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जो फिल्म पत्रकार खूब चर्चा कर रहे थे कि बेवॉच में प्रियंका चोपड़ा कयामत ढा देंगी, उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी होगी, क्योंकि इसमें प्रियंका ने कयामत जैसा तो कोई काम किया नहीं। जिस तरह के बोल्ड अवतार (अवतार फिल्मी भाषा है, वरना अवतार तो देवी-देवताओं के होते हैं) में प्रियंका नजर आई है, उससे ज्यादा बोल्ड तो वे हिन्दी की उनकी पहली फिल्म ऐतराज में थीं। हॉलीवुड के समीक्षकों ने पिछले हफ्ते रिलीज होते ही काफी नकारात्मक समीक्षाएं लिखी थीं, यह शायद उसी का असर है कि दुनियाभर में इस फिल्म को जितना अच्छा रिस्पांस मिलने की उम्मीद थी, वह धराशायी हो गई। हां, यह बात जरूर है कि इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा मुख्य खलनायक के किरदार में है। कहा जा सकता है कि प्रियंका का रोल इस फिल्म में दूसरे नंबर का सबसे महत्वपूर्ण रोल है। महिला कलाकारों को मुख्य खलनायक का किरदार कम ही मिलता है। फिल्म के पर्दे पर प्रियंका नजर आ रही हो या नहीं आ रही हो। उनका रोल विक्टोरिया लीड्स जरूर नजर आता है। पर्दे पर खलनायक की जगह खलनायिका हो और ऐसी खलनायिका जो मिस वल्र्ड रह चुकी हो, तो उसके प्रचार की संभावनाएं काफी अच्छी होती हैं।

मेरा सुझाव है कि अगर आप हॉलीवुड की इस फिल्म को अंग्रेजी के बजाय हिन्दी में देखेंगे, तो शायद ज्यादा मजा आएगा। कभी-कभी ऐसा भी लगेगा कि ये हॉलीवुड वाले तो हमारे बॉलीवुड से भी गई गुजरी कहानी पर फिल्म बना लेते हैं। इतने कमजोर किरदार, इतनी कमजोर स्क्रिप्ट, न कहानी में नयापन, घिसी पिटी फ्रेम; वही ड्रग्स की स्मगलिंग, वही गोवा जैसा समुद्री तट, सुस्त पुलिसवाले, खाड़ी या समुद्र का ऐसा किनारे जहां लोग मौज-मस्ती के लिए जाते है और कई बार लहरों के शिकार बन जाते है, ऐसे लोगों को बचाने के लिए तैनात सुंदर और आकर्षक जीवनरक्षक, भ्रष्ट नेता, बिकाऊ अधिकारी, नियमों से आगे जाकर ड्रग्स की स्मगलिंग के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले जाबाज और ऐसी ही कुछ कहानी। इसके अलावा स्लो मोशन में दौड़ती हुई स्विम सूट पहनी युवतियां और फिर भी निर्माता का पेट नहीं भरा, तो दो मिनिट के लिए पामेला एंडरसन की एंट्री।

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1990 के दशक में बेवॉच सीरियल आया करता था, जो पश्चिमी देशों में एक वर्ग में काफी लोकप्रिय था। भारत में टीवी चैनल से बरसों तक उधारी में चलाते रहे। हॉलीवुड में इस तरह का चलन है कि अगर कोई सीरियल बहुत लोकप्रिय हो जाए, तो वो लोग उस पर फिल्म बना मारते है। बेवॉच उसी कड़ी की फिल्म है। चार्लीस एंजेल्स, जम्प स्ट्रीट, बेन-10, डॉ. हू से लेकर बैटमेन सीरिज की फिल्में तक पहले टेलीविजन चैनल के रूप में आ चुकी हैं। फिल्म में एक पात्र है मैट ब्राडी (जैक एफ्रॉन), जो ओलंपिक खेलों मेंं दो गोल्ड मैडल जीत चुका है, लेकिन बेवॉच की टीम में काम पाने के लिए मरा जा रहा है। भारत में तो अगर कोई ओलंपिक का सिल्वर मैडल भी ले आए, तो बरसों बरस सुपरस्टार बना रहता है।

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इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा को देखकर कोई भी समझ सकता है कि फिल्म व्यवसाय के क्षेत्र में उन्हें लेडी शाहरुख खान क्यों कहा जाता है? वे अपनी खूबियां जानती है और उन्हें अपनी कला की मार्केटिंग करना आती है। घिसी-पिटी कहानी के बावजूद उन्होंने अपनी भूमिका बेहद गरिमामय तरीके से निभाई है और बगैर अश्लीलता का पुट दिए ग्लैमरस भी नजर आई। निर्माता को पता ही होगा कि बंदी मिस वल्र्ड रह चुकी है, लेकिन कहानी भी तो कोई चीज होती है। अगर हर सीन में आपको हर अंदाज लगने लग जाए कि आगे क्या होगा तो फिल्म का मजा कम हो जाता है। दर्शकों को बड़े बजट के कारण हॉलीवुड की फिल्मों में ज्यादा बेहतर एक्शन सीन की अपेक्षा होती है। कई दृश्यों को देखकर तो ऐसा लगता है कि वे जबरदस्ती फिल्म में ठूंस दिए गए है।

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प्रियंका चोपड़ा अमेरिकी टीवी शो क्वांटिको में अपने रोल को लेकर पहले ही काफी चर्चा में आ चुकी हैं। इस फिल्म के रिलीज होते वक्त भी वे सोशल मीडिया में खूब सक्रिय रहीं। विदेशी फिल्म समीक्षकों की प्रतिक्रिया का असर भारत में फिल्म के वितरकों पर भी पड़ा। जितना भी जोर मार लिया गया हो, प्रियंका चोपड़ा के सामने ड्वेन जॉनसन को हीरो बनाकर पेश किया गया, जो बेवॉच टीम के प्रमुख हैं। फिल्म में कई जगह द्विअर्थी संवाद है। ऐसे में फिल्म को ए सर्टिफिकेट तो मिलना ही था। भारत में फिल्म अंग्रेजी के अलावा हिन्दी, तमिल और तेलुगु में भी डब करके रिलीज की गई है।

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