
31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए हिन्दू-सिख दंगों को सपाट तरीके से बयान करती है यह फिल्म। इसे करीब 13 महीने पहले रिलीज होना था, लेकिन कई कारणों से और नौ प्रमुख दृश्यों को काटने के बाद ए सर्टिफिकेट मिलने पर यह फिल्म अब जाकर सिनेमाघरों में लगी है। यह कोई कला फिल्म नहीं है। फिल्म के प्रचार के लिए भी कई तरह के हथकंडे अपनाए गए थे, जैसे पंजाब चुनाव में इसका लाभ लेने के लिए सोहा अली खान ने कुछ सिख संगठनों के साथ मोमबत्ती जुलूस निकाला था। फिल्म में जगदीश टाइटलर से मिलते-जुलते किरदार को भी दिखाया गया है, जो सिखों के खिलाफ हिन्दुओं को भड़काता है। गनीमत यह है कि फिल्म में कुछ ऐसे हिन्दू चरित्र भी रखे गए है, जो अपनी जान को जोखिम में डालकर सिख परिवारों को बचाने में लगे थे।
पौने दो घंटे की फिल्म खत्म होने पर पर्दे पर दिखाया गया है कि 32 साल बाद भी 1984 के दंगों में मरने वाले 2186 लोगों की हत्या के दोषी लोगों को सजा नहीं मिली है। वैसे लोग कहते है कि उस दंगे में करीब 9 हजार लोग मारे गए थे। आखिरी दृश्य में बूढ़े हो चुके वीर दास की पुरानी अखबारी कतरनों की फाइल सोहा अली खान फाड़ देती है और कहती है कि क्या इतने साल बाद भी अब न्याय की आशा है?

फिल्म प्रमाणन बोर्ड को इस बात पर आपत्ति थी कि इस फिल्म के कुछ दृश्य और संवाद एक धर्म विशेष को लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने वाले थे, जिन्हें छोटा किया गया। फिल्म देखते वक्त आपका मन विष्तृष्णा से भर जाता है। फिल्म में तीन गाने भी रखे गए है, जो मधुर है, लेकिन दंगे की मारकाट के बीच उनकी मधुरता भी कान में सीसा उंडेलती सी लगती है।
31 अक्टूबर के पहले पंजाब में चल रहे खालिस्तानी आंदोलन की भी चर्चा की गई है और सतवंत सिंह व बेअंत सिंह द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या को भी दिखाया गया है। सतवंत और बेअंत दोनों श्रीमती इंदिरा गांधी के अंगरक्षक थे और उनके द्वारा श्रीमती गांधी की हत्या के बाद एक वर्ग विशेष का गुस्सा सिख धर्म के लोगों के खिलाफ उतरा। फिल्म में दिखाया गया है कि दो सिरफिरों के अपराध की सजा पूरे समाज को नहीं दी जा सकती। यह भी बताया गया है कि किसी भी समाज में अच्छे और बुरे लोग दोनों होते है। जब भी ऐसे दंगे होते है, तब सजा तो आम आदमी भुगतता है, लेकिन असामाजिक तत्व उस मौके का फायदा उठाकर लूटपाट से भी नहीं हिचकिचाते। जान बचाने के लिए केश काटने का प्रसंग भी फिल्म में है और हिन्दुओं की रक्षा के लिए सिखों द्वारा दिए गए बलिदान का जिक्र भी। कनाडा से आए एक एनआरआई सिख को भी दिखाया गया है, जो अपने गोरे रंग और छोटे बालों के कारण दंगों के बावजूद बच गया था।
फिल्म में दिखाया गया है कि हिन्दू-सिख दंगे के दौरान दिल्ली की पूरी पुलिस या तो खामोश रही या दंगाइयों के साथ रही। मौका मिला, तो उसने भी लूटपाट और वसूली की कोशिश की। जिस जघन्य तरीके से निर्दोष लोगों को मारा गया, महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया और इंसानियत को तार-तार कर दिया गया, उसकी झलक देखते ही मन व्याकुल हो उठता है।

मराठी फिल्म धग के डायरेक्टर शिवजी लोटन पाटिल द्वारा निर्देशित यह फिल्म कई फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी है। सोहा अली खान ने तीन बच्चों की मां सरदारनी की भूमिका निभाई है और उनके पति बने है वीर दास। दोनों ने पंजाबी लहजे में बातचीत करने की कोशिश की है, लेकिन पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए। दीपराज राणा, लखविंदर सिंह और नागेश भोंसले भी अपने-अपने किरदारों में ठीक ही रहे। इस फिल्म में दृश्यों के दोहराव बहुत ज्यादा है और मिलते-जुलते दृश्य भी बहुत है। निर्देशक ने इसे प्रेम कहानी के रूप में चित्रित करने के बजाय पारिवारिक कहानी के रूप में चित्रित करने की कोशिश की है। कई लोगों को इस फिल्म की पटकथा और संवाद अदायगी पर ऐतराज हो सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि निर्देशक ने जान-बूझकर पूरी कहानी को सपाट तरीके से चित्रित किया है और अति नाटकीयता से बचने की कोशिश की। फिल्म में बंबइयां मसाला नहीं है और गंभीर विषय पर फिल्म सीधे-साधे तरीके से आगे बढ़ती जाती है।

फिल्म के आखरी दृश्यों तक आते-आते दर्शक समझ जाता है कि उन हालात के लिए कौन जिम्मेदार रहा होगा? फिल्म के सभी किरदार साधारण से लोग है और वे साधारण जीवन जीते है। संकट की घड़ी में वे एक-दूसरे को बताने की कोशिश करते है, जिनमें से कुछ किरदार दुस्साहसी है और न्याय के लिए कार्य करते है। इस फिल्म को 1984 के दंगों में मृत लोगों के प्रति श्रद्धांजलि बताया गया है और यह दुआ की गई है कि आगे कभी भी धरती पर किसी भी समुदाय के लोगों को ऐसे बुरे दिन देखने को नहीं मिले।
चेतावनी : अगर आप मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाते है, तो यह फिल्म देखने न जाएं।