
बहुत दिन बाद ऐसा दृश्य देखने में आया, जब सिनेमा घर के दर्शक फिल्म खत्म होने के पहले ही उठ-उठकर जाने लगे। यह फिल्म एनआरआई लोगों के लिए एनआरआई की कहानियों को लेकर है। इसका नाम होना था - ये फिल्म झेलना है मुश्किल। इसकी कहानी रोमांस-वोमांस पर केन्द्रित नहीं है, यह है सनकी एनआरआई लोगों के एकतरफा प्यार और नफरत की कहानियों की। ए दिल है मुश्किल से ऐसी आशा तो नहीं थी। यह फिल्म बनी ही है अपने निजी जेट विमान में यात्रा करने वाले ऐसे एनआरआई रईसों के लिए, जिनके लिए भारत भी किसी फॉर्मूले फिल्म की तरह है। ये लोग लंदन, पेरिस या वियना में भी हिन्दी में गाना गाते है और विदेशी उसको सुनते और सराहते है। इन करोड़पति आशिकों के लिए नौकरी-धंधा, रोजी-रोजगार, घर-परिवार आदि की अहमियत कुछ नहीं है। ये लोग कुत्तों की तरह झगड़ते भी है और कुत्तों की तरह ही प्यार करने लगते हैं। यहीं कहना चाहते है करण जौहर इस फिल्म में। इमोशन का इतना ज्यादा बघार लगाया है कि दर्शकों को चाहिए कि वह ग्लीसरिन की बोतल साथ लेकर जाए, क्योंकि टसुए बहाते हीरो-हीरोइन को देखकर आपकी आंखों में तो आंसू नहीं आएंगे।

करण जौहर को मनसे का आभारी होना चाहिए कि उसने विरोध करके इस फिल्म का नाहक प्रचार कर दिया। इसमें करण जौहर की पुरानी फिल्मों का मसाला तो है ही, शाहरुख खान, आलिया भट्ट, फवाद खान आदि भी है। ऐश्वर्या राय बच्चन इसमें ट्रेलर में दिखाए गए दृश्यों से थोड़ी ही ज्यादा है। ऐश्वर्या का आगमन भी इंटरवल के बाद होता है। सिंथेटिक इमोशन से भी जब करण जौहर का मन नहीं भरा, तब उन्होंने अनुष्का शर्मा को फोर्थ स्टेज का कैंसर दिखा दिया। कैंसर के इन दृश्यों में उसका टकला सिर ऐसा दिखाया, जैसा किसी सेलोन से कोई चम्पी कराकर आता है। एक-दो दृश्यों को छोड़ दे, तो फोर्थ स्टेज के कैंसर वाली अनुष्का सामान्य सी रहती है।

इस फिल्म में कहानी नहीं है, कहानियां है। वैसे भी बॉलीवुड में कहानियों की भारी कमी है और अगले दो महीनों में ही चार ‘दो नंबर’ की फिल्में आने वाली है (फोर्स-2, रॉक-ऑन-2, कहानी-2, तुम-बिन-2)। जब तक दर्शक किसी कलाकार से जुड़ाव महसूस करता है, तब तक कहानी बदलने लगती है। सास-बहू के सीरियलों से भी एक कदम आगे इस फिल्म में हर कोई किसी से भी प्यार करता है और वापस चला जाता है। फिर वापस आ जाता है। ऐश्वर्या शाहरुख खान के करीब आती है, फिर दूर चली जाती है। फिर एक ही मुलाकात के बाद रणबीर कपूर के साथ आती है और उसका भगा देती है। फवाद खान और अनुष्का कुत्ते-बिल्ली की तरह मिलते और बिछड़ते है। फवाद खान लीजा हेडन के संसर्ग में आता है और फिर चला जाता है, फिर अनुष्का के साथ आता है, फिर चला जाता है। रणबीर कपूर बारी-बारी से लीजा हेडन, अनुष्का शर्मा और ऐश्वर्या राय के साथ प्रेम की पींगे भरता है और फिर दूर चला जाता है। फिल्म में प्यार वैसा ही दिखाया गया है, जैसे कुत्ते-बिल्लियों का होता है। लगता है सारे एनआरआई केवल करण जौहर की फिल्में देखते है, बेचारे सूरज बड़जात्या की फिल्में तो देखते ही नहीं। लंदन, पेरिस और वियना में बैठकर भी वे नूरजहां के गाने सुनते है और ‘आज जाने की जिद न करो’ गुनगुनाते है।

करण जौहर ने इस फिल्म के बारे में कहा है कि यह फिल्म एकतरफा मोहब्बत की ताकत बताने के लिए है। फिल्म के प्रचार में पहले ही करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके है और इसके पेड रिव्यू और ट्रेलर हर जगह उपलब्ध है। कमाल खान कमाल जैसे शख्स भी करण जौहर से पंगा लेना नहीं चाहते, सो वे अजय देवगन से पंगा लेने में बिजी हो गए। एनआरआई लोगों का एक वर्ग और महानगरों के युवाओं का एक वर्ग इस फिल्म को पसंद करेगा। अरिजित के गाये गाने अच्छे बने है और लोकप्रिय भी हुए है, उसका सहयोग इस फिल्म को जरूर मिलेगा। करण जौहर का तथाकथित सूफियाना प्यार सिंगल स्क्रीन थिएटर और छोटे शहर के लोगों को तो शायद ही पचेगा। इस साल कोई बड़ी रोमांटिक फिल्म नहीं लगी है। उसका फायदा भी इस फिल्म को मिल सकता है।
रणबीर कपूर ने इस फिल्म में कई जगह शम्मी कपूर की झलक दी है। फवाद खान की जगह कोई मवाद खान भी होते, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐश्वर्या और रणबीर के अंतरंग दृश्यों में दोनों ही थोड़े असहज लगे। न ही ऐश्वर्या उतनी सुंदर लगी। कुल मिलाकर इस फिल्म का हर पात्र ऐश्वर्या, रणबीर, अनुष्का, लीजा हेडन, फवाद खान, शाहरुख खान ऐसी हरकतें करते है, जिसे समाज में अनैतिक कहा जाता है। इन लोगों को अपनी हरकतों पर फख भी होता है। लखनऊ की एक शादी दिखाई गई है, जिसमें पूरा पंजाबी माहौल और पंजाबी गाने होते है।