फिल्म समीक्षा : कट्टी-बट्टी

पहले इस फिल्म का नाम ‘साली कुतिया’ रखा गया था। जिस पर कंगना को भारी आपत्ति थी। इमरान खान के मामा आमिर खान के हस्तक्षेप के बाद इस फिल्म का नाम कट्टी-बट्टी रखा गया। कंगना इस पर भी खुश नहीं थीं। उन्हें लगता है कि यह नाम चाइल्डिश है। छोटे बच्चे कट्टी-बट्टी करते रहते हैं। फिल्म देखने पर लगता है कि न पहले वाला अच्छा था और न यह नाम।
‘साली कुतिया’ से सीधा-सीधा यह आशय निकलता था कि फिल्म की हीरोइन आला दर्जे की घटिया स्त्री है। यह नाम बदलकर निर्माता निर्देशक ने अपनी थोड़ी इज्जत बचा ली। फिल्म के विज्ञापनों में बार-बार यहीं बात बताई जाती रही कि इस फिल्म की हीरोइन एकदम चालू टाइप है और अकारण ही पांच साल तक लिव-इन में रहने के बाद हीरो को छोड़कर चली जाती है। यानि एकदम बेवफा टाइप।

दर्शक के मन में यह बात तो रहती ही है कि कोई भी एकाएक बेवफा क्यों हो जाएगा, कुछ न कुछ तो पेंच होगा ही। इंटरवल के पहले फिल्म घटिया जुमलो में ही कट जाती है। ऐसा लगने लगता है कि इससे तो अच्छा सेट मेक्स पर सूर्यवंशम ही देख लेते या फिर यूू-ट्यूब पर थोड़ा समय बीता लेते। चुम्मा-चाटी के मामले में आमिर खान का भांजा इमरान खान महेश भट्ट के भांजे इमरान हाशमी से कम नहीं निकलता। बेसिर-पैर की कहानी इंटरवल के बाद थोड़ी गंभीर होती है और कंगना की बेवफाई का जो बहाना बनाया जाता है, वह इतना उबाऊ है कि दर्शक त्राहिमाम कर उठता है।
ऐसा लगता है कि निर्माता-निर्देशक परिकथा पर फिल्म बनाने निकला था और उजड़ा चमन बनाकर लौट आया। निखिल आडवाणी एनएन सिप्पी के वंशज है, तुषार और एकता कपूर के कजिन है। उनसे थोड़ी अक्लमंदी की उम्मीद थी पर सेंट जेवियर्स में पढ़ने वाला हर विद्यार्थी क्रिएटिव हो यह जरूरी थोड़ी है। जो निखिल आडवाणी कल हो ना हो, कभी खुशी कभी गम और मोहब्बतें जैसी फिल्मों में चोपड़ाओं और जौहरों का असिस्टेंट रहा हो, उससे दर्शक कुछ उम्मीद लगा ही लेता है। 25 करोड़ बनाने में फूंक दिए और करीब 16 करोड़ प्रचार में। समझ सकते है कि प्रचार पर कितना पैसा फूंका गया है।

आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने वाले हीरो-हीरोइन जिस तरह के माहौल में रहते है और जैसी नौकरी करते है वह निहायती फुहड़ और घटिया है। ये लोग फेसबुक से एक-दूसरे का इतिहास, भूगोल जानते है। मौका आने पर अपने आप को गे घोषित कर देते है। अपने क्लाइंट को बाथरूम में बंद कर देते है और डायलॉग बोलते है- ‘प्यार के दर्द के मारों का बहुुत बड़ा मार्केट है’। मुझे तो फिल्म में एक ही डायलॉग पसंद आया और वह यह ‘कि देवदास वास्तव में लकी था, जिसे पारो मिली’। टाइम पास मोहब्बत से चालू हुई कहानी अंत में जाकर ग्लिसरीन के आंसुओं पर समाप्त हो जाती है।

महानगरीय उच्च आय वर्ग के युवाओं के लिए निखिल आडवाणी ने कट्टी-बट्टी बनाई है। क्वीन और तनु-वेड्स मनु रिटन्र्स की कामयाबी के बाद यह तीसरी फिल्म होगी, जिसमें सिर्फ कंगना और कंगना ही है। इमरान खान दो साल से नदारद है। कंगना के कारण शायद उसका भाग्य फिर चमक जाए। पिछले हफ्ते ही निखिल आडवाणी के डायरेक्शन वाली हीरो देखी थी। उसके सदमे से उबरा भी नहीं था कि कट्टी-बट्टी आ गई। फर्स्ट-डे, फर्स्ट-शो में दर्शकों की बातें सुनना भी दिलचस्प लगा, जो बार-बार कह रहे थे कि अरे भई खत्म करो। फिल्म केवल कंगना के लिए देखी जा सकती है। हालांकि कंगना ने इसमेंं दिल से काम नहीं किया।
Other Film Review
मांझी - द माउंटेनमैन : सानदार ! जबरदस्त !! जिंदाबाद !!!
खालिस मनोरंजन के लिए नहीं है ‘काला सच’
मुझे तो दिलचस्प लगी फैमिली थ्रिलर ‘दृश्यम’
‘बैंकॉक वाला कैरेक्टर होके हरिद्वार की फीलिंग मत दे’