
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सोशल मीडिया पर नौकरशाहों की सक्रिय उपस्थिति नजर आने लगी है। ऐसा नहीं है कि ये लोग पहले सक्रिय नहीं थे, लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सोशल मीडिया की मदद से सरकारी कामों का प्रचार-प्रसार करें और लोगों की समस्याएं जानने के लिए भी इस माध्यम का उपयोग करें। गृह विभाग ने तो बाकायदा यह निर्देश भी जारी कर दिया था कि सोशल मीडिया का उपयोग करते समय हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं का उपयोग भी किया जाए।

इसके बाद अधिकारियों को सोशल मीडिया का उपयोग बेहतर तरीके से करने के लिए समय-समय पर कार्यशालाएं भी आयोजित की गर्इं। तब पता चला कि कई वरिष्ठ नौकरशाह तो ऐसे है, जो फेसबुक या ट्विटर पर स्टेट्स भी अपडेट नहीं कर सकते, लेकिन ऐसे भी कई अधिकारी हैं, जो दिनभर सोशल मीडिया पर ही लगे रहते है और जनता की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देते।
ऐसे मौके भी आए, जब सोशल मीडिया के कारण नौकरशाहों को राजनेताओं के गुस्से का शिकार होना पड़ा। पी. नरहरि जब इंदौर के कलेक्टर बनकर आए और उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना कार्यभार संभालने की जानकारी लोगों को दी। साथ ही मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और अन्य नेताओं को एसएमएस करके अपने दायित्व संभालने की सूचना देते हुए सहयोग और सुझाव मांगे, तब उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। मंत्री विजयवर्गीय ने उन्हें एसएमएस किया ‘वेलकम-एट-इंदौर’ और सुझाव दिया था कि इंदौर में पहले की तरह (नरहरि पहले निगमायुक्त रह चुके हैं) पॉलिटिक्स मत करना। यह काम हमारे लिए छोड़ देना। कैलाश विजयवर्गीय ने उन्हें यह भी सलाह दे दी थी कि राजनीति नहीं करोगे तो आपका और इंदौर का स्वास्थ्य ठीक रहेगा।

पी. नरहरि की तरह ही केरल के कोझीकोड के कलेक्टर प्रशांत नायर भी आम जनता में बहुत लोकप्रिय हैं। वे सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय है। उनकी लोकप्रियता के कारण कई राजनेता उन्हें निशाने पर लेते रहे हैं। प्रशांत नायर ने कलेक्टर बनने के बाद फेसबुक पेज को नागरिकों के प्लेटफार्म की तरह प्रस्तुत कर दिया गया था,जो चौबीसों घंटे, सातों दिन खुला रहता था। प्रशांत नायर खुद जनता की समस्याओं को देखते थे और इस कारण केरल कांग्रेस उनसे बहुत चिड़ती थी।

उत्तरप्रदेश के बुलंद शहर की कलेक्टर बी.चंद्रकला भी सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय है और न केवल सक्रिय है, बल्कि लोकप्रिय भी हैं। उनके प्रशंसकों का आंकड़ा लाखों में है और वे खुलकर इसे प्रचारित भी करती है। अखबारों में कलेक्टर की प्रशंसा में आए दिन खबरें छपती रहती है और शहर के अनाथ बच्चे उन्हें अपनी कलेक्टर मां कहते है। बी. चंद्रकला की लोकप्रियता की आलम तो यह है कि राजस्थान के अखबारों में इस तरह की खबरें प्रकाशित की गई कि चंद्रकला को राजस्थान के चुरू जिले में कलेक्टर बना दिया गया है। बाद में इस खबर का खंडन भी प्रकाशित किया गया।

मई 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया था, तब बस्तर और दंतेवाड़ा के कलेक्टरों ने उनकी अगवानी की थी। इस अगवानी के फोटो सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हुए थे, जिसमें बस्तर के कलेक्टर अमित कटारिया और दंतेवाड़ा के कलेक्टर के.सी. देवसेनापति धूप का चश्मा लगाकर प्रधानमंत्री से मिल रहे थे। कलेक्टरों के ये चश्मे और स्टाइल नेताओं को चुभ गए थे और बाद में दोनों ही कलेक्टरों को अनुशासनहीनता बरतने के आरोप में नोटिस दिए गए थे। कहा गया था कि उन्होंने जिस तरह की हरकत की है, वह ऑल इंडिया सर्विसेस (कंडक्ट) रूल्स 1968 की धारा 3(1) के विपरित है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी नौकरशाह थे और सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय भी। विदेश विभाग के प्रवक्ता विकास स्वरूप की सोशल मीडिया पर सक्रियता अद्भुत है और उन्हें साढ़े चार लाख से भी अधिक लोग ट्विटर पर फॉलो करते है। उत्तरप्रदेश के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की सोशल मीडिया पर सक्रियता को भी निलंबन का एक कारण बताया जाता है।

अधिकांश नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट उनके द्वारा नियुक्त कर्मचारी करते है, जबकि नौकरशाहों के साथ ऐसी बात नहीं है। भारतीय नौकरशाहों में एक बड़ी संख्या तकनीकी विशेषज्ञों की है। इनमें से कई नौकरशाह तो आईआईटी जैसे संस्थानों से पढ़कर आए हैं। उन्हें इस बात की अच्छी समझ है कि तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए।