फिल्म समीक्षा

फिल्म देखकर बाहर निकलते वक्त या तो आप मुस्करा रहे होते है या आपका सिर दुख रहा होता है या बजरंगी की तरह आपकी आंखों में आंसू होते है या फिर आप खुद को कोसते रहते है कि ये फिल्म देखने गए ही क्यों? लेकिन मांझी देखकर लौटते वक्त आपके मन में दशरथ मांझी का यह वाक्य गूंजता रहता है- किसी भी काम के लिए भगवान के भरोसे मत रहिए, क्या पता भगवान ही आपके भरोसे बैठा हो। नवाजुद्दीन सिद्दीकी का तकिया कलाम इस फिल्म में है- सानदार ! जबरदस्त !! जिंदाबाद !!! यहीं बात इस फिल्म के बारे में भी कही जा सकती है। इस फिल्म की कहानी ए क्लास है। नवाजुद्दीन और राधिका आप्टे का अभिनय भी ए क्लास है और केतन मेहता का निर्देशन भी ए क्लास है। इस तरह यह फिल्म ए ट्रिपल प्लस फिल्म है। अगर आप फिल्म देखने के शौकीन है या फिल्म देखने के शौकीन नहीं है तो भी अपना सारा कामकाज छोड़कर फिल्म देखने चले जाइए। मेरा वादा है आप पछताएंगे नहीं।

मांझी फिल्म केवल एक प्रेरणादायक कहानी नहीं है, यह किसी एक व्यक्ति की कहानी भी नहीं है। यह फिल्म एक व्यक्ति के बहाने तत्कालीन समाज का दस्तावेज है। आजादी के बाद कई साल तक यह देश छुआ-छूूत और जातिवाद की जंजीरों में जकड़ा रहा। दलितों पर अत्याचार, जमींदारों की जबरदस्ती, बंधुआ मजदूरी, भ्रष्ट राजतंत्र और नौकरशाही का चित्रण इस फिल्म में देखने को मिलता है। इसके साथ ही केतन मेहता ने दशरथ मांझी और उसकी पत्नी के माध्यम से रोमांटिक माहौल भी बनाया है, लेकिन वह सब इतना स्वाभाविक लगता है कि कहीं भी यह अहसास नहीं होता कि आप फिल्म देख रहे है आप गहलौर गांव में पहुंच जाते है। गरीबी हटाओ के नारे को भी इस फिल्म में उछाला गया है और इमरजेंसी के दिनों की यादें ताजा कर दी गई है।

इस फिल्म में दशरथ मांझी अकेले अपने बलबूते पर एक पहाड़ को छैनी हथोड़ी से काटकर 70 किलोमीटर के रास्ते को सुगम एक किलोमीटर के रास्ते में बदल देता है। यह एक असाधारण हौंसले की कहानी है। यह एक दलित ग्रामीण के संघर्ष और दिलेरी की दास्तान भी है, जिसे जुनून की हद तक अपने लक्ष्य को पाना होता है। एक नौजवान संघर्ष करते-करते कितने धोखे खाता है और हर मोड़ पर वह कुछ न कुछ सीखकर आगे बढ़ जाता है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने नौजवान दशरथ का रोल भी बखूबी किया है और बुजुर्ग दशरथ मांझी को भी साकार कर दिया। राधिका आप्टे ने दशरथ की पत्नी के रूप में असाधारण काम किया है और एक पल भी यह एहसास नहीं होंने दिया कि वह कोई शहरी लड़की है। 124 मिनिट की फिल्म में पूरे समय राधिका आप्टे गांव की फगुनिया ही लगती है।

