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वीकेंड पोस्ट के 09 नवम्बर 2013 के अंक में मेरा कॉलम

भारत ने इस दुनिया को समय-समय पर अनेक अनूठी सौगातें दी हैँ और उसमें लेटेस्ट है बूथ कैप्चरिंग। पश्चिम ने दुनिया को लोकतंत्र दिया; पोलिंग और पोलिंग बूथ दिया तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता था कि कुछ न कुछ जोड़कर उसे देते, सो दे दिया -- बूथ कैप्चरिंग। लोकतंत्र का अनूठा कर्म -- बूथ कैप्चरिंग। और इस कला से दुनिया ने लोकतंत्र के एक महान कर्म से अपने आप को परिचित कराया। अब दुर्भाग्य से कुछ लोग इस महान कर्म का सत्यानास कराने में जुट हैं और संविधान की दुहाई दे रहे हैं।

वैसे भारत ने दुनिया को क्या नहीं दिया? हमने दुनिया को शून्य दिया, हमने आयुर्वेद दिया, खगोलशास्त्र दिया, दिशाज्ञान यानी नेविगेशन दिया, पाई यानी पाइथागोरस के प्रमेय को दिया, शतरंज का खेल, बाँध बनाने की कला, बीजगणित, शल्य चिकित्सा का ज्ञान दिया। यहाँ तक कि एनेस्थेसिया भी हमारी देन रही है। उन्होंने लोकतंत्र का ज्ञान देकर कौन सी नवाई कर ली? हमें जो दिया है वह तो बेचारा पश्चिमी जगत ले ही नहीं पा रहा है। समझ ही नहीं पा रहा हमारे मर्म को।

हमने दी हैं इलेक्शन में मॉस पोलिंग, 'वन साइडेड (यानी जबरिया) पोलिंग', ईवीएम मेनिपुलेशन, वोटर लिस्ट में छेड़छाड़, मतगणना में गड़बड़ी जैसी सौगातें ! अगर हम यह नहीं देते तो दुनिया बेचारी फेअर इलेक्शन में ही फंसी रहती और 'प्रतिभाशाली लोग' चुनाव नहीं जीत पाते। चुनाव में बाहुबल और धनबल का इस्तेमाल कैसे करें, पैसे से टिकट कैसे खरीदें और वोटरों को कैसे खरीदें या मतदान से रोकें, जैसी टेक्नॉलॉजी भी भारत की ही देन है। दिलचस्प बात यह है कि हमारी इस प्रतिभा का फायदा उठानेवाले देश भी एशिया के ही हैं, यूरोपवाले बेचारे अभी इतनी तरक्की नहीं कर पाये हैं। इतना ही नहीं, भारत में कई उम्मीदवार इस विषय में पीएचडी कर चुके हैं कि जेल में बैठकर कैसे चुनाव जीतें, आदर्श आचार संहिता का खंडन कैसे करें, पार्टी का टिकट न मिलने पर भितरघात कैसे करें। कई नेता मानद डी- लिट् उपाधि के भी हक़दार हैं क्योंकि उन्होंने लाखों मतदाताओं को एकमुश्त मूर्ख बनाने का रिकॉर्ड बनाया है। दुनिया में इसकी मिसाल नहीं मिलेगी क्योंकि ऐसा कोई काम बाहर के देशों में हो ही नहीं पाया है।

अगर भारत में इलेक्शन टूरिज्म शुरू हो तो लाखों पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है। पर्यटक भारत में बच्चों को वोट डालते हुए, महिला वोटर को पुरुष बनकर और पुरुष वोटर को महिला बनकर वोट डालते देखना पसंद करेंगे। हॉलीवुड के खलनायक चुनावी बाहुबलियों से प्रेरणा ले सकते हैं। दुनिया के बच्चे भारत आकर चुनाव में सक्रिय योगदान को समझकर ज्ञान बढ़ा सकते हैं।

इन तमाम संभावनाओं के बावजूद देश का चुनाव आयोग है जो इन तमाम विकास के काम में अड़ंगे डालते हुए फेअर इलेक्शन करने पर अड़ा है. उसका या कृत्य पूरी तरह विकास विरोधी और अधिनायकतावादी है। चुनाव आयोग ही है जिस कारण हमारी असली प्रतिभा दबी कुचली पड़ी है।

--प्रकाश हिन्दुस्तानी

(वीकेंड पोस्ट के 09 नवम्बर 2013 के अंक में मेरा कॉलम)

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