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08-March-2014

(वीकेंड पोस्ट के 08 मार्च 2014 के अंक में मेरा कॉलम)

कुछ औरतें बहुत एक्टिव हैं उनके लिए नारीवादी के मायने हैं -बात-बिना बात मर्दों को गालियां देना, मर्दों को कोसना, मर्दों को जलील करना और अगर कोई मर्द तीखी प्रतिक्रिया लिख दे तो महिला थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने की धमकी देना। उन्हें लगता है कि यही फेमिनिज्म है और इससे उन्हें कोई ख़ास ओहदा मिलनेवाला है। 

सोशल मीडिया में कुछ औरतें बहुत एक्टिव हैं और उनमें कुछ ऐसी हैं जो खुद को नारीवादी कहती हैं। उनके लिए नारीवादी के मायने हैं -बात-बिना बात मर्दों को गालियां देना, मर्दों को कोसना, मर्दों को जलील करना और अगर कोई मर्द तीखी प्रतिक्रिया लिख दे तो महिला थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने की धमकी देना। उन्हें लगता है कि यही फेमिनिज्म है और इससे उन्हें कोई ख़ास ओहदा मिलनेवाला है। इनमें से कुछ औरतें हैं और घर की भड़ास के अलावा नौकरी कि भड़ास भी उनके लेखन में आ जाती है। फेमिनिस्ट होना आसान है, कुछ करना नहीं पड़ता; सिवाय गाली देने के। वे लिखती हैं सारे मर्द ख़राब होते हैं, (उनके भाई-बाप को छोड़कर). उनके पति खराब हैं, प्रेमी बदजात हैं, नौकरी के पुरुष सहयोगी लोलुपता से भरे हैं, सड़क पर चलनेवाला हर मर्द घिनौना है, पुरुष लेखक लम्पट हैं, वगैरह वगैरह। ये लिखती हैं औरतें ही हैं कि देश और दुनिया चल रही है वरना कहर आ जाता। इनकी दुनिया 'मैं' से होती है और 'मैं' पर ही ख़त्म हो जाती है।

क्या औरत और मर्द दोनों बराबर नहीं हैं? न औरतें कमतर हैं न मर्द। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, यह लिखने में वाहवाही नहीं मिलती। वाहवाही मिलती है नारीवादी होने से. 'बेटी है तो कल है' लिखने और बोलने में। ... और अगर गलती से बेटा है तो ? ये नारीवादी लिखती हैं कि औरतें केवल औरतों के ही संसर्ग में रहें, उन्हें गम गलत करने को कंधा ही तो चाहिए। बस, कन्धा ही?

ये औरतें क्यों भूल जाती हैं कि जाती हैं कि अगर महिलाएं घर संभालती हैं तो पुरुष भी तो खदानों-खेतों-खलिहानों में जुते रहते हैं। समुद्री जहाज़ों में, कारगिल जैसी पहाड़ियों में, लोहा तपती भट्टियों में, खतरनाक रसायन उद्योगों में, एयर ट्रैफिक कंट्रोल विभाग में, गहरे समंदर में मछलियां पकड़ने में, रेल पटरियां बिछाने जैसे दुरूह कार्य और भूमिगत सीवेज लाइनों की सफाई जैसे कार्यों में लगे हैं. ख़ास बात यह है कि वे अकसर इसका जिक्र नहीं कर करते।

ये कथित फेमिनिस्ट अपना ही रोना क्यों रोती रहती हैं? वे अपने प्रेमी या पति में अपनी माँ को क्यों तलाशने लगती हैं? उन्हें अपने कथित ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ कहने, सहयोगी पुरुष सहकर्मियों को मतलबी करार देने, बदतमीज़ी को आधुनिकता सिद्ध करने की हुक क्यों लगी रहती है? कई घरों में बेटे और बेटी में भेदभाव होगा। मैं ऐसे कई मित्रों को जानता हूँ, बेटी को तवज्जो मिलती रही है, किसी भाई ने कभी आपत्ति नहीं की।...कोई मुझसे बहस करता है तो मैं उसे देता हूँ और कहने लगता हूँ कि वाकई औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं, औरतें अच्छी हैं !!!

--प्रकाश हिन्दुस्तानी

(वीकेंड पोस्ट के 08 मार्च 2014 के अंक में मेरा कॉलम)

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