
'तीन' विद्या बालन की फ़िल्म 'कहानी' का सीक्वल लगता है, पर है नहीं. यह कोरियाई फ़िल्म 'मोंताज' पर आधारित दिलचस्प मिस्ट्री ड्रामा है. इसमें नवाज़ुद्दीन ने कई दृश्यों में अमिताभ को मात दी है. गुंथी हुई कहानी, शानदार एक्टिंग और बढ़िया निर्देशन दर्शकों को सवा दो घंटे सीट पर बैठाए रखते हैं. फ़िल्म के पार्श्व में रवीन्द्र संगीत अच्छा लगता है.

फ़िल्म में हर क्षण कुछ न कुछ घटना होती रहती है, पर लगता है कि कुछ शायद नहीं हो रहा है. कुछ लंबे सीन बोरियत भरे भी हैं. फ़िल्म बताती है कि अगर पुलिसवाला पादरी बन जाए, तब भी वह पुलिसवाला ही रहता है, यूनिफार्म बदलने से उसकी सोच नहीं बदलती। एक जगह अमिताभ अपने खटारा बजाज वेस्पा की तारीफ में कहते हैं कि यह है तो पुराना, पर चलता है एयरोप्लेन के माफ़िक़. (हमारा बजाज)
कई लोग कहते हैं कि कोलकाता में हर चीज़ 1947 के पहले की है. अमिताभ उसी का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्होंने कोलकाता को जीवंत कर दिया. उन्हें कोलकाता की सड़कों पर खटारा स्कूटर चलाते देखना, भुतहा से मकान में रहना, जर्जर लिफ्ट, हावड़ा ब्रिज, ट्राम, मछली बाज़ार, पुराने गिरजाघर, सरकारी दफ्तर, फेरी में आते जाते देख पुराने कोलकाता में होने का आभास होता है. कोलकाता की आधुनिकता इसमें नदारद है. फ़िल्म ख़त्म होते - होते परदे पर कई अविश्वसनीय घटनाएं घट चुकी होती हैं और दर्शक सोचता है कि यह असंभव सा क्यों घटा?

नवाजुद्दीन, विद्या बालन और अमिताभ के अलावा सव्यसाची चक्रवर्ती और पद्मापति राव की प्रमुख भूमिका है, पर यह समझ से परे है कि इसका नाम 'तीन' क्यों रखा गया. अपहरण के मामले तो दो ही थे.
एंग्लो इन्डियन बूढ़े के रूप में अमिताभ, पुलिस इन्स्पेक्टर से पादरी बन चुके नवाजुद्दीन और नवाजुद्दीन को चाहनेवाली पुलिस अधिकारी के रूप में विद्या बालन जमी हैं. फ़िल्म के टाइटल में विद्या को अतिथि / विशेष कलाकार के रूप में बताया गया है. फ़िल्म में अपहरण, पुलिस-जाँच, रहस्य रोमांच है, और निर्देशक रिभु दासगुप्ता ने शालीन संवाद रखे हैं। आधुनिकता के नाम पर बीप बीप की ज़रूरत नहीं पड़ी.
10 june 2016