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सरबजीत के टिकट पर वैधानिक चेतावनी होनी चाहिए- ‘‘यह फिल्म केवल संवेदनशील लोगों के लिए हैं, जो लोग केवल मनोरंजन के लिए सिनेमा घर में आना चाहते हैं, वे फिर से सोच लें।’’ वास्तव में सरबजीत मनोरंजन के लिए है ही नहीं। फिल्म देखते वक्त पड़ोसी दर्शक के पॉप कॉर्न की आवाज भी आपको फिल्म देखने में बाधा उत्पन्न कर सकती है।

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दरअसल यह सरबजीत के बहाने उनके पूरे परिवार की कहानी है। पाकिस्तान में यह फिल्म एंटी पाकिस्तान बताकर बैन की जा चुकी है और उत्तरप्रदेश में टैक्स फ्री है। इस फिल्म में ऐश्वर्या राय भूतपूर्व मिस वल्र्ड न लगकर सरबजीत की बहन दलबीर कौर ही लगती है और ऋचा चड्ढा अपनी छवि के विपरीत सरबजीत की बीवी सुखप्रीत कौर। रणदीप हुड्डा ने सरबजीत के रोल को जीवंत किया है, हालांकि उनके रोल में सीमाएं बहुत थीं, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान की जेल में ही सड़ना था।

यह फिल्म सरबजीत के बहाने भारतीय परिवारों के रोजमर्रा के जीवन, भाई-बहन और पति-पत्नी के रिश्ते, न्याय की आशा में बरसों इंतजार करते लोग, भारत-पाकिस्तान रिश्ते, जेल में बंद कैदियों के साथ होने वाला बर्ताव और हमारे राजनेताओं के चरित्र को बारिकी से दिखाती है। फिल्म में छू लेने वाले कई दृश्य है और फिल्म के समाप्त होने पर भी दर्शक क्रेडिट टाइटल देखने के लिए रुके रहते हैं।

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अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और कूटनीति में मानवीय संवेदनाओं के लिए कितनी कम जगह बची है, यह इस फिल्म में अलग-अलग तरीके से दिखाया गया है। आशा की बात यह है कि इसके बावजूद दोनों देशों के लोगों में एक-दूसरे के नागरिकों के प्रति प्रेम बाकी है और वे उसके लिए जीते-मरते है। किस तरह पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव का एक नौजवान रात को शराब के नशे में भटक जाता है और पाकिस्तानी एजेंसियां उसे आतंकवादी और रॉ का एजेंट बताकर यातनाएं देती है। साधारण परिवार के उस युवक को बचाने के लिए उसकी बहन जी-जान लगा देती है और अंत में सरबजीत आता है, तो मिट्टी बनकर। फिल्म के अंत में सरबजीत को मुखाग्नि देती हुई उसकी बहन एक बड़ा संदेश दे जाती हैं और अपने भाई की इच्छा के अनुरूप भारतीय जेल में बंद पाकिस्तानी निर्दोष लोगों के बचाव में आती है।

यह एक फिल्म है, इसलिए इसमें पंजाबी गीत-संगीत और गाने भी है। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के सुंदर दृश्य भी इस फिल्म में हैं। ऐश्वर्या राय बच्चन का वह संवाद दिल को छू लेता है, जिसमें वे कहती हैं- ‘हमें तो कभी लगा ही नहीं कि पाकिस्तान इतना दूर है।’ ऐश्वर्या राय को इस फिल्म में धीरे-धीरे अधेड़ होती स्त्री के रूप में दिखाया गया है और बिना ग्लैमर के भी उन्होंने अपने अभिनय का प्रदर्शन किया है। जब भी कोई निर्दोष जेल जाता है, तब सबसे बड़ी सजा उसके बेगुनाह घर वाले भुगतते हैं। उनके भीतर चल रहे अंतरविरोध और तनाव उनकी उम्र खा जाते हैं।

सरबजीत की बहन बनी ऐश्वर्या राय को कुछ बहुत अच्छे संवाद बोलने के मौके मिले है। जैसे- भाषण मैं देती हूं और तालियां सुनती हूं, और फिर भाषण देती हूं और फिर ज्यादा तालियां सुनती हूं। सरबजीत पाकिस्तान की जेल में बंद है और वह तो छूटता नहीं। एक दृश्य में वे पाकिस्तान जाकर वहां के लोगों से यह कहती है कि आप लोगों को केवल पीठ पर वार करना ही आता है। तब वहां मौजूद भीड़ भी उतनी ही सन्न रहती है, जितनी सिनेमा हाल में बैठी भीड़। वे कहती है कि खून ना तो गेरूआ होता है और ना हरा।

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पाकिस्तान की जेल में जब वे अपने भाई से मिलने जाती है, तब तलाशी के दौरान उनके चेहरे के भाव देखने लायक होते है। एक आम महिला की तरह जब वे भीड़ के साथ भाग रही होती है और उनकी चप्पल टूट जाती है, यह दृश्य प्रतीकों में बहुत कुछ कह जाता है। सरबजीत पर जेल में हुए हमले की खबर सुनते वक्त उसकी बीवी बनी ऋचा चड्ढा घर की दीवार बना रही होती है और जैसे ही उसे खबर मिलती है, जमीन पर पड़ा पत्थर उसके लिए अचानक इतना भारी हो जाता है कि वह उसे उठा नहीं पाती। ऐसे छोटे-छोटे अनेक दृश्यों में निर्देशक उमंग कुमार ने फिल्म में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

इस फिल्म में जी टीवी की खबरें कई बार दिखाई जाती हैं। सुधीर चौधरी भी खबर पढ़ते नजर आते हैं। लोकसभा में सोमनाथ चटर्जी की अध्यक्षता में हो रही बहस, मुंबई में हुआ आतंकी हमला, संसद पर हमले के दृश्य, अफजल गुरू और कसाब की फांसी का जिक्र भी इस फिल्म में है। पाकिस्तान का वकील अपना एक पुराना लैपटाप ऐश्वर्या को देता है और बताता है कि यह गूगल मियां खुदा के अलावा सबको जानता है। पाकिस्तान की जेल में सरबजीत को मौत तो देते नहीं, लेकिन जीने का हक छीन लेते हैं। सरबजीत की पूरी जवानी पाकिस्तानी जेल की कालकोठरी खा जाती है। फिल्म के प्रेरणादायक संवाद है- हैसियत हमेशा हिम्मत के आगे छोटी पड़ जाती है और मंजिलें कितनी भी ऊंची हो, रास्ते तो कदमों में ही होते हैं।

यह फिल्म 100 करोड़ का कारोबार भले ही न कर पाए, पर 125 करोड़ भारतीयों का दिल जीतने की क्षमता रखती है।

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