रूस्तम की खूबी यह है की ढाई घंटे की यह फ़िल्म दर्शक को कुर्सी पर बैठे रहने को बाध्य कर देती है। 1959 में मुम्बई में हुए नानावटी हत्याकांड से प्रेरित इस फ़िल्म में हत्याकांड के बाद सेना के स्कैम, न्याय व्यवस्था, अखबार की तरफ से हत्यारे के पक्ष में जनमत बनाने की कोशिश, हत्यारे और जिसकी हत्या हुई, उसे उसकी जाति और धर्म देखकर माहौल बनाने की कोशिश की रोचक प्रस्तुति है।
फ़िल्म का एक संवाद है कि जूरी बाद में फैसल डटी है, पहले जनता निर्णय सुना देती है। इस काण्ड की रिपोर्टिंग कर कर के चवन्नी में बिकनेवाले टेबलॉयड, 50 पैसे, फिर 1 रूपया और 2 तथा 5 रुपये में बिकने लगता है।
नेवी का अधिकारी अक्षय कुमार अपनी पत्नी इलियाना डी क्रूज़ के आशिक की ड्यूटी गैन से हत्या कर देता है। फिर खुद ही सरेंडर कर देता है, और नौसेना की मदद नहीं लेता। नौसेना की ऑफिसर्स मे के बजाय पुलिस लॉक अप में रहना पसंद करता है। हत्या के मामले में भी वह वकील नहीं करता और कहत है कि वह आगे उच्च अदालत में नहीं जायेगा। वह अपना केस खुद लड़ता है और हीरो तो हीरो है, उसे ही जीतना है।

एक हत्यारे से जनता की सहानुभूति बताती है कि हम भावनाओं के सहारे जीते हैं।
इस फ़िल्म में अक्षय कुमार के अलावा इलियाना के पास भी बहुत कुछ करने को था, जिसे वह अच्छी तरह निभाती है। पूरी फ़िल्म में अक्षय कुमार अपना वुडन फेस लिये रहते हैं।

रूस्तम एक कसी हुई फ़िल्म है। दर्शक को बांधे रखती है। गानों की जरुरत नहीं थी, पर डाले गए हैं। एक बेवफा पत्नी के प्रति हीरो का समर्पण दर्शकों को कुछ अजीब कल्लाजी सकता है, जिसे परिस्थिति जन्य बताया गया है। यह सप्ताह फ़िल्म प्रेमियों के लिए अच्छा है, जिसमें दोनों फ़िल्में देखी जा सकती हैं।