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कितना अच्छा है कि फरहान अख्तर को अजय देवगन वाली बीमारी नहीं है। प्रोड्यूसर होते हुए भी इस फिल्म में वे हीरो जरूर है, लेकिन श्रद्धा कपूर, अर्जुन रामपाल, पूरब कोहली, प्राची देसाई आदि के लिए भी थोड़ी जगह छोड़ी है। वरना शिवाय में जिस तरह अजय देवगन ही अजय देवगन है, वैसे ही इसमें भी फरहान ही फरहान होते। आमतौर पर संगीत पर केन्द्रित फिल्में लोग पसंद करते हैं। रॉक ऑन के 8 साल बाद आई रॉक ऑन-2 भी पसंद की जाएगी। फरहान अब रॉक ऑन-3 की तैयारी में जुुट गए हैं।

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रॉक ऑन-2 की कहानी रॉक ऑन की कहानी को ही आगे बढ़ाती है। सही मायने में यह रॉक ऑन का सीक्वल है। जिस तरह हर जेनर की फिल्म का एक फॉर्मूला होता है, इस फिल्म का भी एक फॉर्मूला है। संगीत, संगीत की पवित्रता, पुराने जमाने का संगीत, फ्यूजन, स्थापित कलाकार, नए कलाकार, कलाकारों में द्वंद, कलाकारों के अहम, व्यावसायिकता का दौर आदि इस फिल्म में भी दिखाए गए है। कमर्शियल टाइप का संगीत भी है। संगीतकार की संगीत से असहनीय दूरी, को-ऑपरेटिव सोसायटी टाइप एनजीओ बनाना, गांव में स्कूल खोलना, नेताओं के भ्रष्ट दामाद, असामाजिक तत्वों की खलनायकी जैसी सभी चीजें बड़े ही स्टीरियो टाइप अंदाज में इस फिल्म में है, लेकिन फरहान अख्तर की एक्टिंग, मेघालय की सुंदर वादियों में फिल्माए गए दृश्य, फिल्मीकरण की संजीदगी इसके अच्छे पहलू हैं। शिलांग को रॉक म्युजिक का नगर माना जाता है। उत्तरपूर्व राज्य मेघालय को फिल्माने का फैसला भी सराहनीय है, क्योंकि उत्तरपूर्व से बॉलीवुड के दर्शकों की पहचान अभी नहीं हुई है। फरहान अख्तर और श्रद्धा कपूर ने इस फिल्म में अभिनय भी किया है और गाया भी। फिल्म में म्युजिक रिएलिटी शो की हकीकत की झलक भी देखने को मिलती है, जहां नए गायक के लिए सुर से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, उसका इंटरटेनिंग होना, ताकि शो टीआरपी बटोर सके। फिल्म का एक संवाद है कि आजकल गायक दिल की आवाज में नहीं गाते, क्योंकि मार्केट में जो बिकता है, वहीं उनकी दिल की आवाज बन जाता है।

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‘‘गुजरे हुए जमाने को एक पीस में वापस लाना आसान नहीं।’’ फिल्म में फरहान अख्तर गुजरे वक्त को एक पीस में लाने की कोशिश में लगा रहता है। एक नवोदित कलाकार की उपेक्षा और उस कलाकार की आत्महत्या उसे झकझोर देती है और वह पूर्वोत्तर के गांव में जाकर एनजीओ खोल लेता है। वह गांव में स्कूल भी खोलता है, लेकिन अपने अतीत से छुटकारा नहीं पा पाता। वहीं से उसकी कहानी आगे बढ़ती जाती है और अंत में वह उससे मुक्त हो जाता है। फरहान के टूटे दिल की आवाज श्रद्धा कपूर सुन लेती है, क्योंकि ‘दिल टूटने की आवाज वे ही सुन सकते है, जिनका दिल टूटा हो।’ लेकिन यह क्या, दूसरे का टूटा दिल जोड़ते-जोड़ते वह अपनी पत्नी प्राची देसाई का दिल तोड़ देता है। वह गायक है, इसलिए दिल तोड़ने का कॉपीराइट तो उसी के पास है।

कला फिल्मों में भी फॉर्मूले होते है। वे फिल्में कला फिल्मों के फॉर्मूलों से सजती है। कमर्शियल फिल्में, कमर्शियल फॉर्मूलों से सजी होती है। यह भी एक तरह की फॉर्मूला फिल्म है, लेकिन फॉर्मूला थोड़ा अलग तरह का है। युवा वर्ग के दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी।

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