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पिछले सप्ताह हमने लिखा था कि 27 सितम्बर को पूरा भारतीय मीडिया नरेन्द्र मोदी और फेसबुकमय होगा। वास्तव में न केवल भारतीय, बल्कि एक सीमा तक अमेरिकी मीडिया भी नरेंद्र मोदी की सिलिकॉन वैली की यात्रा से पटा है। सोशल मीडिया पर तो भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा का ही ट्रेंड की गई है और फेसबुक मुख्यालय पर सवाल जवाब के दौरान प्रधानमंत्री का भावुक होना भी सोशल मीडिया का ट्रेंड बन चुका है।

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आम तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भावुक नहीं होते हैं। होते भी हों तो उसे प्रकट नहीं करते। फेसबुक मुख्यालय पर उन्होंने अपनी भावुकता प्रदर्शित होने दी। अनेक लोगों को यह अच्छा नहीं लगा. क्या प्रधानमंत्री इंसान नहीं? क्या उन्हें भावुक होने का अधिकार नहीं? शायद ही दुनिया में कोई शख्स हो, जो माँ का जिक्र आने पर भावुक न हो !

मनोवैज्ञानिक दावा करते हैं कि किसी भी शख्स की असलियत उसके फेसबुक प्रोफाइल को देखकर समझी जा सकती है। फेसबुक मुख्यालय पर मार्क जुकरबर्क के माता - पिता हमारे प्रधानमंत्री से मिलने आये थे और थोड़ी ही देर बाद जुकरबर्क ने मोदी से उनके माता-पिता के बारे में पूछ लिया था। डिप्लोमैसी कहती है कि पीएम को हमेशा ही अपने ज़ज्बातों पर नियंत्रण रखना चाहिए।

सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री के ज़ज्बातों पर हजारों टिप्पणियाँ हुई हैं। वहां कोई संपादन नहीं होता, इसलिए उसे लोगों की भावनाएं समझा जा सकता है। अनेक लोगों ने प्रधानमंत्री के भावुक होने को तो अनुचित नहीं ठहराया, लेकिन लिखा कि अपनी गरीबी का ज़िक्र करते समय शब्दों की कंजूसी कर लेते तो भी उनकी बात लोग समझ जाते। लालबहादुर शास्त्री भी आर्थिक संघर्ष करते रहे थे, ज्ञानी जैलसिंह के पिता बढ़ई और डॉ एपीजे कलाम के पिता मछुवारे थे; यह भारत जैसे महानतम लोकतंत्र का ही कमाल है कि कोई भी शख़्स सर्वोच्च पद तक पहुँच सकता है. फेसबुक मुख्यालय पर प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया के बारे में जो कहा - वह गौर करने लायक है : "सोशल मीडिया के इस्तेमाल से मेरे सोचने के तरीके में बदलाव आया।… सोशल मीडिया लोकतंत्र की बड़ी ताकत बन गया है। सभी सरकारों को इससे जुड़ना चाहिए। अच्छी सरकारें तब चलती हैं, जब आपके पास रियलटाइम इंफॉर्मेशन सिस्टम हो। आज लोगों का फीडबैक फौरन मिल जाता है। फौरन सूचना मिल जाती है।"

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फेसबुक विजिट के दौरान मार्क जुकरबर्क ने अपना फेसबुक प्रोफाइल पिक्चर बदल दिया और प्रधानमंत्री ने भी ! लेकिन प्रधानमंत्री के ट्विटर प्रोफाइल पर स्वतंत्रता दिवस का ही फोटो है. प्रधानमंत्री की भावुकता से अनेक लोग आहत भी हुए हैं; उनका मानना है कि उनके जैसे कद के नेता को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और शब्दों का उपयोग तोल-मोल कर करना चाहिए। पहले भी एक बार वे लालकृष्ण आडवाणी की एक टिप्पणी पर इसी तरह भावुकता प्रदर्शित कर चुके हैं, पर वह पार्टी के भीतर की बात थी। हद तो यह हो गई कि सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने तो प्रधानमंत्री की भावुकता को एक्टिंग करार दिया और उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड देने की अनुशंसा तक कर डाली। लेकिन फेसबुक की विज़िटर्स वॉल पर प्रधानमंत्री के सन्देश को बहुत पसंद किया गया और हजारों लाइक्स मिले हैं,
प्रधानंत्री ने लिखा ---
अहिंसा परमो
सत्यमेव जयते
वंदे मातरम
नरेन्द्र मोदी

एनआरआई जमात ने प्रधानमंत्री की इस यात्रा को जोश-खरोश के साथ सोशल मीडिया पर शेयर किया है। चाहे वह सैन होज़े के सैप सेंटर का भाषण हो या गूगल की विजिट, टेस्ला मोटर्स का अवलोकन हो या फेसबुक मुख्यालय पर चर्चा। दिलचस्प बात यह है कि बड़ी संख्या में लोगों ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर किये हैं। कैलाश खेर का कार्यक्रम 'कैलासा' के वीडियो भी जमकर शेयर किये गए हैं। भारत में वीडियो शेयरिंग अभी आम नहीं है क्योंकि यहाँ हम थ्री जी और फॉर जी में ही हैं, जबकि वहां सिक्स जी - सेवन जी पर काम हो रहा है।

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भारतीय प्रधानमंत्री के आगमन पर वॉल स्ट्रीट जर्नल ने नरेन्द्र मोदी के नाम से विशेष आमंत्रित सम्पादकीय आलेख प्रकाशित किया है। उसे भी वहां के लोगों ने शेयर किया है। अमेरिकी मास मीडिया में कुछ की आदत है, उन्हें मोदी अभी भी हिन्दूवादी भारतीय नेता ही नज़र आते हैं। सोशल मीडिया से प्रधानमंत्री के लगाव और संभावनाओं को देखते हुए लगता है कि यह उनका ईर्ष्या भाव है !

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