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संगीत को आधार बनाकर कई फिल्में बनी है, जिनमें सबसे घटिया फिल्म कही जा सकती है बैंजो। गणपति बप्पा और शिर्डी के सांई बाबा के गाने भी इस फिल्म को फ्लॉप होने से नहीं रोक सकते। गणपति बप्पा और सांई बाबा को लेकर आखिर कोई कितनी इमोशनल हो? जैसे कोई खीर बनाने बैठे और उसमें भरपूर अदरक, लहसुन और हींग का बघार लगा दे, ऐसी ही है बैंजो। देखने जाओ तो फिल्म के समापन की दुआ करो। तमाम मसालों के बाद भी उबकाई ही आती है। रितेश देशमुख को लगता है कि अब वे सुपर हीरो बनने के लायक हो गए हैं। आपके पिताजी बड़े नेता थे, आप जेनेलिया से शादी कर चुके, तो क्या सुपर हीरो हो गए? संगीतमय फिल्म के नाम पर भड़भड़कूटा कितना झेलें?

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रवि जाधव मराठी फिल्मों के अच्छे डायरेक्टर माने जाते हैं। वे रितेश देशमुख के दोस्त भी हैं। यह दोस्ती बड़ी जानलेवा साबित होगी। दर्शक अगर अपने साथ ग्लिसरीन की बोतल लेकर भी जाएं, तो इस फिल्म में इमोशनल नहीं हो पाएंगे। आखिर कहानी में कुछ तो दम हो। इस फिल्म में एक डायलॉग है- ‘तुझे मारुंगा नहीं, बजा के जाऊंगा।’ पूरी फिल्म में रवि जाधव और रितेश देशमुख ने दर्शकों की बजाई है।

इस फिल्म में कहने को संगीत है, लेकिन साथ ही करप्शन, झोपड़पट्टियां, प्यार-मोहब्बत, गुंडागर्दी, संघर्ष, भू-माफिया, डॉन, भ्रष्ट नेता, कॉमेडी, मारपीट, पुलिसिया अत्याचार सभी कुछ ठूंस दिया है और सबकुछ इतना सतही है कि दर्शक कहीं ठहर ही नहीं पाता। झोपड़पट्टी वाले कोई मूर्ख नहीं होते, म्युजिक पार्टी वाले जानते है कि ग्रुप में काम करने का कितना फायदा है। नरगिस फाखरी को जिस वजह से मुंबई आना दिखाया गया है, वह भी अस्वाभाविक लगता है।

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इस फिल्म को बनाने के पीछे एक ही मकसद नजर आता है, वह है किसी तरह रितेश देशमुख को बॉलीवुड में बनाए रखना। अभी तक तो रितेश देशमुख ने ऐसी कोई प्रतिभा नहीं दिखाई है कि लोग उनके दीवाने हो जाए। इस फिल्म में भी ऐसी कोई प्रतिभा देखने को नहीं मिली। फिल्म के माध्यम से बैंजो बजाने वालों को जो इज्जत दिलाने की कल्पना उन्होंने की होगी, वह इस फिल्म में साकार नहीं होगी। रितेश देशमुख ने इस फिल्म की तुलना रॉकस्टार से की थी, लेकिन वह तुलना भी सही नहीं कही जा सकती। फिल्म में नरगिस फाखरी अमेरिका से आई संगीतकार है, जो हंसते-रोते, गाली बकते, इमोशनल होते, नाचते सभी में एक जैसी लगती है। उसे हिन्दी और एक्टिंग दोनों सीखने की जरूरत है।

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बॉलीवुड में संगीत पर आधारित अनेक शानदार फिल्में बन चुकी है। बेजू बावरा से लेकर सुर तक और आशिकी से लेकर अभिमान तक, लेकिन ऐसी वाहियाद फिल्म है बैंजो, जिसमें संगीत की ही बैंड बजा दी गई।

इसी फिल्म का एक डायलॉग है, जिसमें रितेश देशमुख कहते है कि जिंदगी आपको दो च्वाइस देती है। कहा जा सकता है कि इस शुक्रवार को बॉलीवुड ने आपको चार च्वाइस दी है, जिसमें से एक च्वाइस बैंजो भूलकर भी मत देखिए।

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