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('वीकेंड पोस्ट' के 5 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

फेसबुकी दोस्तों का सन्देश था कि बहुत दिनों से फेसबुक पर दिखाई नहीं दे रहे हो, क्या सब ठीक तो है? बिलकुल ठीक है भय्या। पर क्या करूँ , दोस्त लोग जैसे फोटो चिपकाते हैं, जैसे कमेन्ट लिखते हैं, अगर मैं उसके जवाब में मन की बातें लिखने लग जाऊं तो एक भी मित्र फेसबुक पर बचेगा नहीं।

मैं ये रिस्क लेने से डरता रहा और गैरहाज़िर रहा। अब कुछ हिम्मत जुटाकर फिर आया हूँ। कम लिखे को ज़्यादा समझना.

दो अकाउंट हैं जिनमें मेरे करीब दस हज़ार मित्र हैं फेसबुक पर. हरेक की पोस्ट पर कमेन्ट लिखना संभव नहीं है. कहीं सच्ची बात न निकल जाए इसलिए भी डरता हूँ। अपनी सुविधा और सम्मान के लिए मैं यहाँ कुछ कमेन्ट लिख रहा हूँ, कृपया अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार यह कमेन्ट कॉपी पेस्ट कर लीजिएगा। फिर मेरी टाइमलाइन में या मैसेज बॉक्स में मत लिखना कि मैं आपसे मुखातिब नहीं। ये रहे मेरे ईमानदार कमेंट्स, मेरे इन कमेंट्स में से जिसे भी चाहो अपनी पोस्ट के नीचे चिपका लो :

--ये सब टीपा-टीपी का धंधा बन्द करो यार।

--तुम घूमने विदेश गए हो तो मैं क्या करूं बे?

--क्या चीज़ मारी है। कहाँ से चोरी की?

--हरामी, फर्जी कॉमरेड ! मुझे तेरी औकात मालूम नहीं क्या?

--तू क्या रजनीकांत का बाप है?

--वाह, क्या फोटो है यार! क्या साथ में खड़ी वो सुन्दर सी औरत आपकी बीवी है? नहीं, भाभी जी

तो नहीं है ये। कोई चक्कर है क्या?

--फोटो देख लिया। पता चल गया कि तुमने नयी गाड़ी खरीद ली है।

--ये गाड़ी क्या तुमने अपनी कमाई से खरीदी है? बाप की कमाई पर कब तक इतरायेगा बच्चू?

--तू तो स्साले, है ही बड़ा कम्यूनल !

--घुस जा पप्पू के पेंट में।

--मोहतरमा, आपने कविता किसी और की मारी है और फोटो हीरोइन का चिपका दिया है. कोशिश अच्छी है, किसी बहाने तो लोगों ने लाइक किया।

--फेसबुक पर आकर प्रवचन लिख रहा है हरामखोर ! क्या मुझे पता नहीं कि तेरी औकात क्या है?

--कितने रुपये में नेताजी के लिए रोज रोज कमेन्ट लिख है?

--मुझे पता है नेताजी, कि कंप्यूटर और इंटरनेट के मामले में आप निहायत गधे हैं, लेकिन दुकान सजाने की कोशिश में आपने गधों की ही सेवा लेना शुरू कर दी है।

--मुझे पता है ये फोटो कैटरीना है और तुम जो भी हो कैटरीना कैफ तो नहीं ही हो। अपना असली फोटो लगाने में तेरे को शर्म आती है क्या? या तू सूर्पनखा है?

--मैडम जी, आप ये जो रोजाना फेसबुक पर आकर मर्दों को गरियाती रहती हैं, इसीलिये तो कोई फंसता नहीं तुमसे। तुम तो आजीवन प्यासी आत्मा ही रहोगी।

--तुम कैसा लेखन करती हो देवी? मुझे लगता है कि विभूतिनारायण राय ने जो कमेन्ट किया था वो आपके और आप जैसों के लिए ही था.

--अच्छी नौकरी है, मोटी तनख्वाह है, माल कमा रहे हो, ऐश कर रहे हो और यहाँ आकर ज्ञान बाँट रहे हो?

--मुझे पता है कि तुम एक नंबर के नीच, कमीने, घटिया, तुच्छ, हेय, गिद्द हो. यहाँ फेसबुक पर मुंह मारने की कोशिश कर रहे हो. तेरे को तो सुअरिया भी घास न डाले।

--पाखंडी, तेरा सच्चाई और धर्म से क्या लेना देना है?

(फेसबुक के सभी सच्चे मित्रों से क्षमायाचना सहित )

--प्रकाश हिन्दुस्तानी

('वीकेंड पोस्ट' के 12 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

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