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‘की एंड का’ मनोरंजक फिल्म है। शहरी मध्यवर्ग को यह फिल्म खास पसंद आएगी। मल्टीप्लेक्स और गोल्ड क्लास वालों के लिए आर. बाल्की की यह पेशकश दिलचस्प है, लेकिन विचार के स्तर पर अंत तक जाते-जाते फिल्म फुस्स हो जाती है। शुरू में जो भ्रम होता है कि यह कोई क्रांतिकारी कहानी पर बनी फिल्म है, वह टूटने लगता है। कहानी के अनुसार लगता है कि औरतें कितनी भी पढ़-लिख जाएं, कितनी भी बड़ी हैसियत पा लें, लेकिन उनके भीतर पुरुषों के प्रति ईष्र्या बनी ही रहती है। ‘की’ की ही रहती है, ‘का’ बनने की कोशिश भी करें, तब भी की ही रहती हैं।
फिल्म का नाम 'रॉकी हैंडसम' नहीं, 'रॉकी ढिशुम ढिशुम' होना चाहिए था. इस फिल्म में जॉन अब्राहम ने एक्टिंग नहीं, मॉडलिंग की है. बचे वक़्त वे मारधाड़ में बिजी हो जाते है. हिंसा, हिंसा और हिंसा का वीभत्स रूप! बीच-बीच में सात बेसुरे गाने और वे भी वीभत्स! पूरे 126 मिनट 10 सेकंड्स का टॉर्चर ! भिया जॉन, आप कोई (बजरंगी) भाईजान थोड़े ही हो, कि दर्शक तालियां बजाएगा; वह तो तुम्हारी 'एक्टिंग' देखकर माथा पीटता है माथा ! रहम करो बाबा ! जॉन और डायरेक्टर निशिकांत कामत दोनों एक्टिंग करने आये हैं, इसमें। फिल्म बनाने में रुपये लगाए हैं तो क्या एक्टिंग भी झिलवाओगे? जॉन के चेहरे पर भावभंगिमा होती नहीं और निशिकांत कामत (केविन परेरा) ओवर एक्टिंग करते हैं. छह साल पहले आई कोरिया की फ़िल्म The Man from Nowhere हिन्दी में बनाई गई है.

हिमेश रेशमिया ने सिक्स पैक्स बना लिए हैं। हिमेश रेशमिया ने डोले-शोले भी बना लिए हैं। हिमेश रेशमिया ने हेयर विविंग भी करा ली हैं। हिमेश रेशमिया ठंड प्रूफ भी हो गए हैं, जो आयरलैंड की भीषण सर्दी में भी बनियान और जैकेट में रह सकते हैं, लेकिन हिमेश रेशमिया अभी तक एक्टिंग नहीं सीख पाए हैं। न ही हिमेश रेशमिया नाक के बजाय गले से गाना सीख पाये हैं।

लेखक और निर्देशक अभिषेक शर्मा की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने एक घटिया से विषय को लेकर फिल्म बनाने की सोची, वह भी सीक्वल। उससे बड़ी दाद देनी पड़ेगी पूजा और आरती शेट्टी बहनों को, जिन्होंने फिल्म प्रोड्यूस की। कलाकार मनीष पॉल, पीयूष मिश्रा, प्रद्युमन सिंह, सिकंदर खेर, मियां उयेदा आदि भी इस फिल्म से जुड़े हैं, उन्हें भी मानना पड़ेगा। इसलिए मानना पड़ेगा कि जिस फिल्म को देखने में आप पक जाते हैं, उसे बनाने में ये लोग नहीं पके। पूरी तरह से पैसे और समय की बर्बादी है यह फिल्म। यह राष्ट्रीय संसाधनों का दुरुपयोग है।

गांवों के गरीब किसानों की जमीन पर बनने वाले विकास के मंदिरों की सच्चाई जय गंगाजल में है। फिल्म को देखते समय कई बार मुट्ठियां भिंच जाती हैं। नेता, पुलिस अफसर, उद्योगपति और मीडिया का गठजोड़। आम आदमी की लाचारी। सर्वशक्तिमान चौकड़ी और अत्याचारों से पीड़ित जनता। नेताओं के सामने घूंटे पर बंधे रहने वाले पुलिस अफसर, जो मौका पड़ने पर बाहुबली बन जाते हैं और लालच में दलाल। ये पुलिस वाले थानों को रंडीखाना बना देते है, जहां वह बिक कर बैठ जाते हैं।

नीरजा भनोट के जीवन पर फिल्म बनाने की घोषणा 2010 में हुई थी, लेकिन फिल्म अब रिलीज हुई है। कुछ छोटी-मोटी बातों को छोड़ दें, तो नीरजा देखने लायक फिल्म है। शांतिकाल के सबसे बड़े वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित होने वाली सबसे कम उम्र की नीरजा भनोट की कहानी नाटकीयता के साथ पेश की गई है। कुछ तथ्य छुपा लिए गए है और कुछ जोड़ दिए गए है। फिल्म के पहले ही निर्देशक ने जता दिया था कि यह फिल्म नीरजा भनोट के जीवन से प्रेरणा लेकर बनाई गई है। यह न तो नीरजा भनोट की जीवनी है और न ही डाक्युमेंट्री।