फिल्म समीक्षा : एवरेस्ट

एवरेस्ट फिल्म को गत 2 सितंबर को वेनिस फिल्म महोत्सव में रिलीज किया गया था। 18 सितंबर को यह फिल्म दुनियाभर में रिलीज हुई। यह फिल्म एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पर्वतारोहियों के दो समूहों के सर्वाइवल अभियान पर टिकी है। 25 सितंबर को यह फिल्म पूरी दुनिया के करीब तीन हजार सिनेमाघरों में रिलीज होगी। भारत में यह फिल्म प्रदर्शित हो चुकी है और इसे अच्छा प्रतिसाद मिला है।

1953 में हिमालय पर्वत माला की सर्वोच्च चोटी एवरेस्ट पर झंडा फहराने वाले तेनसिंग नोर्के और एडमंड हिलेरी के बाद दर्जनों बार एवरेस्ट फतह हो चुकी है। उस पर कई फिल्में बन चुकी है और अनेक किताबें बाजार में आ चुकी हैं। अब एवरेस्ट शिखर तक पहुंचना शायद उतना कठिन नहीं है, जितना 1953 में था। अब तो बाकायदा कई कंपनियां खुल चुकी है, जो पर्वतारोहियों को एवरेस्ट के शिखर तक पहुंचाने का काम करती हैं। इतने संसाधनों के बाद भी एवरेस्ट पर फतह करने का इनसान का जज्बा बरकरार है। अब तो कहा जाने लगा है कि एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला, एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पहले विकलांग, एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पहले दृष्टिहीन आदि-आदि।
ये सभी कहानियां एवरेस्ट तक पहुंचने वाले उन पर्वतारोहियों के बारे में है, जिनमें पर्वतारोहण का जुनून है। ये सब कहानियां बहादुरी का इकतरफा परिचय देती है। एवरेस्ट के शिखर को छूने के वे तमाम अरमान धरे के धरे रह जाएं, अगर नेपाल मूल के शेरपा उनकी मदद नहीं करें। इन शेरपाओं को एवरेस्ट तक पर्वतारोहण कराने वाली कंपनियां माउंटेन वर्कर्स कहती हैं। इन शेरपाओं के लिए एवरेस्ट के शिखर तक जाना भी कोई बहादुरी या महान कार्य नहीं है। ये लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए यह कार्य करते हैं।
क्या करते हैं ये माउंटेन वर्कर्स? इन माउंटेन वर्कर्स के काम की एक झलक हाल ही में प्रदर्शित ब्रिटिश अमेरिकन थ्रीडी फिल्म एवरेस्ट में देखने को मिलती है। इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर अच्छा बिजनेस किया है और इसका शुमार टॉप टेन थ्रीडी फिल्मों में किया जा रहा है। इस फिल्म की कहानी 1996 के एक पर्वतारोहण अभियान की है, जिसे बहुुत संघर्षों का सामना करना पड़ा था और इस अभियान में अनेक जानें गई थीं। यह फिल्म उस अभियान में जाने वाले पर्वतारोहियों और उनके परिवार के लोगों पर आधारित है। इस फिल्म को देखो तो लगता है कि 65 हजार डॉलर देकर 1996 में जो लोग एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए गए थे, वे नेपाल के शाही पर्यटक थे। उन पर्यटकों का डेस्टिनेशन एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ना और वापस उतरना था। 40 दिन के इस पर्वतारोहण अभियान में नेपाल के शेरपा उनके लिए सारा काम करते है। पर्वतारोहियों के लिए टेंट लगाना, उनके खाने-पीने की सामग्री को ले जाना, पर्वतारोहियों के बिस्तर, डायनिंग टेबल, दवाइयां, आक्सीजन सिलेंडर आदि को हिमालय पर ले जाकर स्थापित करना और साथ ही पर्वतारोही आराम से शिखर तक जा सके इसके लिए सीढ़ियां लगाना, रस्सियां बांधना, सुरक्षा इंतजाम करना आदि तमाम कार्य ये शेरपा ही करते हैं। बीमार और घायल पर्यटकों को लाने में इनकी भूमिका होती है और शौकियां पर्यटकों को पीठ पर लादकर भी ये ऊंचाई तक ले जाते हैं। हिमालय पर्वत पर आने वाले तूफानों, बर्फीली हवाओं और बारिश के कारण अनेक शेरपा मौत के काल में समा जाते हैं। हाल ही में नेपाल में आए भूकंप में भी पूरी दुनिया का ध्यान केवल पर्यटकों को बचाने पर था। इस भूकंप में अनेक शेरपाओं की मौत हो गई, जो पर्वतारोहियों के लिए कार्य करते थे। लाखों डॉलर खर्च करके एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचने के लिए जो पर्वतारोही आते है उनकी सेवा में लगे शेरपाओं की मौत पर औसतन 410 डॉलर बीमा राशि उनके परिवार को मिली।

