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न्यूज़ टुडे (इंदौर नामा/ स्ट्रेट ड्राइव)
इंदौर के सिनेमाघरों के वो भी क्या दिन थे !
न्यूज़ टुडे (इंदौर नामा/ स्ट्रेट ड्राइव)
इंदौर के सिनेमाघरों के वो भी क्या दिन थे !
इंदौर की बात हो और यहाँ तो सिनेमाघरों की चर्चा न हो, यह हो नहीं सकता। इंदौर और फिल्मों का नाता, फिल्म कलाकार से लेकर निर्माण और वितरण से लेकर फाइनेंस तक का रहा है। नयी और पुरानी पीढ़ी के लोग दीवानगी की हद तक सिनेमाप्रेमी हैं। किसी से पूछिए --गांधी चौक कहाँ है? शायद ही कोई बता पाये, लेकिन रीगल चौराहा बोलेंगे तो सब जान जाएंगे. नेहरू चौक कोई नहीं जानता।
मधुमिलन चौराहा सब जानते हैं। महात्मा गांधी मार्ग के बाद इंदौर का सबसे व्यस्त मार्ग कौन सा है? सपना संगीता मार्ग। सपना और संगीता टॉकीज के कारण ही यह नाम मशहूर है। आजकल तो शराब के बार और डिस्को में भी लोग खुलेआम जाते हैं, लेकिन एक दौर था, जब लोग छिपते -छुपाते सिनेमा देखने जाते थे।महिलाओं का सिनेमा देखना बुरा माना जाता था और उनके लिए सिनेमाघर में अलग से 'लेडीज क्लास' होती थी। ऑनलाइन बुकिंग की कल्पना भी नहीं थी, टिकट की कतार में लम्बा संघर्ष होता था और टिकट विंडो से टिकट पा जाना बड़ी उपलब्धि। पहले दिन पहला शो किस्मतवालों को ही नसीब होता था। आजकल जो कुछ भी मुंबई में होता है, वह बहुत जल्दी इंदौर में भी उपलब्ध होता है. लेकिन सिनेमा के मामले में इंदौर 21 साल पिछड़ गया था. मुंबई में पहला सिनेमा शो 1896 में हुआ था, लेकिन इंदौर में 1917 में जवाहर मार्ग पर वाघमारे साहब के बाड़े में पहला शो हुआ. ओपन एयर 'हॉल' था। प्रोजेक्टर हाथ से घुमाया जाता था, जब प्रोजेक्टर चलानेवाला थक जाता था तो फिल्म की गति कम हो जाती थी। मूक फिल्मों का दौर था वह। क्वालिटी तो छोड़ो, 'सनीमा देखना' ही चमत्कार था। फिर नंदलालपुरा इलाके में तम्बूवाले 'रॉयल सिनेमा' की शुरुआत हुई। 1918 में सिनेमा का प्रदर्शन बोराडे थियेटर में शुरू हुआ। 1922 में अडसुळे साहब ने श्रीकृष्ण टॉकीज बनवाया, जो इंदौर की शान माना जाता था। भारत की पहली बोलती फिल्म (टॉकी) थी 'आलमआरा' 1931 में, जो इसी श्रीकृष्ण टॉकीज में लगी थी और पूरे तीन महीने चली थी। यहाँ गेस्ट हाउस भी था जिसमें वी शांताराम जैसे फिल्म निर्माता ठहरा करते थे। सियागंज का एलोरा टॉकीज पहले अरुण टॉकीज था और वह शुरू हुआ था प्रभात टॉकीज के नाम से। जब इंदौर में सिनेमाघर बनने लगे तब ज़्यादातर टॉकीज रेलवे स्टेशन के करीब बने। इसलिए कि आसपास के लोग सिनेमा देखकर आराम से गाड़ी पकड़ सकें। रीगल-मिल्की वे , यशवंत-बेम्बिनो, एलोरा-अजंता ट्विन टॉकीज थे, जो स्टेशन के पास थे। मधुमिलन, स्टारलिट, अलका,ज्योति, महाराजा, भी पास ही थे। प्रकाश रिवरसाइड रोड पर था और राज छावनी में.
मल्टीप्लेक्स का दौर आने के पहले प्रेमसुख, सपना, संगीता जैसे टॉकीज भव्य मने जाते थे। पहेल टॉकीज में इंटरवल के दौरान मूँगफली बेचनेवाले अंदर आ जाते थे और दर्शक पोप कॉर्न नहीं, मूंगफली खाया करते थे। धूम्रपान पर कोई रोक नहीं थी, इंटरवल के बाद बीड़ी और सिगरेट के धुंए से पूरा हॉल भर जाता था। कई बार तो धुंए के कारण परदे पर फिल्म देखना दूभर हो जाता। होलकर राजवंश ने इंदौर को ,रेल, फ्री ट्रेड ज़ोन, विशाल तालाब, अस्पताल ही नहीं दीं, सिनेमाघर भी दिए। यशवंत टॉकीज इसका नमूना है। इसे ऊपर बेम्बिनो नाम का मिनी टॉकीज भी हुआ करता था यहाँ। स्टेशन के पास इसे इंदौर के महाराजा ने बनवाया था। इंदौर के महू में ड्रीमलैंड, ऑरफियम, मोहन और मोती महल टॉकीज खुले थे। तब ऑरफियम टॉकीज अंग्रेजी फिल्मों के लिए जाना जाता था और इंदौर से बड़ी संख्या में लोग महू जाकर फिल्मे देखते थे।
आज प्रकाश, राज, स्टारलिट, यशवंत , राज, महाराजा, मनमंदिर (पुराने) जैसे टॉकीज की जगह व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स खड़े हैं। सिंगल स्क्रीनवाले सिनेमाघरों के सामने चुनौती है। सिनेमा टेलीविजन और इंटरनेट के कारण प्रभावित हो रहा है। हीरो मासिक वेतन वाला नौकर न होकर निर्माता का हिस्सेदार हो रहा है। चकाचोंध बढ़ गयी है, लेकिन सिनेमा का वह यादगार दौर कभी भुलाया नहीं जा सकता, जब तीस चालीस पैसे में सिनेमा देखा जा सकता था और मार्मिक दृश्य आने पर सिनेमाघर में लोग सिसकियाँ भरते थे।
--प्रकाश हिन्दुस्तानी