‘‘जब तक तुझे फोड़ूंगा नहीं, तब तक छोड़ूंगा नहीं।’’- नवाजुद्दीन बार-बार यह बात उस पहाड़ से कहता है जो उसके गांव को शहर तक ले जाने के रास्ते में रुकावट बना हुआ है। ज्यादातर डॉयलॉग मोनोलॉग की तरह हैं। पहाड़ और दशरथ मांझी के बीच का संवाद। एक पहाड़ को तोड़कर रास्ता निकालने के जुनून में दशरथ मांझी पहाड़ को गालियां भी देता है, उसे कोसता भी है और उससे मित्र की तरह लिपटता भी है। 22 साल तक पहाड़ को तोड़ने के संघर्ष में उसे अनेक तरह की जाति़गत, पारिवारिक और राजनीतिक समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ता है। इस फिल्म के कुछ दृश्य तो यादगार बन जाते है। मिट्टी के खिलौने बनाने के लिए सानी जाने वाली मिट्टी में राधिका आप्टे और नवाजुद्दीन वाले दृश्य, गांव के जमींदार द्वारा गांव के रास्ते से जूते पहनकर गुजरने वाले दलित के पैरों में नाल ठुकवाने का सीन, दशरथ द्वारा फगुनिया को दिया जाने वाला खिलौने का ताजमहल और तकिया- ऐसे कई दृश्य अलग-अलग कारणों से यादगार बन गए है। गांव में आकर इंदिरा गांधी द्वारा दिए गए भाषण का दृश्य थो़ड़ा सा सतही लगा, जिसमें दीपा साही इंदिरा गांधी की भूमिका में नजर आई।

किसी को इस फिल्म में नवाजुद्दीन के रूप में ओम पुरी नजर आए, तो किसी को राधिका आप्टे के रूप में स्मिता पाटिल की याद आ गई। बिहार के दूरस्थ गांव में अनाज के अभाव में चूहे खाकर पेट भरने वाली दलित जाति के नायक दशरथ मांझी पर बनी यह फिल्म डॉ. आम्बेडकर पर बनी फिल्म के बाद दूूसरी ऐसी बायोपिक है, जो किसी दलित नायक के जीवन को बताती है। फिल्म बताती है कि किस तरह कानून बन जाने के बाद भी उन पर अमल होने में बरसों लग जाते है। फिल्म में एक पत्रकार की भूमिका भी है, जो लगातार कई साल तक दशरथ मांझी की लड़ाई को देखता और कवर करता है। वहीं पत्रकार मांझी को अधिकारियों से मिलवाता है और इंदिरा गांधी से भी। दशरथ मांझी उससे कहता है कि मैं तो पागल हूं। मेरी राय किसी भी मामले में मत लेना। एक दृश्य में दशरथ मांझी उस पत्रकार से कहता है कि तुम खुद का अखबार क्यों नहीं निकाल लेते। पत्रकार कहता है कि खुद का अखबार निकालना कोई आसान काम होता है ? इस पर दशरथ मांझी कहता है क्या खुद का अखबार निकालना पहाड़ काटने से भी कठिन काम है ? और सचमुच कुछ साल बाद वह पत्रकार अपना अखबार लेकर मांझी से मिलता है। इस फिल्म में पत्रकार की मनोदशा का भी चित्रण है, जो कहता है कि मैं नेताओं और जमींदारों का दलाल बनकर रह गया हूं।
निश्चित ही आज का भारत और आज का बिहार इस फिल्म के हालात से सैकड़ों गुना बेहतर है। अतीत की झलक देखना इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हम कहां-कहां से गुजरे है। दिल्ली की मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इस फिल्म को देखकर कहा था कि हमारे प्रधानमंत्री को यह जरूर देखनी चाहिए।
प्रेरणादायक कहानी, कमाल का अभिनय, जबरदस्त निर्देशन और देश काल की पहचान इस फिल्म को अद्भूत बनाती है। अगर यह फिल्म चोरी के जरिए पहले इंटरनेट पर नहीं दिखाई जाती तो इसका कलेक्शन बढ़ जाता। फिल्म कुछ ही सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई है और बहुत दिनों तक चलेगी भी नहीं। इसलिए अगर आप इस फिल्म को देखना चाहे तो जल्दी देख डालिए वरना एक अच्छी यादगार फिल्म देखने से वंचित रह जाएंगे।