
वकीलों को जज़्बा जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह फ़िल्म उन्हें कॉमेडी फ़िल्म का मज़ा देगी. जज़्बा ऐश्वर्या रॉय बच्चन की फ़िल्म है। ऐश्वर्या के लिए ही बनाई गई है। वे इसके निर्माताओं में से भी हैं इसलिए इसमें किसी और के लिए गुंजाइश रखी ही नहीं गई है। शबाना आज़मी और इरफ़ान के लिए भी गुंजाइश नहीं रखी गई थी, लेकिन इरफ़ान ने अपने लिए संभावनाएं बना ही ली है. जॉन अब्राहम को पहले इसमें लिया गया था, पर जॉन ऐन मौके पर हट गए या हटा दिये गये।
इस फ़िल्म में ऐश्वर्या ने वह सब किया है जो वे अच्छी तरह कर सकती हैं। उन्होंने सेक्सी कपडे पहनकर जॉंगिंग की, ऐरोबिक्स और धनुरासन जैसे आसन किये, कार रेस की और टॉप वकीलों जैसे वे काम किये, जो कोई टॉप वकील करता नहीं. वकील जानते हैं कि वे हर दोषी को नहीं छुड़ा सकते. (सुब्रत रॉय को राम जेठमलानी, कपिल सिब्बल और रविशंकर प्रसाद भी कहाँ छुड़ा सके? आसाराम जेल में ही है और संजय दत्त, तरुण तेजपाल भी कहाँ निर्दोष साबित हुए?) पूर्व मिस वर्ल्ड अब करीब 42 की हैं, वे जानती हैं कि 20 साल पहलेवाला जलवा अब बचा नहीं है! इसलिए स्वयं पर केंद्रित फ़िल्म मज़बूरी थी। 66 साल की शबाना आज़मी भी नाहक ही इस फ़िल्म में भर्ती हो गईं और जबरदस्ती थोपे गए अंत तक कहानी झिलवाती रहीं।
जज़्बा फ़िल्म बेटी बचाओ अभियानवाले शिवराज सिंह चौहान को पसंद आएगी। इसकी हीरोइन यानी ऐश्वर्या शादी के बाद अमेरिका में रह रहे पति और परिवार को इसलिए छोड़ आती है क्योंकि वे उससे पेट में पल रही बेटी का गर्भ गिराने के लिए दबाव डाल रहे थे। भारत आकर वह टॉप की क्रिमिनल लॉयर बन जाती हैं। फिर अचानक उनकी टीनएज बेटी का अपहरण हो जाता है और क्रिमिनल लॉयर शरलक होम्स बन जाती है. डायरेक्ट!!!
इस फ़िल्म में जो कुछ होता है ऐश्वर्या के इर्द गिर्द ही होता है। रहस्य, रोमांच, एक्शन, स्टंट, कार रेस.....जब ऐश्वर्या थक जाती हैं तो फिलर जैसे शबाना, जैकी श्रॉफ, अतुल कुलकर्णी दर्शकों को सताने आ जाते हैं।
फ़िल्म में संवाद अच्छे हैं । इरफान ने ऐश्वर्या के कॉलेज के सहपाठी और भ्रष्ट पुलिस अफसर का रोल किया है। ज्यादातर अच्छे संवाद इरफ़ान के खाते में हैं। जैसे --
एक अच्छा गाना और दो चार अच्छे डॉयलॉग ऐश्वर्या के खाते में भी हैं. जैसे -- बेकसूर हमारी फीस अफोर्ड नहीं कर सकते;
मर्द पिता तब बनता है जब बच्चा पैदा होता है पर औरत मां तभी बन जाती है जब बच्चा गर्भ में आता है!
अगर आप ऐश्वर्या के दीवाने हैं तो फ़िल्म देख सकते हैं, पर दिमाग का इस्तेमाल जरुरी नहीं है।
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