
बजरंगी भाईजान अगर जवाहरलाल नेहरू की पंचशील टाइप पिक्चर थी, तो फैंटम नरेन्द्र मोदी टाइप पिक्चर है। पंडित नेहरू की नीति भाईचारे की थी और वे पड़ोसी देशों से दोस्ताना संबंध चाहते थे, जिसका फिल्मीकरण बजरंगी भाईजान टाइप भाईचारे में दिखाया गया, लेकिन फैंटम बजरंगी भाईजान से उल्टी, गदर की तरह है। गदर में एक प्रेम कहानी थी, फैंटम में जेम्स बांड जैसी नकल की गई है। आधिकारिक रूप से रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) ऐसा कुछ नहीं करता, जैसा की फैंटम में दिखाया गया है। बजरंगी भाईजान में सिनेमा हाल से बाहर जाता दर्शक टसुए बहाता नजर आता था, तो फैंटम में यह स्वर सुनने को मिलता है कि यार, इस पिक्चर में तो सलमान को होना था।

सैफ अली खान करें भी तो क्या? सुपरहीरो की उनकी इमेज ही नहीं है। दर्शक उनसे इस तरह के स्टंट की अपेक्षा नहीं करता है। दर्शकों के लिए तो वे अभी भी शर्मिला टैगोर और नवाब पटोदी के साहबजादे ही है। एक बात सैफ अली खान को समझ में आ गई है कि सोलो फिल्में करने में ही फायदा है। कैटरीना कैफ इस फिल्म में भी है, लेकिन वैसी ही जैसी एक था टाइगर में थी। कैटरीना का रोल छोटा है और वह फिलर की तरह ठूंसी गई लगती है। कैमिना की पूर्व उप संपादक सोहेला कपूर को इस फिल्म में देखना सुखद रहा। एक वृद्ध नर्स का रोल उन्होंने बाखूबी किया है। रंगमंच और फिल्मों के कलाकार राजेश तेलंग रॉ अधिकारी की भूमिका में है और हाफिज सईद की भूमिका में शाहनवाज खान हैं। यह भूमिका निभाने के बाद शाहनवाज खान को सुरक्षा कारणों से अंडरग्राउंड करने की खबरें भी मीडिया में आई थी। इस तरह की अफवाह थी कि आतंकी संगठन उनकी जान ले सकते है।

बजरंगी भाईजान पाकिस्तान में खूब पसंद की गई, इसके ठीक विपरीत फैंटम को पाकिस्तान में प्रदर्शित नहीं करने दिया गया, क्योंकि यह फिल्म बताती है कि पाकिस्तान ही आतंकी गतिविधियों को मुख्य पनाह देने वाला है। मुंबई में हुए 26 नवंबर को हुए हमले का बदला लेने की कहानी इस फिल्म में है। जो फिल्मी पटकथा लेखक हुसैन जैदी की किताब मुंबई अवेंजर्स पर आधारित बताई जाती है। यह किताब तो बाजार में आई नहीं पर फिल्म पहले आ गई। पहले इस फिल्म का नाम डैनियल खान रखा गया था। बाद में इसे बदलकर फैंटम रख दिया गया। शुरू में इस तरफ इशारा किया गया कि जैसे कॉमिक कैरेक्टर फैंटम को सब पहचानते थे, लेकिन उसकी असलियत कोई नहीं जानता, उसी तरह इस फिल्म में भी सैफ अली खान को कोई नहीं जानता। पूर्व सैनिक अधिकारी सैफ अली खान की कोई तस्वीर किसी के पास नहीं। गूगल फेसबुक या ट्विटर पर भी वह नदारद है और गुमनाम जिंदगी जी रहा है। रॉ के एक ऑपरेशन के लिए उसे चुना जाता है और बड़ी मुश्किल से वह तैयार होता है और इस तरह देखते ही देखते करीना कपूर का हसबैंड जेम्स बांड बन जाता है। हां, इस फिल्म का अंत जेम्स बांड की फिल्म से अलग है। पाकिस्तान में इस फिल्म का प्रदर्शन हाफिज सईद की याचिका पर रोक दिया गया। भारत में बनने वाली इस फिल्म में आतंकवादियों के असली नाम दिए गए थे, लेकिन फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने उस पर आपत्ति की थी और आतंकवादियों के नाम मूल नाम से मिलते-जुलते कर दिए गए। विचित्र बात है कि जिस पाकिस्तान में घुसकर अमेरिकी सैनिक आतंकवादी लादेन को मार गिराते हैं, उसी देश के आतंकवादियों के असली नाम भारतीय फिल्मों में बदल दिए जाते है। इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि यह फिल्म एक कपोल कल्पना पर ही आधारित है। दर्शक यहीं सोचता हुआ निकलता है कि काश फिल्म में दिखाए गए दृश्य वास्तव में सच होते।
फिल्म की शुरुआत में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के वीडियो फुटेज दिखाए गए और अंत भी गेट-वे ऑफ इंडिया और होटल ताज के आसपास दिखाया गया। इस फिल्म में मजेदार लोकेशन हैं, खूबसरत फोटोग्राफी है, उबाऊ गाने नहीं है, गूंगी बैबी डॉल जैसी कैटरीना कैफ है, जो बड़ी मुश्किल से हिन्दी बोल पाती है। पाकिस्तान के आतंकी शिविर के दृश्य भारत में फिल्माए गए हैं। स्टुडियो में वह सबकुछ निर्मित कर दिया गया जो आमतौर पर आतंकी शिविरों में भी शायद ही होता हो।
फैंटम देखने के लिए ज्यादा दिमाग की जरुरत नहीं पड़ती। राखी बंधन के त्योहार पर ऐसी फिल्मों का प्रदर्शन अजीब लगता है। ठीकठाक टाइम पास है फैंटम।
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