
'नो' केवल एक शब्द नहीं है। यह अपने आप में पूरा वाक्य है। 'नो' मतलब नहीं। नहीं के आगे कुछ नहीं, पीछे भी कुछ नहीं। यह पिंक फिल्म का यादगार डॉयलॉग है। बहुत मायने हैं इसके। फिल्म हटकर है।अगर आप मस्ती या मनोरंजन के लिए फिल्म देखते हैं तो 'पिंक' मत देखिए, क्योंकि यह अलग फिल्म है। यह आपको झिंझोड़कर रख देगी। शायद इसीलिये यह फिल्म अच्छा बिजनेस करेगी। अगर कभी आपको पुलिस थाने या कोर्ट-कचहरी जाना पड़ा हो तो लगेगा कि आपकी अपनी कहानी है।वहां कैसे पीड़ित पक्ष अपराधी दिया है और अपराधी को पीड़ित पक्ष। फ़िल्म में मसाले झोंकने की अनंत संभावनाओं के बाद भी फालतू मसाले नहीं डाले गए हैं, केवल जरूरत के मसाले जरूर हैं.
यह कोर्ट रूम ड्रामा है जो 'रुस्तम' जैसा नहीं, कुछ अलग है। यह पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों से अलग एक हिन्दू, एक मुस्लिम और एक ईसाई लड़की की कहानी है, जिनके बीच कभी धर्म की बात नहीं आती. तीनों लड़कियां रहती ही इस तरह हैं कि वे लगती हैं। शहरी मध्यवर्ग की ये वर्किंग गर्ल्स करोलबाग (दिल्ली), लखनऊ और पूर्वोत्तर से आकर नौकरी करती है और तीनों मिलकर अलग फ्लैट लेकर साथ रहती हैं. तीनों अलग अलग नौकरी हैं। उनके निजी बॉयफ्रेंड्स भी हैं, कभी - कभार ड्रिंक, पार्टी-शार्टी भी कर लेती हैं. एक रॉक कंसर्ट के बाद वे सूरजकुंड में पार्टी करने जाती हैं, वहां साथ जबरदस्ती करने की हरकत होती है, लेकिन पुलिस और न्याय व्यवस्था के लचर और भेदभावपूर्ण रवैये के चलते और मामले में प्रभावशाली लोगों के कारण पीड़ित लड़कियों को अपराधी साबित करने की कोशिश होती है।
कहावत है न, जाको राखे साइयां, मार सके न कोय; वैसे ही जाको हो अमिताभ बच्चन; हरा सके है कोय? लड़कियों का अमिताभ के मोहल्ले में रहना उन्हें बचा जाता है। अमिताभ बुजुर्ग हैं तो क्या; वकील हैं तो दूध का दूध, पानी का पानी होकर रहता है। इंटरवल के ठीक पहले तीनों लड़कियों में से हत्या की कोशिश में फंसी लड़की (तापसी पन्नू) को जमानत मिल जाती है और कहानी ख़त्म होने के पहले न्याय ! बात सेव गर्ल से हटकर सेव बॉय तक पहुँच जाती है। अगर सभी लड़के तमीज़दार हों तो लड़कियां तो सुरक्षित अपने आप ही हो जाएँगी।
कोर्ट में बहस करते - करते अमिताभ समाज में प्रचलित चार नियम बताते हैं -- लड़के शराब पीयें तो कोई बात नहीं, लड़कियों को नहीं पीना चाहिए? लड़के और लड़कियों के लिए घड़ी के कांटे अलग-अलग नैतिकता सिखाते हैं; लड़के चाहे जो पहनें, लड़कियां अगर स्कर्ट पहनेंगी, शराब पीयेंगी तो उन्हें 'चालू' समझा जाएगा! अगर लड़कियां समाज में अपना स्वाभाविक व्यवहार भी प्रकट करती हैं; हंसकर, छूकर बातें क्या कर लें तो लोग कल्पना कर लेते हैं कि वह बदचलन टाइप की होगी। फ़िल्म में सारा घटनाक्रम प्रतीकों और ध्वनि संकेतों में व्यक्त किया गया है। यही इस फिल्म की खूबी भी है।

फिल्म के टाइटल्स में सबसे पहले तापसी पन्नू का नाम आता है , फिर कीर्ति कुल्हारी और एंड्रिया तारियांग का ! अमिताभ फिल्म के प्रमुख पात्र हैं, पर हीरो नहीं, इसलिए उनका नाम चौथे क्रम पर रखा गया। तापसी पन्नू दक्षिण भारत की सुन्दरतम हीरोइन्स में से हैं, लेकिन इस फिल्म में उनकी सुंदरता का बेजा उपयोग नहीं किया गया। पीयूष मिश्रा को अमिताभ के सामने खड़े वकील के रूप में पेश किया गया है। उनकी एक्टिंग वकील की कम, कॉमेडियन की ज़्यादा लगती है। बेहद निराश किया पीयूष मिश्रा ने। अमिताभ बच्चन को एक बुड्ढे वकील के रूप में ज़्यादा ज़िद्दी और बुड्ढा दिखाया गया है। खलनायक अंगद बेदी ठीक ही रहे।
16 Sept 2016