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फिल्म शोरगुल देखने के लिए सिनेमाघर जाने की जरूरत नहीं है। ऐसा कुछ भी उल्लेखनीय इसमें नहीं है कि टिकट खरीदकर फिल्म देखने जाया जाए। उड़ता पंजाब आगामी पंजाब चुनावों के कारण विवादों में रही, तो शोरगुल उत्तरप्रदेश की राजनीति को लेकर चर्चा में आई। शोरगुल में हिन्दू, मुस्लिम, मस्जिद, मौलवी, बजरंग दल जैसे समूह, प्यार-मोहब्बत, चुनाव, ग्रामीण राजनीति, धार्मिक कट्टरता और उदारता, धूर्त राजनीतिज्ञ, ईमानदार और अवसरवादी दोनों तरह के पुलिस अधिकारी, गोकशीं, भूमि अधिग्रहण, मंदिर निर्माण, गोधरा, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, मलिहाबाद आदि सभी कुछ है। युवा चीफ मिनिस्टर का नाम मिथिलेश है और गृह मंत्री का नाम आलम खान। युवा नेता ओम की भूमिका में जिमी शेरगिल यूपी के प्रमुख नेता और कत्लखानों के मालिक संगीत सिंह सोम लगते है।

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फिल्म में जो भाषणबाजी हुई है, उसमें कहा गया है कि धर्म के आगे इंसानियत कुछ भी नहीं है। हिन्दू धर्म आस्था का धर्म है और तोड़ने नहीं, जोड़ने का काम करता है। इस्लाम में दिखावे के लिए कुछ भी नहीं है। हमें विकास चाहिए। अगर आपको भारत पसंद नहीं, तो हिन्दुस्तान छोड़कर चले जाओ। किसान जिस जमीन पर मालिक की तरह हल चलाते हैं, हाई-वे गुजरने के बाद वहां कारखाने खुल जाते है और किसान वहां मजदूर बनकर रह जाते हैं आदि-आदि। इस फिल्म में एक कहानी के साथ-साथ इतनी कहानियां और इतने कलाकार है कि दर्शक का मन कहीं स्थिर ही नहीं हो पाता।

इस फिल्म में आशुतोष राणा धर्म निरपेक्ष चौधरी के रूप में केन्द्रीय भूूमिका में हैं। उनके साथ जिमी शेरगिल, हितेन तेजवानी, सुहा गेझन, नरेन्द्र झा, अनिरुद्ध दवे, संजय सूरी प्रमुख भूमिका में है। पहले इस फिल्म का नाम फिल्म की नायिका के नाम जैनब पर था। बाद में इसे शोरगुल कर दिया। हिन्दू युवक और मुस्लिम युवती के प्रेम से शुरू हुई कहानी कब सांप्रदायिक दंगे में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। लखनऊ के कई दृश्य इस फिल्म में है, जो उसे वास्तविकता के धरातल पर ले जाते है। गोधरा और गौ-हत्या के संदर्भ के कारण फिल्म प्रमाणन बोर्ड में यह फिल्म अटकी रही। विश्व हिन्दू परिषद ने भी इस फिल्म पर आपत्ति की थी। मौलवियों ने फिल्म के खिलाफ फतवा भी जारी किया है। कॉपीराइट संबंधी मामलों में भी फिल्म उलझी रही।

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फिल्म में दंगे के कई दृश्य दिखाए गए है। इनमें से कुछ ह्रदयविदारक भी है, लेकिन फिर भी फिल्म कोई छाप नहीं छोड़ पाती। संगीत जरूर अच्छा है, लेकिन पूरी फिल्म में उथलापन नजर आता है। फिल्म देखते ही समझ में आ जाता है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, आजम खान, संगीत सोम वैâसी राजनीति करते है? यह फिल्म कोई बॉयोपिक नहीं है। सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि में प्रेम कहानी पर पहले भी बहुत सी फिल्में बन चुकी है और उनमें से कुछ यादगार भी है। किसी भी क्षेत्र में फिल्म उल्लेखनीय नहीं कहीं जा सकती।

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