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रमन राघव 2.0 में बहुत अच्छा गीत-संगीत, लोकेशन्स, डायलॉग, एक्शन, डांस, ड्रामा, प्रेम से भरे दृश्य, संदेश, आनंद कुछ भी नहीं है। रात का अंधेरा है, एक वहशी पागल हत्यारा है, जो कुत्ते-बिल्ली तो क्या छोटे बच्चोें को भी नहीं छोड़ता। तरह-तरह की गालियां है। हत्याओं के बीच में पीछे से चीखता हुआ संगीत है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बेहतरीन एक्टिंग है, लेकिन नवाजुद्दीन कोई प्रियंका या कैटरीना तो है नहीं, जिसे झेला जा सके। यह पूरी फिल्म अनुराग कश्यप की अपनी खुजाल है, जिसे मुफ्त में देखने वाले और उनका अपना छोटा सा भक्त वर्ग सराह रहा है। सराहना में कह रहा है कि इस फिल्म के ‘खून में खुशबू’ है। नामाकूलों, खून में खुशबू कब से होने लगी?

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पहलाज निहलानी को शायद 'उड़ता पंजाब' में आलिया भट्ट के इस डॉयलॉग पर तकलीफ़ थी --'' मैं डिस्ट्रिक्ट लेवल पर हॉकी खेलती थी, तब लगता था कि स्टेट लेवल पर खेलूंगी तो अच्छा टाइम आयेगा, वह नहीं आया. बाप 'टें' बोल गया और बिहार से पंजाब आकर खेत में मजदूरी करने लगी तब लगता था कि अब अच्छा टाइम आयेगा। नहीं आया। फिर एक दिन हाथ में पाकिस्तान से फैंका गया कोकीन का पार्सल आया, तब लगा कि इसे बेच दूंगी तब अच्छा टाइम आयेगा, पर फंस गई इन नशे के सौदागरों में. जहां फंसी हूँ, वहां से गोवा का एक सुन्दर होर्डिंग नजर आता है, जिसकी तस्वीर देखकर अच्छा टाइम आने का इंतज़ार करती रहती हूँ.... मेरा अच्छा टाइम कभी नहीं आया!" 


आप 'अच्छा टाइम' की तुलना 'अच्छे दिन' से करने को स्वतंत्र हैं.

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'तीन' विद्या बालन की फ़िल्म 'कहानी' का सीक्वल लगता है, पर है नहीं. यह कोरियाई फ़िल्म 'मोंताज' पर आधारित दिलचस्प मिस्ट्री ड्रामा है. इसमें नवाज़ुद्दीन ने कई दृश्यों में अमिताभ को मात दी है. गुंथी हुई कहानी, शानदार एक्टिंग और बढ़िया निर्देशन दर्शकों को सवा दो घंटे सीट पर बैठाए रखते हैं. फ़िल्म के पार्श्व में रवीन्द्र संगीत अच्छा लगता है.

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वीरप्पन पर बनी रामगोपाल वर्मा की डाक्युड्रामा वीभत्स है। इसका संगीत कानफाड़ू है और गाने बकवास। बार-बार वहीं वीभत्स दृश्य। पुलिसकर्मियों के हाथ-पैर कुल्हाड़ी से काटना और पत्थर से सिर कुचलकर मार डालना। हाथी के दांत के लिए वह जिंदा हाथी के दांत कुल्हाड़ी से काट डालता है। चंदन तस्कर के रूप में कुख्यात वीरप्पन के इस कृत्य का जिक्र तक नहीं। लीसा रे जैसी अभिनेत्री भी कुछ नहीं कर पाई। कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों के कुछ दृश्य तो चंबल के बीहड़ों जैसे लगते हैं। कई बार तो लगता है कि वीरप्पन को महिमामंडित करने की कोशिश की जा रही है। फिल्म का पूरा नाम ‘वीरप्पन, नोन लाइक हिम एवर इग्जिस्टेड’ है।

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इंसान की मूर्खताओं की कोई इन्तेहाँ नहीं होती. सब जानते हैं! पर बॉलीवुडवाले इससे कमाना जानते हैं. नाडियादवालों को पता है कि मर्द मूर्खता करे तो गुस्सा आता है, औरतें करें तो प्यार! पुरानी 2 'हाउसफुलें' की मूर्खताएं लोगों को मज़ा दे गई तो यह भी टाइमपास करेगी.

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सरबजीत के टिकट पर वैधानिक चेतावनी होनी चाहिए- ‘‘यह फिल्म केवल संवेदनशील लोगों के लिए हैं, जो लोग केवल मनोरंजन के लिए सिनेमा घर में आना चाहते हैं, वे फिर से सोच लें।’’ वास्तव में सरबजीत मनोरंजन के लिए है ही नहीं। फिल्म देखते वक्त पड़ोसी दर्शक के पॉप कॉर्न की आवाज भी आपको फिल्म देखने में बाधा उत्पन्न कर सकती है।

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