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वीकेंड पोस्ट के 14 दिसंबर 2013 के अंक में मेरा कॉलम

हमारे शहर की सड़कों पर जिस तरह वाहन चलाए जाते हैं और हॉर्न जिस तरह से बजाए जाते हैं, उससे लगता है इंदौर के लोग या तो बहरे हैं या पहले दर्जे के निसडल्ले! हॉर्न बजाने वालों को पता ही नहीं कि बेवजह हॉर्न बजाना कितना बड़ा सामाजिक अपराध है। यह दूसरे वाहन के चालक की बेइज्जती भी है (अबे हट! मुझे जाने दे!)। आमतौर पर लोग यहां हॉर्न लगातार इस तरह बजाते हैं जैसे एकदम छोटे बच्चे मुंह से पीं-पीं की आवाज करते हुए ट्राइसिकल चलाते हैं।

कई युवा शायद इसलिए हॉर्न बार-बार बजाते हैं कि देखो हमारे बाप ने हमें ये गाड़ी दिल दी है। कई वाहन चालकों को लगता है कि जब गाड़ी में हॉर्न लगाया गया है, तो उसे बजाना जरूरी होता होगा!

वास्तव में हॉर्न का उपयोग केवल चेतावनी के लिए होना चाहिए। किसी के भी घर के सामने अकारण हॉर्न बजाना अपराध है। चौकीदार को या किसी अन्य को बुलाने के लिए हॉर्न बजाना हम अपना हक समझते हैं। हॉर्न कोई एक्सीलेटर या गियर चेंजिंग डिवाइस नहीं है। उन्नत देशों में हॉर्न ऐसा उपकरण है, जिसका इस्तेमाल केवल इमर्जेंसी में ही होता है। वहां अकारण हॉर्न बजाने पर कड़ी सजा और दंड का प्रावधान है। कई देशों में रात के समय हॉर्न बजाना ही प्रतिबंधित है, (वहां रात में केवल डिपर का ही प्रयोग हो सकता है)। हम हॉर्न को स्टीयरिंग की तरह समझते हैं, स्टीयरिंग घुमाना और हॉर्न बजाना समान समझते हैं। वाहनों पर म्यूजिकल हॉर्न नहीं लगाए जा सकते, न ही प्रेशर हॉर्न लगाए जा सकते हैं। हमारे यहां तो कई दो पहिया वाहनों में भी प्रेशर हॉर्न और साइरन मिल जाएंगे। कई वाहनों में कु के भौंकने की आवाज, कहीं बच्चे के रोने-चीखने की आवाज वाले हॉर्न भी लगे हैं, जो हमारी असभ्यता और बददिमागी के प्रतीक हैं। 'नो हॉर्न जोन' (अस्पताल शिक्षा संस्थान के दायरे) में भी लोग हॉर्न बजाने से बाज नहीं आते।

मेरा बस चले और ऐसे हॉर्न बनने लगें तो मैं अपनी गाड़ी में इस तरह की आवाज के हॉर्न लगवाना चाहूंगा:

--'साले गधे, बिना बात के यों हॉर्न बजा रहा है!'

--'क्या तेरे बाप ने नई गाड़ी दिलाई है?'

--'क्या कभी हॉर्न बजाया नहीं?'

--'कमीने-बेवड़े, तू या हमें बहरा समझता है?'

--'क्या तेरे को मरने की जल्दी है हरामी के पिल्ले?'

--'क्या तेरी गर्ल फ्रेंड बुला रही है तो ऐसे बजा रहा है?'

--'बहुत रेंक रहा है तो क्या तू दुलत्ती भी मारेगा?'

--'बहुत जोर से बार-बार पाद यों रहा है बे?'

काश! इस तरह के हॉर्न बनाने लगें तो मैं भी अपनी भड़ास निकालूं।

--प्रकाश हिन्दुस्तानी 

(वीकेंड पोस्ट के 14 दिसंबर 2013 के अंक में मेरा कॉलम)

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