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वीकेंड पोस्ट के 26 अक्तूबर २०१३ के अंक में मेरा कॉलम

( नोट : यह लेख महिलाओं के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए भारतीय समाज में पुरुषों की दशा बताने के लिए है, कृपया इसे नारी के सम्मान-असम्मान से जोड़ने का की कोशिश नहीं करें। )

कई बार लगता है कि पुरुष होकर कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। कोई भी अखबार, रिसाला, वेबसाइट पर जाओ, पुरुषों को हर तरह से गैर-ज़िम्मेदार और स्वार्थी बताने के साथ ही बलात्कारी-व्यभिचारी, शोषक, नीच, दम्भी, कुटिल, धूर्त, परजीवी और न जाने क्या-क्या बताना फैशन हो गया है.

जितनी भी घटिया उपमाएं हैं, सब की सब पुरुष प्रजाति के नाम ! क्यों? क्या स्त्रियां अपनी मर्जी से स्त्रियां और पुरुष अपनी मर्जी से पुरुष बने हैं? दोनों को प्रकृति ने बनाया है, दोनों ही सम्माननीय हैं। पुरुष भी, स्त्रियाँ भी। फिर बीच में यह जेंडर की लड़ाई क्यों? किसकी दुकान सजाने के लिए? इससे क्या वाकई किसी का भला होगा?

पुरुषों को गाली देना फ़िज़ूल है। स्त्रियाँ घर बनाने में योगदान देती हैं तो क्या पुरुष घर को चलाने में योगदान नहीं देते?(अपवाद छोड़कर) अगर कोई कहे कि स्त्रियाँ अपने मर्दों (पति, पिता, भाई, प्रेमी आदि) की कमाई पर ऐश करती हैं तो क्या गलत बात नहीं होगी? नारी पूजनीय थी, है और रहेगी लेकिन पुरुष को भी वह सम्मान अवश्य मिले, जिसका वह हक़दार है. पुरुष द्वारा उत्पीड़न की बातें करनेवाले नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की यह रिपोर्ट ज़रूर देखें कि रोजाना 168 विवाहित पुरुष 'विभिन्न कारणों से' आत्महत्या करते हैं, और यह संख्या विवाहित स्त्रियों की तुलना में करीब दो गुनी है। दसियों साल से आत्म हत्या में पुरुषों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पुरुषों की आत्महत्या हर साल 5. 6 की दर से बढ़ रही है जबकि स्त्रियों में यह प्रतिशत 1. 4 है. यानी पुरुषों से एक चौथाई। (देखिये ग्राफ) आत्महत्या के ये दोनों ही आंकड़े दुखद हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा '498 -ए' के तहत हर साल दहेज़ के 58 हजार से भी ज्यादा मामले दर्ज किए जाते हैं। इन लोगों में केवल नौकरीपेशा, व्यवसायी, मज़दूर, एन आर आई ही नहीं; फ़ौज और पुलिस के अफसर और यहाँ तक कि न्यायाधीश तक शामिल हैं। आंकड़े देखें तो औसतन जहां हर 19 मिनट में देश में किसी व्यक्ति की हत्या होती है, वहीं हर 10 मिनट में एक विवाहित व्यक्ति आत्महत्या करता है। हर साल एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलों में गिरफ्तार होते हैं। हर 4 मिनट में एक पुरुष को दहेज मांगने के झूठे मामले में फंसा दिया जाता है। हर ढाई घंटे में एक बुजुर्ग को दहेज की मांग के झूठे आरोप में पकड़ लिया जाता है। यहाँ तक कि रोजाना एक निर्दोष बच्चा इसी धारा में गिरफ्तार होता है, हर २३ मिनट में कोई न कोई बेक़सूर महिला भी 'धारा 498 ए' के तहत गिरफ्तार होती है। हर पांच मिनट में एक निर्दोष सलाखों के पीछे पहुंचता है। ऐसा लगता है कि पुरुष विरोधी कानूनों के पीछे परिवार की सत्ता को ख़त्म करके व्यक्तिवादी सत्ता की स्थापना करना बाज़ार का लक्ष्य है. पुरुषों को गाली देकर वाहवाही लूटना सोशल वेबसाईट्स पर शगल बनता जा रहा है।

इस मामले में ऐसे अनेक प्रकरण सामने आ चुके हैं कि अपनी दुश्मनी निकालने के लिए कुछ लोग दहेज माँगने के गलत आरोप लगा कर बेक़सूर लोगों को फंसा देते हैं. हालात इतने खराब हो गए कि एक मामले में न्यायमूर्ति अशोक भान और और न्यायमूर्ति डी.के. जैन ने को यहाँ तक कहना पड़ा कि सेक्शन '498 ए' को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। आईपीसी की धारा '498 -ए' के दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं ।इस कानून के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है कि मर जाना पसंद करता है, इंदौर में भी ऐसे प्रकरण सामने आ चुके हैं जब झूठे मामानों में फंसे बेक़सूर पुरुष ने आत्महत्या कर ली. आत्मसम्मान वाले आदमी के लिए एक बार गिरफ्तार हो जाना काफी घातक होता है। इस क़ानून में एक गुनाहगार को सजा दिलाने के लिए हजारों बेक़सूर लोगों को फंसाना आम हो गया है.
इसी कारण दहेज़ विरोधी कानून को 'लीगल टेररिज्म' तक कहा जाने लगा है. दहेज़ लेना और देना दोनों ही गैरकानूनी है तो फिर केवल दहेज़ माँगनेवाले ही क्यों जेल में बंद किये जाते हैं?

अगर हम सचमुच अच्छा समाज बनाना चाहते हैं तो हमें स्त्रियों और पुरुषों, दोनों को ही इज़्ज़त देनी होगि. जेंडर के नाम पर अगर स्त्रियों से नाइंसाफी होती है तो वह गलत है ही, लेकिन पुरुषों से नाइंसाफी करके भी अच्छा समाज नहीं बनाया जा सकता। फैशन और अपने फायदे के लिए ऐसी लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं, जो बंद होना ज़रूरी है.

--प्रकाश हिन्दुस्तानी

(वीकेंड पोस्ट के 26 अक्तूबर 2013 के अंक में मेरा कॉलम)

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