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शुक्रवार, 7 अगस्त को रिलीज फिल्म काला सच - द ब्लैक ट्रुथ की समीक्षा

‘काला सच- द ब्लैक ट्रुथ’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अच्छा प्रतिसाद मिलेगा, इसमें कोई दो मत नहीं है, क्योंकि यह फिल्म भारत की वैसी ही छवि पेश करती है, जैसी दुनिया देखना चाहती है। अटलांटिस फिल्म महोत्सव, केलगरी अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव और न्यू यॉर्क के इंडीपेंडेंट फिल्म महोत्सव में इस फिल्म का प्रदर्शन हो रहा है या हो चुका है। वास्तविक घटनाओं पर आधारित इस फिल्म में महिलाओं पर हो रहे जुल्मों को बॉलीवुड स्टाइल में दिखाया गया है। फिल्म के लेखक और निर्माता का दावा है कि इस फिल्म को बनाने के पहले दो साल तक रिसर्च की गई और फिर उसे झारखंड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और मुंबई में फिल्माया गया। इस फिल्म से पाश्र्व गायिका साधना सरगम की वापसी भी हो रही है।

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भारत में डायन के नाम पर महिलाओं पर होने वाले जुल्मों की कहानी इस फिल्म में है। खलनायक है नेता, धर्मगुरु और स्थानीय व्यवसायी। इस फिल्म में महिलाओं पर हो रहे जुल्म को इस तरह फिल्मांकित किया गया है कि दर्शक कराह उठता है। पूरी फिल्म दर्शकों की बेचेनी बढ़ा देती है और सोचने पर विवश कर देती है। शायद यहीं इस फिल्म का उद्देश्य भी है। फिल्म के निर्माता जीतेन्द्र सोनी के अनुसार भारत में डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए सख्त कानूनों की कमी है। हो सकता है कि इस फिल्म के बाद हमारे कानून निर्माता इस दिशा में कदम उठाएं। यह बात भी सही है कि कानून बनना इस समस्या का हल नहीं है। इस समस्या का हल है शिक्षा और जागरुकता। फिल्म की शुरुआत ही विभत्स दृश्यों के साथ होती है। इस कारण मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाने वाले दर्शक दुखी होंगे। फिल्म में इंटरटेन्मेंट का ध्यान रखा गया है और गांव की नौटंकी वाले गाने भी है और गंभीर गाने भी। थ्रीलर, एक्शन और मैसेज तीनों का घालमेल इस फिल्म में है। अगर यह फिल्म ‘नया सिनेमा’ के दौर में बनती, तब निश्चित ही बेहद चर्चा में होती। बॉलीवुड के वर्तमान दौर में ऐसी फिल्मों की गुंजाइश बहुत कम हो गई है, लेकिन फिर भी इस फिल्म को बनाने का कार्य करना अपने आप में हिम्मत का काम है।

पहले इस फिल्म को फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने रोक लिया था। याचिका के बाद इस फिल्म के प्रदर्शन पर पुन: विचार हुआ और अब जाकर फिल्म प्रदर्शित हो पाई। मल्टीप्लेक्स वालों ने फिल्म से किनारा कर लिया है और सिंगल स्क्रीन थिएटर में यह फिल्म प्रदर्शित हुई। गांव में बुराइयों और मुश्किलों से संघर्ष करने वाली कुसुम का हश्र जिस तरह दिखाया गया है वह उद्वेलित कर देता है। सैकड़ों गांव वालों के सामने किसी महिला को निवस्त्र कर उसकी जीभ, नाक और कान कांटना, सिर मुंडाना, चेहरे पर कालिख पोतकर पूरे गांव में घुमाना और फिर सारे गांव वालों द्वारा सामूहिक बलात्कार के बाद उसे पत्थरों, लाठियां से मार-मारकर मौत के घाट उतार देने के दृश्य नृशंसता की हद तक पहुंच गए है। एक वर्ग विशेष के लोगों को इन दृश्यों में भले ही मनोरंजन नजर आए। निर्देशक चाहते तो उसे प्रतीकात्मक भी दिखा जा सकते थे।

