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विश्व हिन्दी सम्मेलन कोई दो मिनिट में तैयार होने वाली मैगी नहीं है, इस आयोजन के लाभ कई बरस और दशकों लोगों को समझ में आएंगे।कितना अच्छा लगेगा जब हम अपनी हर चीज़ को हिन्दी मे ढूंढेगें, पढ़ेंगे, गायेंगे और जानेंगे ! पूरा विश्व जानेगा हिन्दी !!

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हिन्दी दिवस के ठीक पहले भोपाल में आयोजित दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन सोशल मीडिया में लगातार चर्चा में रहा। इसी के साथ प्रिंट और टेलीविजन मीडिया में भी इस आयोजन की चर्चा लगातार होती ही रही. इस आयोजन से एक वर्ग प्रसन्न था तो एक वर्ग ऐसा भी था, जिसने लगभग हर स्तर आयोजन के विरुद्ध कुछ न कुछ लिखने का मन बना लिया था।

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सोशल मीडिया पर विश्व हिन्दी सम्मेलन के पक्ष में लिखनेवाले हिन्दी प्रेमी, तकनीक के विशेषज्ञ, सरकारी अधिकारी, पत्रकारों का एक वर्ग और सत्तारूढ़ दाल के समर्थक शामिल थे तो दूसरी तरफ वामपंथी विचार धारा से जुड़े और वाम विचार से पोषित बुद्धिजीवी और उपेक्षित साहित्यिक वर्ग के लोग थे।

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विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन भारत में और वह भी भारत के ह्रदय स्थल मध्यप्रदेश के भोपाल में होना हर दृष्टिकोण से बड़ी घटना थी। ऐसे सम्मेलनों में प्रवेश केवल पंजीकरण से ही होता है, लेकिन भारत में हिन्दी के कुछ स्वनामधन्य लोगों को लगा कि यह उनका विशेषाधिकार है कि उन्हें ऐसे आयोजन में सरकारी अतिथि की तरह बुलवाया ही जाए। कई को लगा की उनकी उपेक्षा हो रही है क्योंकि भारत सरकार ने जब उन्हें पद्म सम्मान या विभिन्न साहित्यिक सम्मान के योग्य माना गया था तो वे यहाँ भी सम्मान के पूरे हकदार हैं ही। जावेद अख़्तर ने ऐसे 'आमंत्रित नहीं' किस्म के साहित्यकारों को सलाह दी कि अगर उन्हें नहीं बुलाया गया था तो उनके सामने पंजीकरण कराकर जाने का मार्ग खुला था ही।

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इसके अलावा साहित्यकारों का भी एक समूह यह मानता रहा है कि हिन्दी सम्मेलन का अर्थ ही साहित्यकार सम्मेलन होता है। विदेश राज्यमंत्री जनरल विजयकुमार सिंह की उस बात ने भी आग में पेट्रोल डालने का काम किया जो उन्होंने साहित्यिक आयोजन को लेकर कही थी। ऐसी टिप्पणी से बचा जाना था और अगर यह जुबान फिसलने का मामला था तो क्षमा के दो बोल कह देना उचित होता।

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साहित्यकारों के साथ ही समाज के लगभग सभी वर्गों में विदेश राज्य मंत्री से भारी नाराज़गी रही। हालात यह थे कि आयोजन शुरू होने के ठीक एक दिन पहले भोपाल के साहित्यकारों ने पत्रकार वार्ता की और इस आयोजन को लोकतंत्र और हिन्दी विरोधी, हिन्दी सम्मेलन को हिन्दू सम्मेलन, विश्व संघ सम्मलेन, सरकारी आयोजन, भाजपा कार्यकर्ता मिलन और न जाने क्या क्या निरूपित कर डाला। सम्मान और पुरस्कार लौटाने तक के अभियान चल पड़े।

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सोशल मीडिया पर विश्व हिन्दी सम्मेलन को लेकर हर तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं। सकारात्मक और नकारात्मक ! द्रान्वेषण से भरपूर टिप्पणियां; जिनमें कटाक्ष और उलाहने भी थे। सम्मेलन की पल पल की रिपोर्टिंग भी थी और आशा-निराशा में गोते लगाते कॉमेंट्स भी। इसमें मुझे यह बात बेहद पसंद आई -- विश्व हिन्दी सम्मेलन कोई दो मिनिट में तैयार होनेवाली मैगी नहीं है, इस आयोजन के लाभ कई बरस और दशकों लोगों को समझ में आएंगे। कितना अच्छा लगेगा जब हम अपनी हर चीज़ को हिन्दी मे ढूंढेगें, पढ़ेंगे, गायेंगे और जानेंगे ! पूरा विश्व जानेगा हिन्दी !!

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