
टाइम बदल चुका है और देश भी, अब हम प्रोटोकॉल की ज्यादा परवाह नहीं करते, घर में घुसकर मारते हैं। यह किसी नेता के भाषण की लाइन नहीं, फोर्स 2 का एक डायलाग है। एक और डायलाग है- कभी न कभी तो मंत्री को भी देश के काम आना चाहिए। फिल्म के अनुसार रॉ के अधिकारी अपने काम को करने में डिलीजेंस, प्रिपरेशन और होम वर्क तगड़ा करते है। जबकि पुलिस अधिकारी गट फील, एग्रेसन और कॉमन सेंस से काम करते है। निर्देशक ने यह बातें सोनाक्षी सिन्हा और जॉन अब्राहम के मुंह से कहलवाई है। फिल्म तेज गति से आगे बढ़ती है, लेकिन मध्यांतर के बाद थोड़ी सी सुस्त लगती है। फिल्म में जॉन अब्राहम का नाम यशवर्धन है और सोनाक्षी केके यानी कमलजीत कौर है। जेनेलिया डिसूजा भी छोटे से रोल में है। वह सीक्वल के पहले वाली फिल्म फोर्स में जॉन की बीवी बनी थी, जिसकी हत्या हो गई थी। फोर्स 2 उसी को आगे बढ़ाती है। खलनायक के रोल में मर्दानी वाले ताहिर राज भसीन है, जो चीन में रॉ एजेंटों की हत्या के लिए जिम्मेदार है और आगे भी वह 17 अधिकारियों की हत्या की साजिश में लिप्त है।

फोर्स 2 की कहानी देश के उन जवानों को समर्पित है, जो देश के लिए कुर्बान हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई नहीं जानता। फोर्स से हटकर यह कहानी एक ऐसे पुलिस अधिकारी की है, जो रॉ का एजेंट बनता है। मेक इन इंडिया के दौर में इस फिल्म की अधिकांश शूटिंग चीन और हंगरी में हुई है। निर्देशन निशिकांत कामत का नहीं, अभिनव देव का है। फिल्म एकदम तेज गति की, एक्शन पैक्ड है। जो एक वर्ग को खास पसंद आएगी। फिल्म में गाने बोर नहीं करते, क्योंकि गाने चार ही हैं, जिसमें से एक पुरानी फिल्म का ही रीमेक गाना है ‘काटे नहीं कटते ये दिन ये रात’। पाश्र्व संगीत जरूर हथौड़े की तरह बजता है। जॉन अब्राहम हैं, तो मोटरसाइकिल की रेस तो होनी ही थी। जॉन का अंग प्रदर्शन भी होना था, क्योंकि एक्टिंग में बेचारा कमजोर है। जॉन अब्राहम वैसे तो महाराष्ट्र पुलिस का एसीपी है, जो अपनी ड्यूटी के लिए समर्पित है, लेकिन रॉ के एक अधिकारी दोस्त से मिले सूत्रों के कारण रॉ में विशेष जिम्मेदारी मिलती है। सोनाक्षी सिन्हा रॉ की अधिकारी बनी है और उन्होंने भी अच्छे एक्शन दृश्य दिए है।

इमोशन के नाम पर इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह दूसरे देशों में काम कर रहे रॉ के अधिकारी जब पकड़े या मारे जाते है, तब भारत सरकार उनसे पल्ला झाड़ लेती है और उन्हें अपना सहयोगी बताने से इनकार कर देती है। देश के लिए लड़ने और मरने वाले ऐसे कई अधिकारी अपने पीछे बदनामी छोड़ जाते है और उनका परिवार बेइज्जती सहता रहता है। ऐसे ही परिवार का एक नौजवान रॉ के अधिकारियों से बदला लेने के लिए षडयंत्र पर षडयंत्र करता जाता है।

जॉन अब्राहम ने इस फिल्म में सुपरमैन टाइप काम किया है। वे अकेले 15-20 गुंडोंं से लड़ते है। हथियार होते हुए भी हाथ पर ज्यादा भरोसा करते है। अच्छा निशानेबाज होते हुए भी निशाने चूक जाते है और मोटरबाइक तथा कार पर शानदार करतब दिखाते है। इस फिल्म में कारों की रेस और टक्करों के मामले में रोहित शेट्टी की फिल्मों को भी मात दे दी गई है। शंघाई और बुडापेस्ट की शानदार लोकेशन इस फिल्म में दिखाई गई है और लगता है कि वहां के पर्यटन विभाग ने उन दृश्यों को प्रायोजित किया होगा।

इस फिल्म में जॉन और सोनाक्षी के प्रेम दृश्य नहीं है और न ही गाने है। फिल्म ऐसे मोड़ पर आकर खत्म हो जाती है, जिससे लगता है कि निर्माता ने फोर्स 3 की व्यवस्था भी कर ली है। फोर्स 3 आएगी, तो वह मुंबई और पुलिस अधिकारियों की कहानी ही होगी, इसमें कोई दो मत नहीं है। फिल्म ऊबाऊ नहीं है। हंगरी में डांस बार में लड़कियां हिन्दी गाना गाती है, यह देखकर थोड़ा अटपटा जरूर लगता है। फिल्म की खासियत यह है कि जितना महत्व जॉन को दिया गया है, उतना ही सोनाक्षी को भी। फिल्म में छोटी-मोटी गलतियां नामों और उच्चारणों को लेकर खटकती है, फिर भी यह मनोरंजक फिल्म है।