इस फिल्म में सभी कुछ है। अन्याय से लड़ने वाली महिला, ईमानदार पुलिसकर्मी, बेईमान सोशल वर्कर, भ्रष्टतम मंत्री, सरकारी धन का दुरुपयोग, महिलाओं पर अत्याचार, गांव वालों की चुप्पी, नौटंकी टाइप आइटम सांग, ढोंगी संत और साध्वी, लचर कानून, अशिक्षा, बेरोजगारी, पिछड़ापन और इस सबसे बढ़कर सच्ची घटना होने का आइडिया। इस चूं-चूं के मुरब्बे में मिठास कम और कड़वाहट ज्यादा है। व्यावसायिक फिल्म बनाने के चक्कर में छोटे बजट की यह फिल्म न आर्ट फिल्म बन पाई और न कमर्शियल।

अगर इस फिल्म के बाद सरकार जागृत हो और डायन के नाम पर महिलाओं पर होने वाले जुल्म कम हो सकें, अत्याचार करने वालों पर कड़ी कार्रवाई के कानून बने, तो यह इस फिल्म की बहुत बड़ी कामियाबी होगी। अभी भी इस देश के 12 प्रदेशों में महिलाओं को डायन बताकर जुल्म करने की वारदातें हो रही हैं। इन राज्यों में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडीशा, झारखंड, हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, असम, बिहार शामिल है। फिल्म के लेखक का दावा है कि इसकी कहानी झारखंड के एक गांव में महिला के साथ हुई घोर ज्यादती के बाद लिखी गई है। झारखंड के रामगढ़ गांव की सरिता देवी के साथ ऐसी ही क्रूर वारदातें की गई थी, जिनसे उनके मन में इस फिल्म के निर्माण का विचार आया। झारखंड पुलिस के अनुसार जनवरी से अक्टूबर 2014 के दस महीने में ही डायन बताकर 38 महिलाओं को उत्पीड़ित किया गया, जिससे उनकी मौत हो गई। एक एनजीओ ने 2012 में 332 गांव का सर्वे किया, तो यह पाया कि झारखंड में एक वर्ष में 176 महिलाओं को डायन बताकर शारीरिक और मानसिक यंत्रणाएं दी गई। इस फिल्म में सरिता देवी के रूप में कुसुम को पेश किया गया है। जिसकी भूमिका भोजपुरी अभिनेत्री पाखी हेगड़े ने निभाई है। कुसुम एक गांव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने आती है, जो गांव के फर्जी साधु और प्रभावशाली लोगों को नागवार गुजरता है। वे उसे डायन के रूप में प्रचारित करते हैं। कुसुम के खिलाफ दुष्प्रचार की इंतेहा यह थी कि जिस व्यक्ति के घर में कोई संतान नहीं थी, वह अपनी नातिन की मौत के लिए कुसुम को जिम्मेदार बताता है। जब गांव के लोग पूछते है कि उसके बच्चे ही नहीं है, तो नातिन कहां से आई? तब वह कहता है कि यह नातिन मेरे गाय की बच्ची है। जब गांव वाले कहते है कि उसके घर में तो कोई गाय भी नहीं है, तब वह कहता है कि मैंने गुप्त रूप से गाय पाली थी। गांव वाले इतने पिछड़े दिखाए गए है कि वह इन बातों में आ जाते है।

हिन्दी फिल्म दर्शकों को परिचित चेहरों के नाम पर इस फिल्म में हिमानी शिवपुरी और मुस्ताक खान ही पहचान में आएंगे। भोजपुरी फिल्म के दर्शक पाखी को पहचान लेंगे। इस फिल्म के अधिकांश कलाकार नए और स्थानीय हैं। हिसार के चार कलाकारों ने भी इस फिल्म में काम किया है। फिल्म का संगीत चलताऊ है। निर्देशन ठीक-ठाक है। सारे कलाकार औसत हैं। ब्रजेश श्रीवास्तव का संगीत औसत के करीब है।

अगर आप मनोरंजन के लिए फिल्म देखते है, तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। निर्माता-निर्देशक को उम्मीद है कि इस फिल्म के बाद कानून बनानों वालों और नीति नियंताओं में बहस होगी और डायन के नाम पर महिलाओं पर जुल्म खत्म होंगे।

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