एक बाद साफ कर दूं कि फिल्म तलवार ‘आरुषि और हेमराज हत्याकांड’ पर आधारित फिल्म नहीं है। यह फिल्म ‘आरुषि और हेमराज हत्याकांड की जांच’ पर आधारित है। हमारी पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों की पोल खोलने के साथ ही यह फिल्म न्याय व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। इसी फिल्म का एक डायलॉग है- ‘‘न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी, एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार है। यह तलवार है पुलिस और जांच एजेंसियां। अब इस तलवार पर जंग लग चुका है।’’

राखी और गुलजार की बेटी मेघना ने विशाल भारद्वाज के साथ मिलकर एक ऐसी फिल्म बनाई है, जिसे देखना पुलिस प्रशासन और न्याय व्यवस्था से जुड़े हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। इसलिए इस फिल्म में उन लोगों को मजा नहीं आएगा, जो ‘हेरा–फेरी’ टाइप फिल्में देखने के शौकीन हैं। यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है, जो गंभीर सिनेमा देखना चाहते हैं।
7 साल पहले हुए आरुषि और हेमराज की हत्या के मामले में आरुषि के माता-पिता डॉ. नूपुर तलवार और उनके पति डॉ. राजेश तलवार जेल में है। उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई है। इस फिल्म में उन्हें निर्दोष दिखाने की कोई कोशिश भी नहीं की गई है। इसी मामले पर पहले ‘रहस्य’ नाम की फिल्म बन चुकी है। तलवार का नाम पहले नोएडा रखा गया था, क्योंकि आरुषि और हेमराज हत्याकांड नोएडा में हुआ था। मीडिया ने इस हत्याकांड पर लगातार व्यापक कवरेज किया था। इसे अब तक कि सबसे रहस्यमयी हत्या करार दिया जाता रहा है। फिल्म बनाने के पहले डॉ. तलवार दंपत्ति से इसकी इजाजत भी ली गई थी। ऐसी अफवाहें भी उड़ी थी कि तलवार दंपत्ति ने इस फिल्म की अनुमति के लिए अच्छी खासी रकम ली है। इस फिल्म के नाम पर तलवार दंपति ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी।फिल्म हिन्दी दिवस यानि 14 सितंबर की जगह गांधी जयंती यानि 2 अक्टूबर को रिलीज हुई।

इस फिल्म में आरुषि और हेमराज की हत्या के तीन पहलू दिखाए गए है। हत्या जैसे संगीन मामलों में भी पुलिस किस तरह जांच करती है और जांच का काम सीबीआई जैसी संस्थाओं को कैसे सौंपा जाता है और फिर वहां जांच की प्रक्रिया कैसी होती है, इस पर इस फिल्म में रोशनी डाली गई हैं। सीबीआई की पैरोडी बनाकर सीडीआई कर दिया गया है। फिल्म में जांच के तीनों पहलू इस तरह दिखाए गए है कि सच साबित लगते है। बड़ी-बड़ी जांच एजेंसियां भी इस तरह सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करने लगती है। बिना पुष्टि के ही ऑनरकीलिंग का मामला बना दिया जाता है। वाइफ स्वेपिंग जैसे मामले में किसी को भी बदनाम करने में न मीडिया को संकोच होता है और न जांच अधिकारियों को। फोरेंसिक रिपोर्ट, नार्को टेस्ट, लाइ डिटेक्टर टेस्ट जैसे मामले भी कैसे झूठे होते हैं, इस पर भी रोशनी डाली गई है। कहीं-कहीं तो लगता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच को जिस तरह दिखाया गया है, वैसी शायद नहीं होती होगी। वहां के पुलिस अधिकारी कुछ संवेदनशील होते होंगे। इसके विपरीत भी लोगों का मानना है, जो कहते है कि फिल्म में कम दिखाया गया है।
इस फिल्म को टोरेंटो फिल्म फेस्टीवल में प्रदर्शित किया गया था, जहां इसकी बहुत सराहना हुई थी। इरफान खान और तब्बू के रोल को बहुत सराहा भी गया है, हालांकि इस फिल्म में तब्बू की कोई जरूरत थी ही नहीं। जब यह पूरी फिल्म ही एक दोहरे हत्याकांड की जांच प्रक्रिया को लेकर थी, तो उसमें जांच अधिकारी और उसकी पत्नी के संबंधों को दिखाने की कोई जरूरत नहीं थी। पर शायद यह मेघना गुलजार को जरूरी लगा हो, क्योंकि उनके माता-पिता राखी और गुलजार भी अलग-अलग रहते हैं। शायद उन्होंने तब्बू में राखी को देखा हो।
इस फिल्म के बारे में मेघना गुलजार ने खुद ही एक इंटरव्यू में कहा था कि यह कोई वाइयरिस्टिक (voyeuristic) अर्थात दृश्यरतिक फिल्म नहीं है। इसमें तलवार दंपति को निर्दोष दिखाने की कोशिश भी नहीं की गई है। केवल यहीं दिखाया गया है कि जांच प्रक्रिया कैसी होते हैं। मेघना का दावा है कि इस फिल्म को बनाने के पहले दो साल तक गहन शोध किया गया। यह शोध इस फिल्म में दर्शकों को भी नजर आता है।
इस फिल्म में निर्देशक ने हत्या के रहस्य को तीन तरीके से दिखाया है। पहला तरीका जो उत्तरप्रदेश पुलिस का था, जिसकी जांच में तमाम खामियों के बावजूद तलवार दंपत्ति को हत्याकांड का दोषी बता दिया गया था। दूसरा तरीका था ‘सीडीआई (सेन्ट्रल डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टिगेशन)’ जांच अधिकारी अश्विनी कुमार यानि इरफान खान की जांच का, जिसमें यह बात साबित होती है कि किसी ने भी हत्याएं करते हुए किसी को देखा नहीं था और केवल कल्पना के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। भले ही दस अपराधी छूट जाए पर एक भी निर्दोष आदमी को सजा नहीं मिलनी चाहिए। तीसरा तरीका जांच अधिकारी को बदलने के बाद तलवार दंपति को मिली सजा की व्याख्या का है। निर्देशक ने उस जज को भी दिखाया है, जो इस मामले में दिलचस्पी दिखाती है और सीडीआई की खात्मा रिपोर्ट स्वीकार नहीं करती। 1950 में जापान की फिल्म रशोमन में भी इसी तरह के एक केस के तीन पहलू दिखाए गए थे। जिनमें आपस में विरोधाभास था।

