
चर्चा थी कि नसीरुद्दीन शाह ने एडल्ट फिल्म 'चार्ली के चक्कर में' फिल्म फ़ोकट में की; इस कारण जिज्ञासा थी कि फिल्म कुछ ठीक होेगी। देखने पर लगा कि नसीरुद्दीन शाह ने ठीक ही किया। शराब, सिगरेट, ड्रग, अपराध और क़ानून की गिरफ़्त में फंसे बॉलीवुड के स्ट्रगलर्स के साथ क्या-क्या घट सकता है, इसी की झलक दिखाने की कोशिश फ़िल्म में है। अंत भी रहस्यमय है। फिल्म कई जगह इरिटेट भी करती है।
एडल्ट-थ्रिलर फिल्मों के शौकीनों को फिल्म पसंद आ सकती है, आम दर्शकों को फिल्म की उलझी हुई कहानी, कहानी के 'ट्विस्ट पर ट्विस्ट पर ट्विस्ट', नए किरदारों की भीड़, हिलते हुए कैमरे के शॉट्स, औसत दर्जे की लोकेशंस शायद ही पसंद आएं।पांच किरदारों के साथ पन्द्रह दिन में क्या क्या घट जाता है, इसकी जांच में लगे पुलिस अधिकारी संकेत पुजारी (नसीरुद्दीन शाह) कैसे पड़ताल करते हैं, दिलचस्प है। इंटरवल तक तो फिल्म की गति धीमी है और इंटरवल के बाद कहानी मामले की तह तक ले जाने के बजाए उलझती ही जाती है और दर्शक अंत में कहता है --- ओ तेरी !
नसीरुद्दीन शाह पर ही केन्द्रित फिल्म होने से नए कलाकारों को अवसर कम ही मिल पाया है, पर जो भी हैं; अच्छे हैं। अमित स्याल, आनंद तिवारी, सुब्रत दत्ता, मानसी रच, आंचल नन्द्रजोग, दिशा अरोड़ा, निशांत लाल, सिराज मुस्तफा, सनम सिंह सभी ने अच्छा अभिनय किया है. फिल्म की कहानी अमित स्याल और डायरेक्टर मनीष श्रीवास्तव ने संयुक्त रूप से मिलकर लिखी है. फिल्म में प्रचार में अन्ना हजारे से सम्बंधित संवादों का जिक्र था, जो फिल्म में नहीं हैं। वैसे उसकी कोई जरूरत भी नहीं थी। टाइटल ट्रेक श्वेता शर्मा पर फिल्माया गया है, औसत है।
मुझे इस फिल्म से बहुत आशा नहीं थी, इसलिए निराशा नहीं हुई। पिछले हफ्ते 'तितली' देखने के बाद तो हर फिल्म अच्छी लगना स्वाभाविक है!