
नरेन्द्र मोदी के अलावा कोई भी बीजेपी का नेता गुजरात में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पांच साल पूरे नहीं कर पाया। आनंदी बेन पटेल के बारे में आशा थी कि वे आगामी चुनाव तक तो मुख्यमंत्री पद पर रहेंगी ही, लेकिन लगभग दो साल में ही उनकी बिदाई हो गई। गुजरात बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर आनंदी बेन की महानता के गुण गाए और लिखा कि 75 साल की होने के पहले ही उन्होंने अपने पद से गरिमामय तरीके से हटने का फैसला किया। इसके जवाब में लोगों ने लिखा कि आनंदी बेन के इस्तीफे के पीछे उनकी उम्र नहीं, कोई और वजह है। और वह वजह है बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह।
दिलचस्प बात यह रही कि कई लोगों ने इस तरह की अटकलें भी लगाई कि शायद अमित शाह गुजरात के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। इस पर फब्तियां कसते हुए लोगों ने लिखा कि अमित शाह कोई मुख्यमंत्री के कद के नेता नहीं, वे तो प्रधानमंत्री कद के नेता हैं। वे मुख्यमंत्री बनने की इच्छा क्यों रखेंगे? बात साफ भी हो गई और अमित शाह की उपस्थिति में गुजरात के नए मुख्यमंत्री का चुनाव वहां के विधायकों ने किया।
आनंदी बेन के इस्तीफे की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने इस्तीफे की मंशा फेसबुक पर जारी करके की। फेसबुक के जरिये इस्तीफे की सूचना देने वाली वे पहली मुख्यमंत्री है। फेसबुक पर आनंदी बेन ने लिखा था कि भाजपा की परंपरा है कि 75 साल से ऊपर के सदस्य बड़े पदों से खुद को मुक्त कर दें। केन्द्र के मंत्रियों ने इसकी शुरुआत कर दी है। मैं भी अब इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हूूं। नवंबर में मैं 75 साल की होने जा रही हूं। मैं चाहती हैं कि अब गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व कोई और योग्य नेता संभाले।

आनंदी बेन चाहती तो किसी भी न्यूज चैनल वाले को विशेष इंटरव्यू में इस बात की घोषणा कर सकती थी। वह न्यूज चैनल भी इस घोषणा से अच्छी टीआरपी बटोर लेता। आनंदी बेन ने किसी न्यूज चैनल को यह मौका नहीं देकर फेसबुक पर यह पोस्ट डाली, इससे पता चलता है कि सोशल मीडिया का महत्व नेता कितनी अच्छी तरह से जानते हैं।
आनंदी बेन के इस्तीफे की सूचना से आम जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इस तरह अपना उत्साह व्यक्त किया, मानो आप के बढ़ते प्रभाव के कारण ही आनंदी बेन ने इस्तीफा दिया हो। आप के कार्यकर्ताओं ने इस मौके पर 78 साल की शीला दीक्षित को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने के कांग्रेस के प्रयास की भी धज्जियां बिखेरी। यह भी लिखा कि खट्टर और कलराज मिश्र जैसे नेताओं को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
वामपंथी ब्रिगेड ने आनंदी बेन पटेल को सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर दलित विरोधी करार दिया और कहा कि उनकी राजनीति दलित विरोधी है और इसी कारण उन्हें पद से हटना पड़ा। अगर वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहती, तो आगामी गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी को भारी हार का सामना करना पड़ता। बीजेपी के एक बड़े वर्ग ने आनंदी बेन के इस्तीफे को मोदी की गैरमौजूदगी के हालात का जिम्मेदार माना। यह वर्ग मानता है कि जब तक नरेन्द्र मोदी रहे, उन्होंने गुजरात सरकार को ठीक से चलाया। जब वे हटे, तब नहीं चाहते थे कि कोई भी सक्षम व्यक्ति मुख्यमंत्री बने, क्योंकि सक्षम व्यक्ति के मुख्यमंत्री बनने से मोदी राज की उपलब्धियों को याद करने का मौका नहीं मिलता।
कांग्रेस के कई नेता गुजरात में दलितों के उत्पीड़न की खबरों के बाद सक्रिय हो गए थे। वे बार-बार यहीं बात दोहरा रहे थे कि आनंदी बेन को अपने पद से हटना ही चाहिए,क्योंकि उनके रहते गुजरात में सुशासन नहीं हो सकता। गुजरात में दलितों पर तो अत्याचार की खबरें आ ही रही है, पाटीदारों का आंदोलन भी जोर पकड़ रहा है। आनंदी बेन के इस्तीफे से बुजुर्ग नेताओं के बारे में भी लोगों ने खुलकर राय व्यक्त करना शुरू किया। प्रकाश सिंह बादल 88 के हैं, करुणानिधि 92 के और देवे गौड़ा 83 साल के। इन वरिष्ठ नेताओं के बारे में भी लोगों की राय है कि सक्रिय राजनीति से हटकर सलाहकार की भूमिका में आ जाएं।
6 August 2016