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शुक्र है कि सोशल मीडिया का सरकारीकरण नहीं हुआ है। इस कारण वहां आरक्षण भी नहीं है और जातिवाद भी लगभग नहीं के बराबर है। अगर सोशल मीडिया सरकारी होता तो कुछ नेता अवश्य मांग करते कि फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन आदि में आरक्षण किया जाए। ऐसी व्यवस्था हो कि निश्चित प्रतिशत लाइक आरक्षित कोटे के हो ही। यह भी होता कि अकाउंट शुरू करने के पहले किसी राजपत्र अधिकारी से प्रमाणित प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि नत्थी करनी पड़ती कि आप किस जाति के हो।

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इसके बाद भी सोशल मीडिया पर लोगों के उपनाम जाति की घोषणा कर ही देते है। त्रिपाठी, चतुर्वेदी, शर्मा, मिश्रा, जोशी, श्रीवास्तव, यादव, सिंह, वर्मा, परमार, अग्रवाल, कुमार, जैन, ठाकुर, चौहान आदि। इसके बाद भी कुछ लोग अपने नाम के पहले पंडित, कुंवर, ठाकुर आदि लिखते है। सोशल मीडिया पर अभी ऐसा कोई नियम नहीं है कि कमेंट या लाइक करने का कोई आधार जाति को माना जाए। इसके बावजूद कई लोग है, जो सोशल मीडिया पर जातिवाद फैलाते है। ऐसे लोग दो किस्म के है। पहले तो वे जो अपनी जाति का प्रचार और उसे महिमामंडित करते हैं। दूसरे वे है जो अपनी जाति का प्रचार तो नहीं करते, लेकिन हमेशा दूसरी जाति वालों को गरियाते रहते हैं। इन लोगों को लगता है कि सारे पिछड़ेपन का कारण जातिवाद और केवल जातिवाद ही है। दिलचस्प यह है कि मलाईदार पदों पर बैठे कई लोग भी सोशल मीडिया में जाति को बढ़ाते रहते है।

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करीब एक साल पहले राजदीप सरदेसाई ने नरेन्द्र मोदी सरकार के मंत्रीमंडल गठन के वक्त एक ट्विट किया था, जिसमें उन्होंने गौड़ सारस्वत ब्राह्मण्ड समाज के दो लोगों को केन्द्रीय मंत्री बनाने पर खुशी जाहिर की थी। राजदीप सरदेसाई के उस ट्विट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई और यह कहा गया कि राजदीप सरदेसाई ने आखिर अपनी जाति प्रदर्शित कर ही दी। वे अपनी जाति बताकर कौन से जातीय गौरव को महिमामंडित कर रहे है, यह बात समझ के परे है।

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सोशल मीडिया के एक मर्मज्ञ ने तो इस बात पर गहरी रिसर्च कर डाली कि किस जाति के लोगों के मित्रों की सूची में कौन-कौन सी जाति के लोग मुख्य हैं। उन्होंने यह पाया कि आमतौर पर लोग अपनी जाति के लोगों से ही सोशल मीडिया पर भी घिरे रहते है। इसके बहुत से सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कारण हो सकते है। इन कारणों की भी उन्होंने विस्तृत व्याख्या की।

सोशल मीडिया पर एक और जाति विचारधारा वाली है। कुछ लोग इसे भक्तवादी विचारधारा भी कहते है। कार्ल माक्र्स, राममनोहर लोहिया, गांधी, ओशो, आम्बेडकर और अब नरेन्द्र मोदी के प्रशंसक कई बार भक्त का रूप धर कर सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते है। ऐसे लोगों से तर्क वितर्क नहीं किया जा सकता। ये केवल अपनी ही बात कहते है। इनका सारा चाल-चलन एकतरफा और बदजुबानी से भरा होता है। यह बदजुबानी इस तरह हावी है कि अनेक बुद्धिजीवी यहां खुद को अनुपस्थित दर्शा देते है।

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सोशल मीडिया पर जातिवाद का एक और रूप थर्ड जेंडर को लेकर है। एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के लोग भी सोशल मीडिया पर खुलकर सामने आते हैं। एलजीबीटी समुदाय का समर्थन करना प्रगतिशीलता की निशानी मानी जाती है। सोशल मीडिया पर ही पिछले दिनों एक लम्बा विवाद गे समुदाय के एक मेट्रीमोनियल विज्ञापन को लेकर हुआ था। इस विज्ञापन को गे समुदाय का पहला मेट्रीमोनियल विज्ञापन माना जाता है। विचित्र बात यह थी कि इस विज्ञापन को प्रकाशित करवाने वाली महिला ने अपने समलैंगिक बेटे के लिए योग्य ‘वर’ चाहा था, जिसमें कास्ट नो बार तो लिखा था, लेकिन साथ ही यह भी लिखा था कि एक समुदाय विशेष के वर को ही प्राथमिकता दी जाएगी। विचित्र बात यह है कि जहां विवाह के लिए लड़की जरूरी नहीं थी, लेकिन गे की जाति को प्राथमिकता दी जा रही थी।

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से आशा जागती है कि जातिवाद भारत में खत्म होकर रहेगा, लेकिन कई लोगों के लिए जाति सुविधा है। जाति उनके लिए राजनीति का र्इंधन है। जाति उनकी समस्या नहीं, विशेषाधिकार है। दूसरी तरफ ऐसे लोग है, जिनके लिए जाति-सम्मान की बात नहीं, लाज की बात है। इसीलिए अनेक समुदायों के लोग लगातार आंदोलन करते रहते है और वे आंदोलन इसलिए करते है कि उनकी जाति को ‘पिछड़ी जाति’ माना जाए। आम बोलचाल की भाषा में एक मुहावरा चल निकला है, जो भारत की राजनीति को दर्शाता है- ‘जहां जात, वहां करामात’। वोट की राजनीति में यह सब तोे होना ही है। अब इस कीचड़ के छींटे सोशल मीडिया पर भी नजर आए, तो अचरज कैसा?

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