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अगर आपकी रूचि क्रिकेट में बिलकुल नहीं है, तब भी एम.एस. धोनी की अनकही कहानी को देखने जा सकते है। फिल्म देखनीय है। धोनी के जीवन पर बनी इस फिल्म में कोई भी खलनायक नहीं है। कई फिल्मों में वक्त को खलनायक दिखाया जाता है, लेकिन यहां वक्त भी खलनायक नहीं है। खेल के नाम पर भीतरी राजनीति को उभारा जाता है, वह भी यहां नहीं है। यह एम.एस. धोनी पर बनी रोमांटिक बॉयोपिक है। जिसमें सबकुछ स्वाभाविक ढंग से चलता रहता है। सारे दृश्य ईमानदारी से चित्रित किए गए लगते है और स्वाभाविकता के एकदम करीब। धोनी के जीवन से जुड़े अनेक विवादास्पद मुद्दों को गायब कर दिया गया है और टीम इंडिया के अन्य खिलाड़ियों के लिए इसमें कोई खास जगह नहीं है। माही और साक्षी की प्रेम कहानी के अलावा इसमें माही के पहले प्रेम प्रसंग को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। फिल्म बताती है कि एम.एस. धोनी में जोखिम उठाने का माद्दा है, नेतृत्व की क्षमता है, अपनी बातों पर दृढ़ रहने की शक्ति है, वह सकारात्मक है और प्रतिभा तो है ही। इन सब कारणों से तीन घंटों से भी लंबी फिल्म दर्शनीय बन गई है।

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फिल्म में कई छोटी-मोटी दिलचस्प घटनाएं है, जिनके बारे में कम लोग ही जानते है, जैसे धोनी के पिता क्रिकेट ग्राउंट में पंप ऑपरेटर थे। उन्होंने अपने मित्र संतोष से हेलीकॉप्टर शॉट लगाना सीखा था, जिसको थप्पड़ शॉट कहा जाता था और इसे सीखने के लिए धोनी ने एक समोसे के रूप में कीमत अदा की थी। जिस वक्त धोनी का सिलेक्शन भारतीय क्रिकेट टीम में हुआ, तब वे टेनिस खेल रहे थे। फिल्म में धोनी की नाकामियों का भी जिक्र है, जैसे वे युवराज सिंह के स्टाइल से पिछड़ जाते है। दुलीप ट्रॉफी में उनका न पहुंच पाना और रेलवे में टिकिट कलेक्टर की नौकरी करना। फिल्म देखने पर ऐसा लगता है कि रेलवे की उनकी नौकरी उनके जीवन में भले ही निर्णायक रही हो, लेकिन उस नौकरी के तीन साल उन्होंने बड़ी मुश्किल से काटे थे।

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फिल्म की कहानी धोनी के पैदा होने से लेकर 2011 तक के उनके विश्वकप तक के सफर की है। फिल्म में धोनी तीन सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर करने की मांग करते हैं, लेकिन उन खिलाड़ियों के नाम फिल्म में नहीं है, माना जाता है कि ये तीन खिलाड़ी सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और सचिन तेंडुलकर थे। फिल्म के अनुसार धोनी की मां उनके मैचों के दौरान मैच देखने के बजाय पूजा करने में भरोसा करती थी और जब भी वे पूजा करती थी, धोनी और उनकी टीम जीतती थी।

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इस पूरी फिल्म की खूबी यह है कि इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता। यह फिल्म धोनी के रोमांटिक जीवन की कहानी लगती है, जिसमें उनके जीवन में आई पहली लड़की प्रियंका झा (दिशा पाटनी) से उनकी प्रेम की कहानी है, जो अधूरी रह जाती है। साक्षी (कियारा आडवाणी) से उनकी मोहब्बत की कहानी भी काफी हद तक दोहराव जैसी ही होती है। अनुपम खेर ने धोनी बने सुशांत सिंह राजपूत के पिता का रोल किया है और भूमिका चावला ने धोनी की बहन की भूमिका निभाई है। जिसका मुख्य काम घर में बैठकर धोनी के मैच देखना ही होता है। फिल्म में आठ गाने है और वे सुमधुर है। पलक मुछाल और अमान मलिक का गाया हुआ एक गाना भी है, जो सुंदर तरीके से फिल्माया गया है। यह फिल्म हिन्दी के अलावा मराठी, तमिल और तेलुगु में भी रिलीज हुई है। पलक मुछाल ने दूसरी भाषाओं में भी गाने गाए है। पाकिस्तानी कलाकार फवाद खान ने विराट कोहली का छोटा सा रोल किया है।

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यह फिल्म सहज कहानी और सुंदर फिल्मीकरण तथा एम.एस. धोनी के कारण सुपरहीट होगी, इसमें कोई शक नहीं। सुशांत सिंह राजपूत ने महेन्द्र सिंह धोनी की भूमिका बहुत ही सहजता से की है। निर्देशक नीरज पांडे ने अपनी पुरानी लीक को तोड़ा है।

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