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फिल्म समीक्षा : कैलेंडर गर्ल्स

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अगर आपने मधुर भंडारकर की पेज थ्री, फैशन, कार्पोरेट आदि फिल्मों में से कोई भी फिल्म देखी है, तो यह फिल्म देखने की जरूरत नहीं। मधुर भंडारकर ने पुरानी फिल्मों की खिचड़ी को गर्म कर परोस दिया है। यह फिल्म उन लोगों के लिए ठीक है, जो सिनेमा हाल में फिल्म देखने के लिए नहीं जाते है। हां, इस फिल्म को देखने जाने के पहले थियेटर में फोन करके पता जरूर कर लेना कि फिल्म का शो हो भी रहा है या नहीं। वर्ना आपके आने-जाने का समय यूं ही बर्बाद होगा। इंदौर में कई सिनेमाघरों में पहले और दूसरे शो ही दर्शकों के ना आने से रद्द कर दिए गए। बॉक्स ऑफिस पर मय्यत का नजारा मधुर भंडारकर ने दिखा दिया।

मधुर भंडारकर रामगोपाल वर्मा के चेले हैं और रामगोपाल वर्मा की तरह ही शायद उन्हें भी भ्रम हो गया है कि वे जो भी बनाएंगे, वह हिट ही होगा। प्रचार और ट्विटर के जरिए फिल्में नहीं चलती, यह बात समझने में उन्हें भी वक्त लगेगा। मधुुर भंडारकर के लिए यह फिल्म रामगोपाल वर्मा की आग जैसी साबित होगी। पता नहीं, मेट्रो के फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को 2/2.5 स्टार क्यों बांट दिए। हो सकता है कि वे स्टार के पहले मायनस का निशान लगाना भूल गए हों।

विजय माल्या की किंगफिशर कंपनी हर साल कैलेंडर छापती रही है। ये कैलेंडर कितने लोगों ने देखे और खरीदे होंगे यह तो विजय माल्या ही जानें। सब लोगों को यह बात पता है कि विजय माल्या की दशा भी सुब्रतो राय सहारा जैसी हो गई है। विजय माल्या संसद पहुंच गए थे। शायद इसीलिए इस फिल्म में डायलॉग है, जहां कैलेंडर गर्ल को उसका मैनेजर एक शोक सभा में जाने के 3 लाख रुपए दिलवा देता है और कहता है कि मेरे साथ रही तो शोक सभा से लोकसभा तक पहुंचा दूंगा। द डर्टी पिक्चर के डायलॉग- ‘फिल्म केवल तीन चीजों के कारण चलती है, इंटरटेनमेन्ट, इंटरटेनमेन्ट, इंटरटेनमेन्ट’ की तरह ही इस फिल्म का एक डायलॉग है- ‘फिल्म वही जो बनकर रिलीज हो जाए’। सभी को पता है कि बॉलीवुड की 1000 से ज्यादा फिल्में डिब्बों में बंद है।

फैशन मॉडल्स को लेकर बनाई गई थी और पेज थ्री सेलेब्रिटीज को लेकर। कैलेंडर गर्ल्स उन लड़कियों को लेकर बनाई गई है, जो माल्या छाप कैलेंडर पर आने के बाद ग्लैमर की चकाचौंध में खो जाती हैं। रोहतक, कोलकाता, हैदराबाद, गोवा और पाकिस्तान मूल की लंदन में रहने वाली पांच लड़कियों का चयन एक प्रसिद्ध उद्योगपति के वार्षिक कैलेंडर के लिए हो जाता है।

पांचों लड़कियां अलग-अलग परिवेश से आई हैं। पांचों लड़कियों की आंखों में भविष्य के सपने है और वे एक हद तक समझौते करने के लिए भी तैयार हैं। फिल्म खत्म होते-होते पांचों लड़कियां अलग-अलग मुकाम पर पहुंच जाती है। एक धनी उद्योगपति की बीबी बन जाती है, दूसरी झंडू छाप बिल्डर के बेटे के साथ लांच हो जाती है, तीसरी ब्वायफ्रेंड के चक्कर में पढ़कर क्रिकेट के सट्टे में लिप्ट होने के बाद जेल चली जाती है और वहां से छूटकर आत्महत्या करने के लिए कूदने ही वाली होती है कि एक रिएलिटी शो के डायरेक्टर प्रस्ताव रख देते हैं। चौथी लड़की एस्कॉर्ट गर्ल बन जाती है और पांचवी टीवी की एंकर। कैलेंडर गल्र्स से लगता है कि इसमें 12लड़कियां होनी थी, लेकिन मधुर भंडारकर केवल पांच नई हिरोइनों को ही अफोर्ड कर पाए।

इस फिल्म में विज्ञापन फिल्मों के निर्माता प्रहलाद कक्कड़, सुहेल सेठ, मीता वशिष्ठ और खुद मधुर भंडारकर भी चिल्लर कलाकार के रूप में है। ये सभी ओवर एक्टिंग के शिकार है और नई लड़कियों को एक्टिंग आती नहीं। इस फिल्म में नाजनीन मलिक के रूप में सतरूपा पायने ने एक कैलेंडर गल्र्स की भूमिका निभाई है, जो पाकिस्तान मूल की है और लंदन से मुंबई में आकर ग्लैमर की दुनिया में छा जाना चाहती है। सबसे ज्यादा दुर्गती इसी पात्र की हुई है। शायद इसीलिए इस फिल्म को पाकिस्तान विरोधी करार दिया गया है।

मधुर भंडारकर खुद गणेशजी के महाभक्त हैं। उनकी फिल्म कंपनी मंगलमूर्ति फिल्मस ने गणेशोत्सव के दौरान फिल्म रिलीज भी की हैं। मधुर भंडारकर खुद हर मंगरवाल को मुंबई में खार स्थित अपने घर से सिद्धी विनायक मंदिर, वर्ली तक पैदल नंगे पाव आते है, लेकिन फिर भी गणेशजी उनपर खुश नहीं है। शायद उनको पता नहीं है कि गणेशजी बुद्धि के देवता है, चापलूसी के नहीं।

मधुर भंडारकर की फिल्म का टिकिट लेने के लिए पहले दिन बहुत संघर्ष करना पड़ा। इंदौर के मंगल बिग में पहले और दूसरे शो को देखने कोई भी नहीं आया था, इसलिए शो हुआ ही नहीं। वेलोसिटी में भी कोई नहीं था, आधे घंटे बाद मंगल बिग से लौटकर आए ६-७ लोगों के आने के बाद किसी तरह शो हो सका। जब लोग फिल्म देखने आएंगे ही नहीं तो पसंद क्या करेंगे?

कैलेंडर गर्ल्स एक ऐसी बासी कढ़ी है, जिसमें फैशन, कार्पोरेट, पेज थ्री और हिरोइन फिल्मों की चटनी डाल दी गई है। फिल्म देखते-देखते अलग-अलग स्वाद जायका खराब कर देते हैं। मधुर भंडारकर खुद राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार हैं। बहुत संघर्षों के बाद इस मुकाम पर पहुंचे हैं, लेकिन उन्हें भी खुद के बारे में बहुत से मुगालते हो गए है और मुगालतों की कोई दवा नहीं होती।

 

 

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