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('वीकेंड पोस्ट' के 19 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

भारत में सब काम मुहूर्त देखकर शुरू होते हैं। लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों, ज़्यादातर काम बिगड़ ही जाते हैं। हर फिल्म का मुहूर्त होता है पर ऐसी फ़िल्में दस प्रतिशत ही बनती हैं जो हिट होती हैं। हर मकान का निर्माण मुहूर्त देखकर शुरू होता है, और अधिकांश मकान, मकान ही रह जाते हैं घर नहीं बन पाते। वाहन खरीदनेवाले भी मुहूर्त देखकर जाते हैं। पर क्या ऐसे वाहनों से कभी कोई दुर्घटना नहीं होती? दुकानें , कारखाने, फैक्टरियां आदि भी मुहूर्त देखकर शुरू होती हैं , 80 फ़ीसदी ठप हो जाती हैं.

लगभग सभी नेता चुनाव अभियान शुरू करते हैं तो मुहूर्त देखकर। लेकिन कामयाब तो कुछ ही हो पाते हैं। …. और रही बात शादियों की, तो अधिकाँश मुहूर्त देखकर ही होती हैं और उनका हश्र सभी जानते हैं। खासकर पति लोग। 

जो काम मुहूर्त देखकर नहीं होते, उनकी कामयाबी का प्रतिशत कुछ ज्यादा ही होगा। चोर मुहूर्त नहीं देखते, ज़्यादातर सफल होते हैं। रिश्वत मांगने वाले और देनेवाले दोनों ही कहाँ मुहूर्त के चक्कर में पड़ते हैं? मौक़ा आया तो मांग ली, मज़बूरी अड़ी तो दे दी। मोहर सिंह-माधो सिंह कौन सा मुहूर्त देखकर डाकू बने थे और कौन सा मुहूर्त देखकर सरेंडर करने गए थे? अवैध निर्माण करनेवाले भी कहाँ मुहूर्त देखते हैं, जी में आया और कर डाला। फिर उन्हें तोड़नेवाले कौन सा मुहूर्त देखकर तोड़ते हैं? दबाव आया तो तोड़ डाला। नहीं भी तोडा तो क्या? बाबा लोग जो पूरे गाँव को मुहूर्त की पुड़ियाएं बाँटते रहते हैं, कहाँ मुहूर्त देखते होंगे? देखते होंगे और फिर भी फंस जाते हैं तो इसे क्या कहेंगे? बड़े बड़े घोटाले करनेवाले भी कहाँ मुहूर्त के गेर में पड़ते हैं? मुहूर्त की ऐसी तेसी करनेवालों में मोहब्बत करनेवाले अव्वल हैं। मोहब्बत करनेवाले कहाँ मुहूर्त देखने जाते हैं , लोग कहते हैं कि यह अपने आप होनेवाली दुर्घटना है , ऐसी चीज़ है, जिसका मुहूर्त हमेशा सही ही रहता है. ऐसा नहीं कि मुहूर्त देखा और लग गए अभियान में।

इंदौर में हर काम मुहूर्त देखकर किया जाता है। क्यों ? क्यों का क्या? मुहूर्त देखा जाता है, तो बस देखा जाता है। परम्परा है। सब देखते हैं तो यहाँ भी देखा जाता है। सड़क का मुहूर्त, फिर भूमिपूजन। नाली बनाने का मुहूर्त, फिर भूमिपूजन। खम्बे लगाना हो , फुटपाथ बनाना हो , बस चलाना हो , बगीचा लगाना हो, भाषण-प्रवचन-पूजन-रैली-आयोजन करना हो , पहले मुहूर्त देखो और फिर शुरू करो। इसका एक खास मकसद होता है लोगों को मूर्ख बनाने का। फलां काम का ऐलान हो चुका था , काम शुरू हो गया क्या ? नहीं , मुहूर्त हो चुका है, पूजा भी हो गयी है, काम जल्द शुरू होगा…। हाल यह है कि हर काम का मुहूर्त निकल चुका , पूजा हो चुकी और काम ? वह भी हो ही जायेगा.

मुहूर्त बतानेवाले कहते हैं कि मुहूर्त का मतलब होता है किसी भी काम को शुरू करने की सबसे शुभ घड़ी। यह सबसे शुभ घड़ी ब्रह्म मुहूर्त मानी गयी है। यह ब्रह्म मुहूर्त दो घड़ियों के बराबर होता है यानी करीब 48 मिनट के बराबर। सूर्योदय से करीब दो घंटे पहले यह घड़ी सुबह सुबह 4 बजकर 24 मिनट से 5 बजकर 12 मिनट पर होती है. दूसरा सबसे अच्छा मुहूर्त माना गया है जीव या अमृत मुहूर्त को और यह होता है रात 2 बजे से 2 बजकर 48 मिनट तक। यानि ये दोनों ही घड़ियाँ रात में गुज़र जाती हैं और लोग सोते रह जाते हैं। फिर जो भी बचता है, उसी में कुछ न कुछ बहाना बनाकर काम शुरू कर देते हैं।

मेरा निवेदन है कि हर घड़ी शुभ है। काम शुरू करना ही हो तो। वरना मुहूर्त तो बहाना होता है। बस।

--प्रकाश हिन्दुस्तानी

('वीकेंड पोस्ट' के 19 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित)

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