एवरेस्ट फिल्म में बहुत से दिलचस्प किरदार है और यह फिल्म उन सब किरदारों के एवरेस्ट पर फतह करने के अभियान पर टिकी है। एक ऐसा शख्स है, जो अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर हिमालय पर फतह करने आया है। एक ऐसी महिला है, जो छह बार हिमालय की अलग-अलग चोटियों पर चढ़ने में कामयाब हुई, एक ऐसा शख्स भी है जो पोस्टमैन है, लेकिन जीवन में कुछ बढ़ा करना चाहता है, एक और शख्स है, जो स्कूल टीचर है और 65 हजार डॉलर किसी तरह इकट्ठा करके वह अपने विद्यार्थियों को कुछ न कुछ खास करने की प्रेरणा देना चाहता है।
ये सभी पर्वतारोही नेपाल के काठमांडू से यात्रा शुरू करते हैं और फिर बेसकेम्प होते हुए 40 दिन में एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने के अभियान में जुटते है। ये 40 दिन उनके लिए संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, मानवीय सहयोग, संवेदना, जुझारूपन, दिवास्वप्न और बर्फीले तूफानों से संघर्ष के है। एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान आक्सीजन की कमी उन्हें बीमार बना देती है। सूरज की धूप इतनी तेज होती है कि आंखें चुंधिया जाती है। चारों तरफ सफेद बर्फ ही बर्फ देखते रहने के कारण श्वेतांधता हो जाती है, जिसमें पर्वतारोहियों को केवल सफेद रंग ही दिखाई देता है। खून की उल्टियां आना, दिल के दौरे पड़ना, दुर्घटनाओं में जख्मी होना आम बातें होती है। यह पूरी फिल्म इसी यात्रा का दस्तावेज है। मरणासन्न साथी को बचाने के प्रयास में खुद भी मौत से संघर्ष करने और मानवीयता का नया चेहरा प्रस्तुत करने की कहानी इस फिल्म में है। इसके साथ ही इस फिल्म में पर्वतारोहियों के परिवार वालों की दशा का भी चित्रण है। पर्वतारोहण कराने वाली वंâपनियों से जुड़े कर्मचारियों, चिकित्सकों, प्रबंधकों आदि के संघर्ष को भी फिल्माया गया है। शेरपाओं के श्रमसाध्य कार्य को छोड़कर।
जनवरी 2014 में इस फिल्म की शूटिंग इटली में शुरू हुई थी। इटली और ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में भी इस फिल्म की शूटिंग हुई है। हिमालय पर इस फिल्म की शूटिंग के लिए केवल 14 दिन की ही अनुमति थी। जनवरी 2014 में यह हिस्सा शूट किया गया है। इस फिल्म की शूटिंग के लिए इसके कलाकारों और शूटिंग करने वाली टीम ने पर्वतारोहण की ट्रेनिंग ली। फिल्म की लागत लगभग 325 करोड़ रुपए के बराबर है।
भारत में यह फिल्म अंग्रेजी के साथ ही हिन्दी में भी प्रदर्शित की गई है। अगर आपकी रूचि सहासिक अभियानों में है या एवरेस्ट पर फतह पाने की है, तो यह फिल्म जरूर देखिए। बॉलीवुड और हॉलीवुड की फॉर्मूला फिल्मों से अलग हटकर अनुभव होगा।
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