
इरफान खान ने अपनी गंभीर बीमारी की सूचना ट्विटर पर देते हुए बेबाकी से लिखा था कि उनकी बीमारी के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उनकी फिल्म न देखी जाए। ब्लैकमेल में गजब की एक्टिंग की है बंदे ने। यह बात और है कि कहानी दिमाग का दही बना देती है। लगता है कि आप गोलमाल टाइप कोई फिल्म देख रहे हैं, जिसमें सस्पेंस को कॉमेडी बना दिया गया है।
फिल्म का एक शुरूआती डायलॉग है कि शादी तो गांव में होती है, यहां तो बैंड बजता है। यह पूरी फिल्म टिशु पेपर बेचने वाली एक कंपनी के कर्मचारियों के आसपास घूमती है, जिसमें कंपनी का मालिक कहता है कि जिस देश में लोगों के पास पीने का पानी नहीं है, वहां धोने में पानी खर्च करना बेवकूफी है। वह तरह-तरह के टिशु पेपर बनाता है और टिशु पेपर को बेचने के लिए हर तरीके आजमाता है।

पूरी फिल्म में दर्शकों के दिमाग का बैंड बज जाता है। इस फिल्म का नाम होना चाहिए था ‘ब्लैकमेलर का ब्लैकमेलर, ब्लैकमेलर का ब्लैकमेलर,’। मजेदार पार्ट यह है कि प्राइवेट कंपनियां किस तरह कर्मचारियों का शोषण करती है, उसे दिलचस्प अंदाज में दिखाया गया है, जहां कंपनी के मालिक के पास रिश्वत में देने के लिए 24 लाख रूपए होते है, लेकिन कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं होते। निजी कंपनियों के मालिक सारा बलिदान कर्मचारियों से ही अपेक्षित रखते है। कर्मचारी भी कंसे होते हैं मकान की ईएमआई, कार की ईएमआई, क्रेडिट कार्ड की ईएमआई आदि-आदि में।

ईएमआई में फंसा कर्मचारी किस तरह से बैंक वालों को टालता है और कैसे खर्च मैनेज करता है, यह दिलचस्प तरीके से दिखाया गया है। हद तो यह हो जाती है, जब एक कर्मचारी को पता चलता है कि उसकी पत्नी बेवफा है, तब वह न तो उसे तलाक देता है और न ही विरोध में उसके प्रेमी या उसकी हत्या करता है। इरादा करके वह कांपने लगता है और बदला लेने का तरीका यह निकालता है कि अपनी बीवी से ही ब्लैकमेल शुरू।
घटनाएं बदलती जाती है और ब्लैकमेलर को उसी के तरीके में जवाब मिलता है। ब्लैकमेल करने वालों की पूरी सीरिज बन जाती है और कहानी कहीं से कहीं भटकने लगती है। लगता है कि महानगरों में लोग केवल पैसे से मतलब रखते है और पैसे के लिए ही शादी करते है। पैसे वाली बीवी अपने पति को कुत्ता कहकर ही संबोधित करती है और वह बिना कुछ किए दुम हिलाता रहता है।

पूरी फिल्म में अविश्वास ही अविश्वास भरा है, जहां न पति पत्नी का है, न पत्नी पति की। न दोस्त किसी का है, न सहकर्मी किसी का। पुलिस वाले केवल पैसे के लिए काम करते है और प्राइवेट डिटेक्टिव पुलिसवाले के भी बाप है। यहां कोई किसी पर भरोसा नहीं करता, चाहे वह पुरुष हो या महिला। भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं। मुफ्त में कमाया गया पैसा ही सबकुछ है।
फिल्म में कई ऐसे दृश्य है, जो बेहद हंसाने वाले है और स्वाभाविक बन पड़े है। उर्मिला मातोंडकर का आइटम सांग बेवफा ब्यूटी भी है, हालांकि अब उर्मिला को मौसी या खाला का रोल ही करना चाहिए और खड़ूस, धनलोलुप बीवी बनी दिव्या दत्ता भी।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पोते और कांग्रेस नेता अजय सिंह के पुत्र अरुणोदय सिंह ने इरफान के सामने प्रमुख भूमिका निभाई हैं। इतने इज्जतदार कलाकार की ऐसी भूमिका देखकर अफसोस होता है। जितनी मेहनत बेचारे ने प्रोटीन शेक पी-पीकर बॉडी बनाने में की है, उसका थोड़ा हिस्सा भी अभिनय को निखारने में लगाता, तो इज्जत बची रहती। 3 इडियट्स वाला ओमी वैद्य भी पुराने फॉर्म में है। इंदु सरकार में आ चुकी कीर्ति कुल्हारी ने फिल्म में अभिनय नहीं, मॉडलिंग की है। अभिनय करती तो बेहतर होता। बादशाह और गुरु रंधावा के गाने नई पीढ़ी के लिए है, उन्हें पसंद आ रहे है। ब्लैकमेल कोई सस्पेंस थ्रिलर नहीं है।