
फिल्म समीक्षा : प्यार का पंचनामा-2
प्यार का पंचनामा-2 को ए सर्टिफिकेट दिया गया है। फिल्म में एडल्ट जैसी तो कोई बात नहीं है, लेकिन फूहड़ता का चरम है। महानगरीय उच्च आय वर्ग के युवा तबके को यह फिल्म पसंद आ रही है। फिल्म में कहीं भी तार्किकता नहीं है। केवल महिलाओं का मजाक उड़ाया गया है। फिल्म बताती है कि प्यार-व्यार नाम की कोई चीज नहीं होती, लड़कियां केवल पैसेवाले युवकों को पसंद करती है, जो उन्हें शॉपिंग करा सके, देश-विदेश घूमा सके, शराब पिला सके और उन्हें महंगे-महंगे तोहफे खरीदकर दे सकें। अंत में फिल्म बताती है कि प्यार के चक्कर में जो तीन युवक फंसे थे, वे बुरी तरह उल्लू बनाए गए। उन सबको अपनी मम्मियों की याद आती है।
निर्देशक ने उन सभी दृश्यों की कल्पना की, जिनमें महानगरीय उच्च आय वर्ग का युवा तबका क्या चाहता है, उन दृश्यों को पिरो डाला। 3 लाख रुपए महीना कमाने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर बीपीओ में काम करने वाली 50 हजार रुपए महीना कमाने वाली लड़की के जाल में कैसे फंसता है और जब वह अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए 3 लाख रुपए की नौकरी छोड़ता है, तो वह लड़की भी उसे छोड़ देती है। ऐसा ही दो और लड़कों के साथ भी होता है। शहरी युवा वर्ग की पार्टियां, पिकनिक, विदेश यात्रा, शराबखोरी, क्लबबाजी, तेज रफ्तार ड्राइविंग, अर्धनग्न रहने वाली लड़कियां, चुम्बन दृश्य, बेडरूम सीन यह सब है प्यार का पंचनामा-2 में। देश में 1-2 प्रतिशत ऐसे लोग है भी और 10-15 प्रतिशत ऐसे लोग भी है, जो ऐसे जीवन का सपना देखते हैं। बस हो गया पंचनामा।
यह फिल्म बताती है कि मोटी तनख्वाह पानेवाले और बड़ी नौकरी करनेवाले युवा वर्ग में चिंतनशीलता की कमी है। उन्हें लड़कियों के अलावा कुछ नहीं सूझता और लड़कियों को ऐसे लड़कों के साथ प्यार का नाटक करने में मजा आता है। लड़कियां ऐसे लड़के का भरपूर दोहन करती है और गुड़ की भेली में पड़ी मक्खी की तरह उठा कर बाहर फेंक देती है। फिल्म में बार-बार बीप की आवाज सुनाई देती है। यह बीप तब बजाया जाता है, जब गालियोंं का भरपूर उपयोग होता है। फिल्म के अनुसार लड़कियां लालची और मतलबी होती हैं और लिव-इन रिलेशनशिप में भी उन्हें कोई ऐतराज नहीं होता, अगर लड़का पैसेवाला और सुविधासम्पन्न हो। लड़कियों के मां-बाप को भी इसमें कोई खास आपत्ति नहीं होती। लड़कियों के मां-बाप ऐसे लड़कों का भरपूर उपयोग अपने घर के कामों में नौकर की तरह करते हैं और जो भी पहला एनआरआई लड़का मिलता है, उसके गले अपनी लड़की बांध देते है और लड़की तो मानो ऐसे ही पल का इंतजार कर रही होती है।
फिल्म के सभी प्रमुख कलाकार नए हैं। अंशुल (कार्तिक आर्यन) की स्टैण्डअप कॉमेडी अच्छी है। गाने भर्ती के है और फिल्म बकवास है। बेशक निर्माता ने करोड़ों रुपए फिल्म बनाने में खर्च किए और निर्देशक ने भी मेहनत की है, लेकिन अगर आपके पास टिकिट के पैसे फालतू के हो और वक्त कांटे न कट रहा हो, तो फिल्म झेलने जा सकते है।
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