
रमन राघव 2.0 में बहुत अच्छा गीत-संगीत, लोकेशन्स, डायलॉग, एक्शन, डांस, ड्रामा, प्रेम से भरे दृश्य, संदेश, आनंद कुछ भी नहीं है। रात का अंधेरा है, एक वहशी पागल हत्यारा है, जो कुत्ते-बिल्ली तो क्या छोटे बच्चोें को भी नहीं छोड़ता। तरह-तरह की गालियां है। हत्याओं के बीच में पीछे से चीखता हुआ संगीत है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बेहतरीन एक्टिंग है, लेकिन नवाजुद्दीन कोई प्रियंका या कैटरीना तो है नहीं, जिसे झेला जा सके। यह पूरी फिल्म अनुराग कश्यप की अपनी खुजाल है, जिसे मुफ्त में देखने वाले और उनका अपना छोटा सा भक्त वर्ग सराह रहा है। सराहना में कह रहा है कि इस फिल्म के ‘खून में खुशबू’ है। नामाकूलों, खून में खुशबू कब से होने लगी?

शुरूआत में ही डिस्क्लेमर है- यह फिल्म 1960 के वहशी सीरियल किलर रमन राघव पर आधारित नहीं है। रमन राघव ने फुटपाथ पर सोने वाले 41 लोगों को पत्थरों से सिर कुचलकर मार डाला था। इस फिल्म में दूसरा रमन राघव पैदा हुआ, जो आधे से अधिक समय तक रात के अंधेरे में झोपड़पट्टियों में कत्ल ही करता रहता है। कत्ल भी खुद की बहन, 6 शाल के भांजे और जीजा तक के। ये कत्ल देख-देखकर जी उबकाने लगता है। इंटरवल में दर्शक बात करते मिलते है कि अगर पैसे वापस मिल जाए, तो घर चलें।
अनुराग कश्यप ने एक डीसीपी को भी कहानी में जोड़ा है। रमन राघव एक ही व्यक्ति था, लेकिन इस फिल्म में एक रमन है और एक राघव है। पुलिस का डीसीपी ऐसा, जो नशे का धंधा करे, दबाव डालकर नाजायज रिश्ते बनाए और हत्या तक करने से बाज नहीं आए। मुंबई के पुलिस वाले ऐसे, जिनकी तोंद देखकर तारक मेहता के डॉ. हाथी की याद आती है। अच्छा हुआ पहलाज निहलानी ने इस फिल्म के साथ छेड़छाड़ नहीं की, सीधे-सीधे ए सर्टिफिकेट दे दिया। ऐसा लगता है कि उड़ता पंजाब को लेकर हंगामा करने के पीछे अनुराग कश्यप का यहीं इरादा होगा कि इस फिल्म को न छेड़ा जाए।

फिल्म के पंडित कहते है कि यह एक डार्वâ फिल्म है। जिसमें इंसानियत का मीटर शून्य पर ही टिका रहता है। फिल्म आगे बढ़ती जाती है। इंसानियत और मनोरंजन का मीटर वहीं रहता है। हत्याओं को बलि जैसा पवित्र बनाने की कोशिश इस फिल्म में लगती है। मनोरोगी हत्यारा हत्याओं में रस रहता है और अनुराग कश्यप अपेक्षा करते है कि दर्शक भी इसमें रस ले। सनकी हत्यारा अपने आप को यमराज का दूत नंबर 1 कहता है, जो कहता है कि क्राइम का अपना मजा है। सनकी हत्यारे का दावा है कि वह यमराज का सीसीटीवी कैमरा है और यमराज के काम को हल्का करने के लिए मेहनत करता है। सिंपल क्राइम करने में जो आनंद है, वह धर्म की आड़ लेकर हत्या करने या इंसानियत की आड़ लेकर हत्या करने में नहीं है। फिल्म का डायलॉग है- ‘‘आदमी जैसे खाना खाता है, हगता है, वैसे ही क्राइम भी करना चाहता है।’’ फिल्म में महिला पात्र जो भी हैं, वे नैतिकता को नहीं मानती। उनके काम है शॉपिंग करना और पार्टी करना। पैसे तो कोई भी दे जाता है।

अनुराग कश्यप ने इस फिल्म को एक साइको किलर की कहानी के हिसाब से बनाया है। एक छोटे से वर्ग को यह फिल्म पसंद भी आएगी। कॉन अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भी इस फिल्म का चयन हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शायद लोग मुंबई की यहीं तस्वीर देखना चाहते है, जो संवेदनाहीन, कलात्मकताहीन और आधुनिकता से दूर है। एक गाने के बोल है- ‘‘तेरी खाल में रेंगे कीड़ा, तू सच्चा बेहूदा’’। ऐसे गाने पर डांस भी दिखाया गया है। मुझे तो बिल्कुल नहीं पचा। डीसीपी बने विक्की कौशल ने भी एक्टिंग अच्छी की हैं।

अनुराग कश्यप ने रमन राघव में रावण का चेहरा ढूंढने की कोशिश की है, कुछ डायलॉग भी रामायण को लेकर रचे है, लेकिन फिल्म में गंदी गालियों के अलावा गंदी बातें, अपशब्द और फूहड़पन भी बहुत ज्यादा है।
पैसे देकर दिमाग का दही करना हो, गालियां सुननी हो और वक्त जाया करना हो, तो अनुराग कश्यप का यातना शिविर कुछ ही दिनों के लिए है। अगर आप अनुराग कश्यप के भक्त है, तब तो जरूर जाइए। भक्त केवल राजनीति में ही नहीं होते, फिल्मों में भी होते है और फिल्मों को स्टार बांटते रहते हैं।