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नाम 'दिलवाले' है, पर 158 मिनट की फिल्म में एक मिनट की भी कोई बात ऐसी नहीं है जो दिल को छू सके। शाहरुख़ और काजोल की जोड़ी को भावनाप्रधान अभिनय के लिए याद किया जाता है, लेकिन दिलवाले में दोनों ही एंटी हीरो और एंटी हीरोइन जैसे लगते हैं। दोनों ही भारत से बुल्गारिया एक्सपोर्ट हो चुके 'डॉनों' की औलाद हैं, जो खानदानी प्रतिस्पर्धी और दुश्मन हैं, और बुल्गारिया में गुण्डागर्दी की फील्ड में भारत का नाम रोशन करते-करते काल के गाल में समा जाते हैं। विनोद खन्ना के पुत्र शाहरुख़ और कबीर बेदी की प्रतिभाशाली बेटी काजोल धंधे में बाप का काम आगे बढ़ाते हैं और धंधे की ज़रूरत के लिए मोहब्बत का नाटक करते हैं, पर रहते हैं खून के प्यासे ! दोनों एक दूसरे को मार नहीं पाते. तस्कर बापों की मौत के बाद दोनों अलग अलग भारत आ जाते हैं।

हीरो गोवा में गैराज खोल लेता है, जहाँ वह ग्राहकों की कारों को मोडिफाइड करता है और उनसे अनुमति के बिना घुमाता रहता है। हीरोइन भी भारत आ जाती है पर वह गैराज खोलती तो थोड़ा ऑड लगता; इसलिए रोहित शेट्टी के कहने पर वह रेस्टोटेन्ट बिजनेस में आ जाती है। उसका रेस्टोरेंट भी उतना ही चल पाता है, जितना हीरो का गैराज ! मजबूरी में दोनों को ही गोवा के लोकल तस्करों और ड्रग डीलरों की ग्राहकी से काम चलाना पड़ता है।

अब शाहरुख़ और काजोल दोनों ही अधेड़ हो चुके हैं, इसलिए रेड चिली वालों ( यानी फिल्म के निर्माता शाहरुख़ और गौरी खान) को लगा कि 14 से 30 की उम्र के लोगों को सिनेमाघर में लाने के लिए डेविड धवन के लड़के वरुण और कृति सेनन को लिया गया. इमोशन के हेवी डोज के लिए वरुण को शाहरुख़ का सगा भाई क्या दिखाना? इसलिए कहानी के अनुसार शाहरुख़ के डैडी विनोद खन्ना सड़क पर पड़े बच्चे को उठा लाते हैं और वही बालक आगे जाकर वरुण धवन बनता है, जिसे शाहरुख़,  भाई नहीं; भाई से बढ़कर मानता है, क्योंकि प्लास्टिक के इमोशन का सवाल था बाबा !

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15 साल, 4 महीने और 10 दिन की कहानी फिल्म में फ़्लैश बैक में चलती रहती है। इस फिल्म में सभी कुछ नकली और छिछला लगता है। हरे और बैगली रंग की कारें, प्लास्टिक के फूलों के बगीचे, गैंगस्टर का शरीफ बन जाना, बात बात पर गोलियां चल जाना, पुलिस नाम की कोई व्यवस्था का न होना, मालिक-बख्शी परिवारों का पूरी फिल्म में कभी मंदिर न जाकर चर्च में जाना नकलीपन की इन्तेहाँ लगती है। इस फिल्म की कहानी वैसी नहीं है, जैसी व्हाट्स ऍप के संदेशों में बताई गई थी।

शाहरुख़ खान बहुत अच्छे कलाकार हैं, लेकिन वे कलाकार से भी बड़े बिजनेसमैन हैं। इस फिल्म में उनका कलाकार पिछड़ गया है। यह फिल्म रिलीज़ होने के पहले ही 230 करोड़ का धंधा अलग अलग राइट्स बेचकर कमा चुकी है। इस फिल्म से शाहरुख़ की मार्केट वेल्यू शायद ही बढ़ेगी। रोहित शेट्टी की चेन्नई एक्सप्रेस के मुकाबले यह फिल्म केवल साढ़े छह आने ही इंटरटेन कर पाती है। 158 में से 30 मिनट गानों पर खर्चे गए हैं। दो को छोड़कर बाकी गाने पकाऊ हैं और अकारण ही परदे पर बजने हैं। वरुण धवन गोविंदा का पॉकेट बुक एडीशन लगते हैं।

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