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‘ओके जानू’ बड़े सितारों की साधारण फिल्म है। मणि रत्नम की तमिल फिल्म ओके कलमनी का यह हिन्दी रीमैक है। गुलजार के गाने, एआर रहमान का संगीत, निर्माता की जगह मणि रत्नम का नाम, कलाकारों में नसीरुद्दीन शाह, लीला सेमसेन, कीट्टू गिडवाणी के साथ ही आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर का अभिनय, अरिजीत सिंह का गायन आदि होने के बाद भी फिल्म औसत ही कहीं जाएगी। मल्टीप्लेक्स आने वाले दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई इस फिल्म को महानगर के युवा वर्ग द्वारा पसंद किया जाएगा, हालांकि इसमें कोई नवीनता नहीं है।

आशिकी-2 की जोड़ी इस फिल्म में है, क्योंकि वरुण धवन और आलिया भट्ट के पास इस फिल्म को करने का वक्त नहीं था। आदित्य और श्रद्धा ने फिल्म में अच्छा अभिनय करने की कोशिश की है, लेकिन नसीरुद्दीन शाह और लीला सेमसन का मुकाबला वे नहीं कर पाए। निर्देशक ने इस बात को सोचकर कि शहरी उच्च और उच्च मध्यवर्ग के दर्शक क्या चाहते हैं, इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है। सारे दृश्य वैसे ही तैयार किए गए है, जो एक खास वर्ग के लोगों को पसंद आए। प्रेम, शादी के नाम पर भागना, लिव-इन-रिलेशनशिप को प्राथमिकता, शास्त्रीय संगीत वालों को पिछड़ा समझना, वरिष्ठ नागरिकों को सनकी दिखाने जैसे दृश्यों के साथ ही इमोशनल मसाला डाल दिया गया है।

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संगीत के नाम पर ओके करमनी के ही तीन गानों का संगीत जस का तस इस फिल्म में है। केवल दो गाने एआर रहमान ने अलग से तैयार किए है। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर इश्क करते है, तो हिसाब-किताब लगाकर। उनके इश्क में न तो कोई इमोशन झलकता है, न रोमांस। ऐसा लगता है, मानो वो मशीन की तरह अभिनय कर रहे हो।

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हीरो-हीरोइन दोनों पेशेवर लोग है, हीरो का सपना अमेरिका जाना है और हीरोइन का पेरिस। महानगरीय दिखाने के बहाने हीरोइन के माता-पिता का विलगाव दिखाया गया है और उत्तरप्रदेश मूल के हीरो के परिवार को दकियानूस टाइप। फिल्मों में हीरो-हीरोइन जैसे घरों में पेइंग गेस्ट रहते हैं। वैसे घर बंबई में कितने लोग अफोर्ड कर पाते होंगे, यह भी सोचने की बात है। कुल मिलाकर प्रेम कहानी में प्रेम कम नजर आता है और जबरदस्ती बनाई हुई कहानी ज्यादा।

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ओके करमनी केवल 16 करोड़ के बजट में बनी थी और दक्षिण भारत में ही इसने 28 करोड़ का बिजनेस किया था। सुपरस्टार ममूटी के बेटे ने इसमें हीरो की भूमिका निभाई थी। मणि रत्नम ने इसके हिन्दी वर्जन के लिए शाद अली को जिम्मेदारी थी। मसाला डालने के चक्कर में शाद अली ने इसमें हम्मा-हम्मा और इन्ना सोना गानों का रीमैक भी डाल दिया। हम्मा-हम्मा तो छिछोरे अंदाज में फिल्माया गया है।

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फिल्म में सबकुछ है, लेकिन आत्मा की कमी है। कोई कहानी प्रेम कहानी कैसे हो सकती है, अगर उसके मुख्य पात्र तय कर लें कि वो प्रेम तो करेंगे, लेकिन इमोशनल नहीं होंगे। फिल्म शुरू होते-होते लिव-इन में रहने और कभी न शादी नहीं करने का संकल्प करने वाला कपल फिल्म खत्म होते-होते शादी कर लेता है। नए जमाने के हिसाब से हीरो को कम्प्यूटर गेम्स डेवलपर और हीरोइन को आर्किटेक्ट दिखाया गया है। बाकी सभी पात्र पुराने जमाने के है, वैसे ही जिद्दी, अनगढ़ और भकुआ। अगर कुछ करने को नहीं हो और पैसे व वक्त खर्च करना हो, तो यह फिल्म देखी जा सकती है।

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