैसा हाल ही तब्बू का है, जिन्हें कोई पूछता नहीं। अजय देवगन ने इसीलिए ऐसी कहानी चुनी, जिसमें उन्हें अधेड़ उम्र के व्यक्ति का रोल करना था। इस फिल्म में उन्हें एक पारिवारिक व्यक्ति की भूमिका निभानी थी, जिसकी दो बेटियां है और एक बेटी किशोर अवस्था में है। अजय देवगन ने इस फिल्म में परंपरा से हटकर रोल किया है, जहां वे सिंघम की तरह बहादुर, लड़ाकु व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सामान्य घरेलू व्यक्ति है, जिनकी पूरी दुनिया अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के इर्द-गिर्द घूमती है। इस फिल्म में उन्होंने एक मजबूर किन्तु चतुर व्यक्ति का रोल किया है और वह रोल किया है, पूरी विश्वसनीयता से। मलयालम भाषा में जब यह फिल्म सुपरहिट हुई थी, तब उसके हीरो थे बूढ़े हो चुके मोहनलाल और अधेड़ हिरोइन मीना। मलयालम में यह फिल्म तो बहुत चली, लेकिन पुलिस अधिकारियों ने इस पर बहुत आपत्तियां जताई थी, क्योंकि इस फिल्म में एक अपराधी को हत्या के बाद सबूत छुपाने के नए-नए तरीके ईजाद करते दिखाया गया है।

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तब्बू ने इस फिल्म में आईजी की भूमिका निभाई है। ऐसी आईजी जो बेहद सख्त, अड़ियल और ईमानदार होते हुए एक मां भी है। यह फैमिली थ्रिलर एक मजबूर पिता और एक मजबूर पुलिस अधिकारी मां के आसपास घूूमता है। इसलिए ऐसी फिल्म को फैमिली थ्रिलर कहना ही ठीक होगा, क्योंकि मर्डर होने के बावजूद इस फिल्म में मर्डर मिस्ट्री पहले ही स्पष्ट हो जाती है। फिल्म की कहानी का ताना-बुना इस तरह बुना गया है कि कहीं भी बोरियत नहीं होती और हमेशा रोमांच बना रहता है कि पता नहीं आगे क्या होगा। एक साधारण से केबल ऑपरेटर के रूप में जीवन चलाने वाले अजय देवगन और उनके परिवार को किस तरह की पुलिस प्रताड़नाएं सहनी पड़ती है यह इस फिल्म में दिखाया गया है। अंत तक यह फिल्म रहस्य को समेटे रहती है और नतीजा निकलता है वह ह्रदय स्पर्शी है। इस फिल्म में पुलिस द्वारा प्रताड़ित किए जाने के दृश्य कई लोग सहन नहीं कर पाएंगे। खासकर एक छोटी बच्ची की पुलिसवाले द्वारा पिटाई के दृश्य।

यह फिल्म इस बात को भी प्रमाणित करती है कि फिल्मों की शक्ति हमारी कल्पना से कहीं अधिक है और फिल्में जीवन को हर तरह से प्रभावित करती है। कुछ लोगों की आपत्ति बस इतनी है कि यह फिल्म आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को बढ़ावा देगी और वे अपराध के साक्ष्य छुपाने के लिए नए-नए तरीके सीखकर आजमाएंगे। एक सवाल यह भी है कि अगर अनजाने में किसी से अपराध हो जाए, तो वह व्यक्ति कानून को धोखा दें या कानून की शरण में जाकर बाइज्जत बरी हो। फिल्म का अंत दिलचस्प है। यह फिल्म अनेक तरीके से समाप्त हो सकती थी, लेकिन यह अजय देवगन की मर्जी कि वे अपने अंदाज में फिल्म का समापन करें। अगर आप बेदिमाग हिन्दी फिल्में देख-देखकर उग गए हो, तो यह फिल्म देखी जा सकती है। 163 मिनट दिलचस्पी से कटेंगे। फिल्म में बोझिल गाने नहीं है। गोवा के नयनाभिराम दृश्य देखने को मिले।

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