
बार-बार देखो की कहानी अकल्पनीय तरीके से आगे बढ़ती है। दर्शक जो अनुमान लगाता है, वैसा कुछ नहीं होता और दर्शकों के सारे गणित फेल हो जाते हैं। फिल्म कहती है कि जिंदगी गणित नहीं कि हर बार दो और दो का जोड़ चार ही हो। वैसे भी गणित क्लास रूम और बैंक में ही अच्छा लगता है। असल जिंदगी में बैलेंस बहुत जरूरी है और बैलेंस के बिना तो गणित में भी कोई इक्वेशन परफेक्ट नहीं होती। महानगरीय मेच्योर दर्शकों के लिए है यह फिल्म। एक बार तो इसे देख सकते है।

फिल्म का हीरो सिद्धार्थ मल्होत्रा शाहरुख खान की नकल करता लगता है और कैटरीना कैफ ने अपने आप को ही दोहराया है। गणित के प्रोफेसर बने सिद्धार्थ मल्होत्रा वैदिक मैथेमेटिक्स में विशेषज्ञ है, लेकिन जिंदगी को भी वे गणित समझ लेते है। कैटरीना कैफ मॉडर्न आर्ट की एक ऐसी चित्रकार हैं जो कहती हैं कि जो समझ में न आए वहीं मॉडर्न आर्ट है। कैटरीना फिल्म में दिया कपूर हैं, जिसे हीरो हमेशा डीके कहता है, मानो वह कोई डॉन हो। कैटरीना के पिता बने है राम कपूर जो हनुमान जी के परम भक्त है और चावल के दाने पर लिखे हनुमान चालीसा अपने दामाद को भेंट करते है। हीरो की मां के रूप में पुराने जमाने की सारिका को देखना अच्छा नहीं लगता।

दो परिपक्व लोगों के अहंकारों की लड़ाई को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन इस फिल्म में इसे जिस तरीके से पेश किया गया है, वह बेहद दिलचस्प है और अनपेक्षित भी। फिल्म का संदेश यहीं है कि बीते कल की चिंता मत करो और आने वाले कल से घबराओ मत। जो भी है, बस यहीं एक पल है। इसी को जीना सीखो, तो जीवन सार्थक होगा। बड़ी नहीं, छोटी बातों पर ध्यान दो, छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दो।
महानगरीय नौजवानों की तरह इस फिल्म के हीरो को भी आगे बढ़ने की जल्दी रहती है और उसके लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहता है। उसमें अहंकार भी होता है और अज्ञानता भी। जो छोटी-छोटी बातें एक आम आदमी अच्छी तरह समझता है, गणितज्ञ हीरो नहीं समझ पाता, जो पता नहीं यूजीसी की कौन सी स्कीम में इतनी जल्दी प्रोफेसर बन जाता है। जल्दी भी उसे इतनी है कि शादी के सात फेरों की जगह तीन फेरों में काम चला लेना चाहता है। शादी के सात बंधन उसे बकवास लगते है और केवल अपनी इच्छा ही सबसे ऊंची लगती है।

फिल्म में रोमांस, इमोशन, कॉमेडी, ट्विस्ट, ट्रेजडी सभी कुछ है। टाइम मशीन की तरह फिल्म दर्शकों को 2023, 2036 और 2047 तक ले जाती है। अनेक दर्शक ऐसे में अपने आप को हीरो की जगह रखकर देखते हैं। शादी के एक दिन पहले ही हीरो को ‘टाइम ट्रेवल करने का पॉवर’ मिल जाता है और वह कभी थाईलैण्ड में हनीमून मनाता दिखता है, तो कभी कैम्ब्रिज में प्रोफेसरी करते। टाइम मशीन ही बताती है कि कैसे उसके अपने ही उससे दूर चले जाते है और अंत में जब उसे पता चलता है कि वह जिसकी कल्पना कर रहा था, ऐसा कुछ भी नहीं, तब वह धड़ाम से जमीन पर गिरता है और वापस किसी आम आदमी की तरह बर्ताव करने लगता है।

नित्या मेहरा की निर्देशित यह पहली फिल्म है। उन्होंने फिल्म के कलाकारों से अच्छा काम कराया है। खासकर सिद्धार्थ मल्होत्रा और कैटरीना कैफ से। राम कपूर, सारिका और सयानी गुप्ता भी ठीक-ठाक है, लेकिन पूरी फिल्म सिद्धार्थ और कैटरीना के ईद-गिर्द ही घूमती है। आन्विता दत्ता के कुछ डायलॉग बहुत अच्छे है। गानों में नए-नए प्रयोग है। सुुंदर लोकेशन्स है। टीन एज के दर्शकों को फिल्म थोड़ी कम पसंद आएगी।