फिल्म बताती है कि हमारी जांच एजेंसियों में राजनीति किस तरह घुस गई है। यहां राजनीति को सीधे-सीधे तो नहीं दिखाया गया, लेकिन इशारा भर किया गया है। जांच में अपनी विफलताओं को एजेंसियां स्वीकार नहीं करती और किसी को भी सजा दिलाने में उन्हें ऐतराज नहीं होता। कानून के जाल में फंसा आदमी तिलमिलाता रहता है और न्याय की गुहार लगाता है, लेकिन जांच अधिकारी अपनी खाल में ही मगन रहते है। उनका संवेदना का स्तर न्यूनतम होता है। इन जांच एजेंसियों के बारे में सोचते वक्त ताजा उदाहरण शीना बोरा हत्याकांड का याद आ जाता है, जिसके बारे में तरह-तरह के दावे किए गए थे। तलवार देखने के बाद लगता है कि इस हत्याकांड में भी ऐसा ही कुछ नतीजा सामने आएगा।
मेघना गुलजार ने इसके पहले भी फिल्में बनाई है। उन्होंने सईद अख्तर मिर्जा और अपने पिता गुलजार को निर्देशन में मदद भी की है। वे खुद लेखिका हैं और टाइम्स ऑफ इंडिया में फ्री लांस जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर चुकी हैं। अपनी पुरानी फिल्मों की तरह उन्होंने इस फिल्म का स्क्रीन प्ले लिखने की कोशिश नहीं की, बल्कि यह जवाबदारी अपनी रिसर्च टीम और विशाल भारद्वाज को सौंपी। विशाल भारद्वाज ने उनके इस विश्वास की रक्षा की है और साबित कर दिया कि वे अच्छे लेखक भी है। इस फिल्म का संगीत भी विशाल भारद्वाज का ही है, लेकिन फिल्म में बैकग्राउंड में ही गाने बजते है। फॉर्मूला फिल्मों की तरह गाने इसमें नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की फिल्म निर्माण कंपनी जंगली पिक्चर्स इस फिल्म की निर्माता और विशाल भारद्वाज सहनिर्माता है, इसलिए प्रचार की कोई कमी इस फिल्म को नहीं रहेगी। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह ने भी इस फिल्म को जो प्रचार दिया है, वह सोच-समझकर दिया है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि फिल्म को प्रमोट करने के बहाने झूठी तारीफ की जा रही है।
तलवार में इरफान खान और तब्बू का नाम आते ही लगता था कि उन्होंने आरुषि के मां-बाप की भूमिका की होगी, लेकिन इरफान जांच अधिकारी और तब्बू उनकी पत्नी के रोल में है। एक जांच अधिकारी के तनावों को उन्होंने बाखूबी व्यक्त किया है। नीरज काबी ने डॉक्टर नुपूर तलवार की भूमिका की है और कोकणा सेन शर्मा ने आरुषि की मां नुपूर का रोल किया है। आरुषि की भूमिका में आयेशा परवीन है, लेकिन उन्हें न्यूनतम दिखाया गया है। क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन के मामले में पुलिस और जांच अधिकारियों की भूमिका में कलाकारों ने अच्छा रोल किया है।
गंभीर फिल्मों को पसंद करने वाले तलवार को पसंद करेंगे।
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